संस्करण: 17 फरवरी-2014

21 फरवरी मातृभाषा दिवस पर विशेष

ख़तरे में हैं मातृभाषाएं

? डॉ. गीता गुप्त

        हा जाता है कि भाषा विचारों की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। लेकिन सच तो यह है कि भाषा केवल विचारों या भावनाओं की आदिवाहिनी नहीं है। वह संस्कृति की आदिवाहिनी भी है। भाषा और संस्कृति में गहरा संबंध है। संस्कृति से आशय है 1.समाज को संस्कार कर देने वाली शक्ति 2. समाज के संस्कार या व्यवहार 3.संस्कृति का प्रसार करने वाले माध्यम जैसे संगीत,नृत्य, नाटक आदि और 4 जीवन के सिध्दांत तथा मूल्य। प्रत्येक समाज और राष्ट्र की अपनी भाषा होती है। हम अपने विचारों को प्रकट करने के लिए अन्य भाषाओं से शब्द ले सकते हैं मगर इतने नहीं कि हमारी भाषा ही भ्रष्ट हो जाए। मातृभाषा का अपना विशिष्ट स्थान है। व्यक्ति की पहचान बनाए रखने में मातृभाषा की अपनी भूमिका होती हैं। अपनी भाषा को पढ़ने की अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती। जिस संस्कृति से हमारी भाषा जुड़ी होती है, उसी का साहित्य, जीवन-शैली और दर्शन हमारा हो जाता है। भाषा भ्रष्ट होगी तो संस्कृति भी भ्रष्ट होगी। बिना मातृभाषा पर अधिकार के कोई अपने देश की मिट्टी से नहीं जुड़ सकता। परायी भाषा आर्थिक समृध्द का आधार तो बन सकती है पर अपनी माटी का चिन्तन नहीं दे सकती। जिस भाषा में अपनी माटी की सुगन्ध न हो, वह अपनी ही धरती पर व्यक्ति को पराया कर देती है जो बहुत गंभीर क्षति है।

               यूनाइनेट नेशन्स इन्वायरमेण्ट प्रोग्राम के एक अधययन के मुताबिक समूची दुनिया में लगभग सात हजार भाषाएं प्रचलन में हैं। जिनमें से 2500 भाषाएं अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। भारत में 1961 की जनगणना के पश्चात 1652 मातृभाषाओं की जानकारी सामने आई थी। इनमें से करीब 1100 को भाषा का दर्जा प्राप्त है। 1971 में केवल 108 भाषाओं की सूची सामने आई क्योंकि शासकीय नीतियों के अनुसार किसी भाषा को सूचीबध्द करने के लिए उसे बोलने वालों की संख्या कम से कम दस हजार होनी चाहिए। इस हिसाब से तो गत पांच दशकों में भारत की 20 प्रतिशत यानी लगभग 220 भाषाएं समाप्त हो चुकी है। आज संसार में कितनी भाषाएं अस्तित्व में हैं, इसकी कोई प्रामाणिक सूचना नहीं है। वैश्वीकरण के कारण दुनिया भर में इस समय जीवित रहने वाली भाषाओं में चीनी, अंग्रेजी, स्पेनिश, जापानी, रूसी, बांग्ला और हिन्दी कुल सात भाषाओं का राज है। दो अरब पचास करोड़ से अधिक लोग ये भाषाएं बोलते हैं। इनमें अंग्रेजी का प्रभुत्व सर्वाधिक है और वह वैश्विक भाषा के रूप में स्वीकार कर ली गई है। हालांकि भाषाविज्ञानी इस रूझान को खतरनाक मानते हैं। यूनेस्को का कथन है कि इक्कीसवीं सदी के अन्त तक दुनिया में केवल 600 भाषाएं ही शेष रह जाएंगी। यह स्थिति चिन्ताजनक है। इसीलिए बांग्लादेश की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ वर्ष 2000 से हर साल 21 फरवरी को अन्तराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मना रहा है। संघ ने विश्व के सभी राष्ट्रों से अपील की है कि आधुनिक कहलाने की चाह में अपनी भाषा से विमुख होने की प्रवृत्ति को रोका जाए।

