संस्करण: 17 फरवरी-2014

बदनामी बनी सफलता की गारंटी

 

? डॉ. महेश परिमल

        फिक्सिंग में शामिल होकर अजहरुद्दीन लोकसभा का चुनाव जीत सकते हैं, श्रीसंत फिल्मों के हीरो बन सकते हैं, तो फिर ऐसी बदनामी से डर कैसा? आजकल तो बदनामी सफलता की गारंटी बनती जा रही है। जिन अपराधियों के अपराध सुनकर माथा शर्म से झुक जाए, ऐसे लोग जब नकली चेहरे के साथ समाज के सामने आते हैं, तो लोग तालियां बजाकर उनका स्वागत करते हैं। उनकी बदनामी ही उनके लिए सफलता का मार्ग प्रशस्त करती दिखाई देती है। अब क्रिकेट के खिलाड़ी जिसे हम अपना आदर्श मानते आए हैं, हमारे सामने फिक्सर की भूमिका में हैं, उनकी इस भूमिका को भी हम सहजता से स्वीकार कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि हम सब पूरी तरह से याददाश्त खोने वाले फुलटाइम श्गजनीय बन गए हैं। अब हमें कुछ भी याद नहीं रहता। कम से कम किसी के अच्छे काम तो हमें याद ही नहीं रहते। बुरे काम याद रहते हैं, इसलिए हम उन्हें अपना आदर्श मानकर उन्हें सर पर चढ़ाए रखते हैं।

               आखिर क्रिकेट हमारे देश में क्यों इतना अधिक लोकप्रिय है? यह सवाल बार-बार पूछा जाता है। अपार लोकप्रियता और बेशुमार दौलत प्राप्त करने के बाद भी हमारे क्रिकेटर सट्टे जैसी बुराई को क्यों अपनाते हैं? इसे संयोग कहा जा सकता है कि पिछले दो तीन दिनों में जो कुछ हुआ, उससे उपरोक्त दोनों सवालों के जवाब मिल जाते हैं। जिस दिन हमें फिक्सिंग में महेंद्र सिंह धोनी और सुरेश रैना के नाम सामने आए, उसी दिन आईपीएल की नीलामी में लाखों-करोड़ों में क्रिकेट की टीमों को खरीदा गया। अभी तक सबसे महंगे युवराज रहे। जिन्हें विजय माल्या ने 14 करोड़ में खरीदा है। आज हम क्रिकेट के प्रति इतने अधिक दीवाने हैं कि इसकी बुराई हमें कभी प्रभावित नहीं करतीं। शायद हमारे मस्तिष्क से इसका के्रज कभी खत्म नहीं होगा। युवराज कितने ही समय से फार्म में नहीं हैं। एक जमाने में वे भले ही विस्फोटक खिलाड़ी रहे हों, पर इसके बाद भी वे 14 करोड़ में बिक गए। उनके फार्म को देखते हुए उनकी कीमत बहुत ही ज्यादा मानी जा रही है। इससे लोगों को यह कहने का मौका मिल गया कि जो जीता वही युवराज। पिछले वर्ष युवराज आईपीएल में लगातार निष्फल रहे। उनकी टीम वोरियर्स का अस्तित्व ही खत्म हो गया। स्ट्राइक रेट की मात्रा ऊंची होने के बाद भी उन्होंने एक भी लंबी मैच विनिंग इनिंग नहीं खेली। कुल 13 मैचों में उन्होंने 238 रन बनाए। इसके बाद भी यदि विजय माल्या ने उन्हें खरीद लिया, तो इसके पीछे उनका क्रिकेट कम किंतु उनके चर्चे अधिक प्रभावशाली माने गए। आईपीएल के प्रारंभ से ही उनके क्रिकेट से अधिक क्रिकेट के नाम पर की जाने वाली कमाई अधिक चर्चित है। हर सीजन के समय विवाद खड़े करना, उसे फैलाना, फिर उसे समेट लेना आदि काम ललित मोदी से लेकर श्रीनिवासन तक के कार्यकाल में देखे जा सकते हैं। कभी चियर लीडर के नाम से तो कभी मैच के बाद होने वाली पार्टियां विवादस्पद बनी हैं। कभी कोई किसी को तमाचा मार रहा है, तो कभी फिक्सिंग के आरोप लगा रहा है। इस तरह से आईपीएल हमेशा ही चर्चा में रही है। इस कारण वह सेलेबल भी रही है।

