संस्करण: 17 दिसम्बर -2012

क्रिसमस पर विशेष -

आपका हृदय प्रभु का दरबार है

ईसा मसीह का जगत को संदेश

?  राजेन्द्र जोशी

                  विभिन्न धर्म प्रवर्तकों ने इस दुनिया में जन्म लेकर अपने मानवतावादी संदेशों के माध्यम से मानव समाज को एकसूत्र में बांधने और उनमें परस्पर प्रेम, दया, करुणा और सद्भाव बढ़ाने के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग तक कर दिया। जब जब मानवता के अस्तित्व को आघात पहुँचाने वाली शक्तियों ने सामाजिक समरसता में विष घोलने का प्रयास किया और जब-जब अन्याय, अत्याचार और मानव-उत्पीड़न बढ़ता चला गया, तब-तब संसार में किसी ऐसी शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ जिसमें ईश्वरत्व के दर्शन हुए। ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह भी इसी श्रेणी के धर्म प्रवर्तक हुए जिनमें ईश्वरीय शक्ति विद्यमान थी।

                 ईसा मसीह का परिवार एक यहूदी परिवार था। ईसा मसीह को जीज़स भी कहा जाता है। उनके पिता का नाम था जोसेफ और माता का नाम था था मेरी। ईसा के जन्म के बारे में कहा जाता है कि जिस स्थान पर मवेशियां बंधती थी, उस स्थान पर उनका जन्म हुआ था। ऐसा माना जाता है कि जब भी कोई महान आत्मा का इस पृथ्वी पर जन्म होता है, तब प्रकृति भी अपने संकेतों के माध्यम से किसी महान शख्सियत के अवतरण की सूचना दे देती है। ऐसा ही चमत्कार ईसा मसीह के जन्म के समय भी लोगों को देखने को मिला। जैसे ही ईसा मसीह का जन्म हुआ, आकाश से एक तारा पृथ्वी पर टपका। कहा जाता है कि तारा टपकने के इस चमत्कार पर उस समय तीन विद्वानों ने घोषणा कर दी थी कि परमात्मा का जन्म हो चुका है।

                  अन्याय, अत्याचार, घृणा, लोभ, लालच के जाल में फंसे संसार के दीन दुखियों, असहायों, निर्धानों और रोगियों में आत्मसम्मान और आत्मबल बढ़ाने की भावनाओं को ईसा मसीह ने विस्तार दिया और अपने मानवतावादी उपदेशों के माध्यम से ईसाई  धर्म को परिभाषित किया। उनके उपदेश के मूल विषय मानवतावादी होते। हिंसा न करें, लोभ-लालच न करें, दिखावा न करें और मानव मानव के प्रति दया, करुणा और सहानुभूति का व्यवहार करे जैसे उपदेश से समाज को नई दिशा देने के भावों का उन्होंने विस्तार किया। ईसा मसीह में दया करुणा और सेवा के भाव तो बाल्यकाल से ही थे किंतु ऐसा माना गया है कि 27 वर्ष की आयु से उन्होंने धर्मोपदेश देना शुरू कर दिया था।

                   ईसा मसीह ने अपने संदेश में इस बात के महत्व को प्रतिपादित किया कि 'यदि आप अपने हृदय के द्वार खोलते हैं तो स्वर्ग के द्वार अपने आप खुल जाते हैं। उनके धर्मोपदेश का मुख्य भाव यह था कि 'आपका हृदय ही प्रभु का दरबार है'। उनके धर्मोपदेश का ऐसा प्रभाव बढ़ता गया कि उनके अनुदायियों की संख्या में निरंतर वृध्दि होती चली गई। वे स्वयं भी संतो, गुरुओं और महान आत्माओं से ज्ञान प्राप्त करते रहे। अपने ज्ञान, विवेक और अनुभव से उन्होंने ऐसे कई चमत्कारिक काम किए कि समाज में उनकी प्रतिभा और कौशल के प्रति लोगों का सम्मान बढ़ता चला गया। ईसा रोगियों की सेवा कर उनके रोग भगाये तथा दीन दुखियों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित कर उनमें आत्मसम्मान और आत्मबल बढ़ाया।