              अन्तराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने संबंधी संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णय की पृष्ठभूमि में एक छोटी-सी किन्तु महत्वपूर्ण घटना है। वर्ष 1952 में बांग्ला भाषा को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा बनाए जाने की मांग को लेकर एक जन आन्दोलन हुआ। बांग्ला भाषा की एक हजार वर्ष पुरानी समृध्द साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के प्रति वहां के निवासियों में अपार श्रध्दा थी। मगर पाकिस्तानी शासकों ने निर्णय लिया कि पाकिस्तान की भाषा केवल उर्दू रहेगी। इसके विरोध में 21 फरवरी 1952 को एक भाषायी रैली निकाली गई जिसमें अबुल बरकत, रफीकुद्दीन अहमद और शफी उर रहमान पुलिस की गोलियों से भून दिए गए। बांग्ला देश में इन्हें भाषायी शहीद का दर्जा दिया गया। इन्हीं शहीदों की स्मृति में 21 फरवरी 1953 से बांग्लादेश में मातृभाषा दिवस मनाए जाने की परम्परा आरंभ हुई। फिर बांग्लादेश के अनुरोध पर 17 नवम्बर 1999 को यूनेस्को की तीसवीं साधारण सभा ने वर्ष 2000 से अन्तराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाए जाने का निर्णय लिया।

             उल्लेखनीय है कि 20 फरवरी 2009 को यूनेस्को ने अन्तराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की पूर्व संधया और अन्तराष्ट्रीय मातृभाष वर्ष 2008 के समापन के अवसर पर 'खतरे में पड़ी दुनिया की मातृभाषाएं' शीर्षक से रपट जारी किया तो उसमें 21वीं सदी के अंत तक नष्ट हो जाने वाली 2500 भाषाओं का उल्लेख था। इनमें भारत की भी 196 भाषाएं शामिल थीं। भारत में मातृभाषा दिवस को अभी तक कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता है मगर यही एकमात्र ऐसा देश है जहां आज भी सैकड़ों बोलियां और भाषाएं बोली जाती हैं। वर्ष 1991 की जनगणना में यहां 1576 मातृभाषाओं का अस्तित्व स्वीकार किया गया था और 1796 भाषाओं को अन्य मातृभाषा की श्रेणी में रखा गया था। 2001 की जनगणना के अनुसार देश में 450 से अधिक भाषाओं का व्यवहार करने वालों की संख्या इतनी कम हो गई है कि धीरे-धीरे ये भाषाएं अपना अस्तित्व खो देंगी। अब विश्व में केवल 65 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें एक करोड़ या इससे अधिक लोग बोलते हैं। इन 65 भाषाओं में हिन्दी सहित दस अन्य भारतीय भाषाएं भी शामिल हैं। यह हमारे लिए सचमुच गर्व की बात है। इन भारतीय भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, अधयात्म और साहित्य आदि का विपुल भण्डार उपलब्ध है लेकिन नयी पीढ़ी उच्च शिक्षा, रोजगार और भौतिक समृध्दि की लालसा में अंग्रेजी भाषा की गुलाम बन चुकी है।

             मातृभाषा के संदर्भ में यूनेस्कों की अपील सराहनीय है। इस अपील में कहा गया है कि सब लोग अपनी पहली भाषा या मातृभाषा का अधिक से अधिक उपयोग करें। फिर क्षेत्रीय भाषा, राष्ट्रभाषा और अन्तराष्ट्रीय भाषा भी सीखें। भारतवासियों का व्यवहार अपनी मातृभाषा के प्रति बहुत उपेक्षापूर्ण है। यूनेस्को की अपील का उसपर कोई असर दिखाई नहीं देता। यहां पढ़ा लिखा हर व्यक्ति अंग्रेजी प्रेमी है। शासन-प्रशासन और राजनेता भी अंग्रेजी भाषा के भक्त हैं। देश में ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया गया है कि शहरी, अर्धाशहरी और ग्रामीण आबादी भी अंग्रेजी ज्ञान के बिना अपना भविष्य अंधकारमय मानती है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अधयक्ष सैम पित्रोदा देश के सभी बच्चों को पहली कक्षा से अंग्रेजी पढ़ाने की वकालत कर चुके हैं। जबकि अनेक वैज्ञानिक शोधों और शिक्षाविदों के विचारों से यह सिध्द हो चुका है कि प्राथमिक शिक्षा के माधयम के रूप में मातृभाषा ही उपयोगी है। मातृभाषा के माधयम से बच्चे विज्ञान और गणित जैसे कठिन विषय भी आसानी से पढ़ और समझ सकते हैं। भले ही पहली कक्षा से एक विषय के रूप में अंग्रेजी भी पढ़ायी जाए पर प्राथमिक शिक्षा का माधयम मातृभाषा को बनाने से भारतीय भाषाओं को नवजीवन मिलेगा। सरकार को इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।

            संयुक्त राष्ट्र संघ भाषायी जागरूकता लाने के लिए प्रयत्नशील है परन्तु विश्व के तमाम देशों को अपनी मातृभाषाएं बचाने की कवायद स्वयं करनी होगी। इसके लिए औपचारिक तौर पर मातृभाषा दिवस मनाने की नहीं बल्कि मातृभाषा को अपने जीवन में स्थान देने की आवश्यकता है।  

? डॉ. गीता गुप्त