              पिछले साल श्रीसंत मैच फिक्सिंग में न केवल पकड़ाए, बल्कि जेल भी गए। पर हुआ क्या? वे दो फिल्मों के हीरो बन गए। यह बात साबित करती है कि आईपीएल में कुछ भी हो सकता है। आऊट ऑफ फार्म में चलने वाला खिलाड़ी 14 करोड़ में बिक सकता है। अब धोनी और रैना भी फिक्सिंग में शामिल होने लगे, इस पर हमें हैरानी नहीं होनी चाहिए। कारण वही है,सब में पैसा कमाया जाता है। बेशुमार दौलत और लोकप्रियता, औकात से अधिक प्रसिध्दि और हैसियत से अधिक स्वीकृति के कारण व्यक्तित्व की मूलभूत बदमिजाजी किस हद तक जाकर बेपरवाही, तुनकमिजाजी में बदल जाती है, इसके अनेक उदाहरण हमने देखे हैं। जब श्रीसंत का मामला सामने आया, तो ऑस्ट्रेलियन क्रिकेटर मेथ्यू हेडन ने आंख खोलने वाला बयान दिया। टि्वटर पर उसने लिखा कि मेरा मन तो श्रीसंत को तमाचा मारने का कर रहा है। उसे उसके देश के लोग भगवान की तरह पूजते हैं। इतना अधिक पैसा और इतनी अधिक लोकप्रियता दे रहे हैं। इसके बाद भी मैच फिक्सिंग जैसी बुराई उनके भीतर आ गई। श्आई अफ्रेड, इट्स नॉट आल अबाउट मनी।य हेडन के अनुसार मैच फिक्सिंग केवल पैसे के लिए ही होता हो, यह आवश्यक नहीं, इसके दूसरे भी कारण जवाबदार हो सकते हैं।

             आज हम जिस समाज में रह रहे हैं, वहां निंदा, बदनामी कोई मायने नहीं रखती। इन चीजों को हमने घोलकर पी लिया है। अब शर्म नामकी कोई चीज बाकी नहीं रही। अब तो अपराध करने के बाद पकड़े जाने का भी डर लोगों में नहीं रहा। सबको मालूम है कि पकड़े जाने के बाद हीरो तो बन ही जाएंगे। क्रिकेट को सर्वस्व मानने वाले इस देश में क्रिकेटर को भगवान मानने वाले कम नहीं हैं। परिणामस्वरूप क्रिकेटरों को मिलने वाला मान, सम्मान, प्रसिध्दि और पैसा उन्हें गलत रास्ते पर ले जाता है। लक्ष्मण, शिवरामकृष्णन से लेकर विनोद काम्बली और श्रीसंत के उदाहरणों के बाद अब यदि धोनी और रैना के नाम इसमें शामिल हो रहे हैं, तो यह देश का दुर्भाग्य है। कानून कमजोर है या सिस्टम इतना अधिक लचर हो गया है कि वह कानून को भी कमजोर साबित कर दे। ऐसा हम अधिकांश मामले में देख ही रहे हैं। मैदान पर पडने वाले छक्के को हम इतना अधिक तूल देते हैं कि उनके कोई गुण-दोष हम देख ही नहीं पाते। इसलिए उन्हें अपराध करने का डर नहीं होता। गलत काम करके बदनामी का डर भी उन्हें अब नहीं रहा। कानून का भी डर नहीं है। कैरियर खत्म हो जाने का भी डर नहीं है उन्हें। इसके विपरीत गलत काम करके वे और अधिक नाम कमा रहे हैं। धोनी हो या रैना, विंदु हो या मयप्पन, श्रीनिवासन हो या ललित मोदी, पूरे आईपीएल में ऐसा ही होता आया है। सबसे बड़ा डर समाज की बदलती मानसिकता का है। अपराध करना और पुलिस और अदालत के चक्कर लगाना आज बड़ी बात नहीं रही। परन्तु अपराध करने के बाद जरा भी लोकलाज न हो, शरम न हो, नाम के साथ जुड़ी बदनामी का भार न हो, उसके बदले बदनामी के कारण होने वाली प्रसिध्दि ही आज उनका सबसे बड़ा हथियार बन गई है। यदि आज हम धोनी-रैना की तरफ ऊंगली उठा रहे हैं, तो तीन ऊंगलियां हमारे तरफ भी हैं।

              अजहरुद्दीन मैच फिक्सिंग में पकड़े गए, तो हमने उन्हें लोकसभा का चुनाव जितवा दिया, मनोज प्रभाकर और अजय जाडेजा जैसे लोग फिक्सिंग में बदनाम हुए, तो वे हम टीवी स्क्रीन पर एक्सपर्ट के रूप में हमें क्रिकेट सिखा रहे हैं। श्रीसंत मैच फिक्सिंग में शामिल होकर जेल भी हो आए, पर उस पर पुस्तकें लिखी जा रहीं हैं और अब वे दो फिल्मों में हीरो के रूप में आ रहे हैं। अब इसे क्या कहा जाए, सजा या सम्मान। पहले यह कहा जाता था कि चोरी करना पाप नहीं है, बल्कि चोरी करते हुए पकड़े जाना पाप है। अब तो बेशर्मी की हद ही हो गई, अब यह कहा जा रहा है कि चोरी करते पकड़ा जाना भी पाप नहीं है, क्योंकि उसके बाद तो तरक्की पक्की ही है। सांसद बन सकते हैं, क्रिकेट के एक्सपर्ट बन सकते हैं, कमेंटेटर बन सकते हैं, फिल्मों में हीरो बन सकते हैं। समाज में जब ऐसे रास्ते खुले हों, तो अपराधियों और बदमाशों को संरक्षण देने वाले लोगों की संख्या और ऐसी कंपनियों की संख्या बढ़ेगी ही। सबसे बड़ी बात है बदलती सामाजिक व्यवस्था, आज हम इसी के बीच जी रहे हैं और अपनी मानसिकता को दुरुस्त कर रहे हैं।

? डॉ. महेश परिमल