               महान आत्माओं के जीवन के साथ इस तरह की विडंबनाऐं जुड़ी होती हैं कि उनके बढ़ते प्रभाव और बढ़ती जन आस्था से कतिपय शक्तियों द्वारार् ईष्या, द्वेष और खिलाफत शुरू कर दी जाती है। ऐसी स्थिति का सामना ईसा को भी करना पड़ा। कहा जाता है कि एक तत्कालीन यहूदी गुरू ने ईसा के साथ ऐसा षडयंत्र किया कि उन्हें राजद्रोही घोषित करने के लिए तत्कालीन शासक को भड़का दिया। शासक के आदेश पर रोमन सैनिक ईसा को पकड़कर ले गये और ईसा को शूली पर लटकाने का दंड दे दिया गया। शूली पर चढ़ाते हुए ईसा मसीह को बढ़ी ही क्रूरता का सामना करना पड़ा। ईसा पर कोड़े बरसाये गये। शूली पर ईसा को चढ़ाया गया तब उनकी माता मेरी वहां उपस्थित थी। जिस दिन ईसा को शूली पर चढ़ाया गया। वह दिन गुड फ्राइडे के रूप में मनाया जाता है। शूली पर चढ़ाने के तीन दिन बाद ही ईसा ने पुनर्जन्म लिया। इसके बाद वे अपने शिष्यों से मिले। माना जाता है कि चालीस दिन बाद ईसा फिर स्वर्ग चले गये। जिस दिन पुनर्जन्म हुआ उसे ईस्टर कहा जाता है।

              ईसा की मृत्यु के बाद भी उनके शिष्यों और उनके अनुयायियों ने ईसा के उपदेशों को आगे बढ़ाया और धर्मोंपदेश के जरिए ईसाई धर्म का विस्तार करते चले गये। धीरे-धीरे ईसाई धर्म फैलता गया। आज विश्व में सर्वाधिक माना जाने वाला कोई धर्म है तो वह है, ईसाई धर्म। ईसा के बाद जहां जहां और जिस जिस देश में ईसाई समुदाय के लोग व्यापार के लिए जाते वहां वे अपने एक हाथ में क्रास रखकर ले जाते और वहां अपने धर्म का प्रचार करते। रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म की प्रतिष्ठा हुई। रोमन साम्राज्य की वेटिकन सिटी है जो अपने आप में प्रभुता संपन्न है। वेटिकन सिटी का विश्व में एक अलग ही धार्मिक महत्व है। यह वह स्थान है जहां से ईसाई धर्म के धार्मिक महत्व है। यह वह स्थान है जहां ईसाई धर्म के प्रमुख पोप जॉन पाल सारी दुनिया को प्रेम, दया, करुणा  और शांति का संदेश देते हैं। प्रतिदिन इस स्थान पर दुनिया भर के पर्यटक श्रध्दाभाव से यहां पहुंचते हैं।

                  विश्व के अन्य धर्मों की तरह ईसाई धर्म के अंदर भी कई संप्रदाय हैं। इनमें भी कई उपसंप्रदाय बन गये हैं। केथोलिक और प्रोटेस्टेंट प्रमुख संप्रदाय हैं। ऐसा माना गया है कि ईसा की मृत्यु के तीन दशक बाद दक्षिण भारत से ईसाई धर्म भारत में आया। प्रतिवर्ष विश्व के साथ-साथ भारत में भी ईसा मसीह के जन्मदिवस 25 दिसंबर को क्रिसमस के रूप में मनाया जाता है। यह दिवस दीन-दुखियों, असहायों, निर्धानों और रोगियों के प्रति प्रेम, दया, करुणा, और सहानुभूति प्रदर्शित करने की प्रेरणा देता है। क्रिसमस को सिर्फ ईसाई धर्मावलंबी ही नहीं बल्कि सर्वधर्म समभाव की भावना के अनुरूप भारत में भी विभिन्न धर्मावलंबियों द्वारा इस दिवस को मनाने की परंपरा बन गई है।

 
? राजेन्द्र जोशी