संस्करण: 17 दिसम्बर -2012

आत्मघात के लिए मजबूर होते म.प्र. के किसान

?  डॉ. सुनील शर्मा

               ध्यप्रदेश में किसानों की आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ते जा रहें हैं।कांग्रेस के विधायक रामनिवास रावत द्वारा उठाए इस मुद्दे से मालूम हुआ कि इस साल 1 मार्च से 31 अक्टूबर तक 655 किसानों और 886 कृषि मजदूरों ने मौत को गले लगाया अर्थात प्रतिदिन आठ किसान और कृषि मजदूरों ने आत्मघाती कदम उठाया है। किसान और कृषि मजदूरों की आत्महत्या  के मामले  किसी विशेष अंचल तक ही सीमित नहीं है, वरन सारे प्रदेश में समान रूप से किसान आत्मघाती कदम उठाने मजबूर हैं। किसानों की आत्महत्या के साथ साथ कृषि मजदूरी में लगे लोगों की आत्महत्या की बढ़ती संख्या इस बात की ओर इंगित करती है कि खेती की तबाही से किसानों के साथ इस पर आश्रित मजदूर भी बेहाल है। प्रश्न ये है कि आखिरकार प्रदेश सरकार के किसानों की सरकार होने के दावे के बाद भी हर साल बढ़ती संख्या में किसान आत्महत्या को क्यो मजबूर हो रहें हैं? वास्तव में प्रदेश सरकार की खोखली नीतियों और ढपोरशंखी वायदों से किसानों का कुछ भी भला नहीं हो पाया है। बिजली पानी आपूर्ति की स्थिति में वही ढाक के तीन पात है। बिजली का बिल लगातार बढ़ता जा रहा है मगर आपूर्ति लगातार घट रही है। किसान चंदा कर बिजली अफसर को चढ़ौत्री देकर ट्रांसफार्मर लगवाते हैं लेकिन घटिया ट्रांसफार्मर लगने के दूसरे दिन ही जल जातें हैं जिससे किसानों की खड़ी फसल सूख जाती है। धान हो या गन्ना बिजली की मार में सब तबाह हो रहीं है। प्रदेश के गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में किसान  बिजली की अनियमित कटौती और लो वोल्टेज से त्रस्त हैं किसानों की गुड़ की भट्टियॉ बंद पड़ी है।गन्ने के खेत सूख रहें हैं।

               एक तरफ फसल बर्बाद होने से किसानों पर कर्ज बढ़ता जा रहा है तो दूसरी तरफ बैंकों के क्रेडिट कार्ड के जरिए सस्ता कर्ज एक दु:स्वप्न बत गया है। सरकार की तमाम घोषणओं और वायदों के बाद भी इसके लिए सुपात्र किसान महीनों तक बैंक ,पटवारी और कचहरी के चक्कर लगाने  मजबूर है। वास्तव में क्रेडिट कार्ड के भी अजब पेंच है जहॉ व्यापारी के एक छोटे से आवासीय प्लाट पर लाखों की कर्ज लिमिट आसानी से बनती है। वहीं किसान की लाखों रूपये एकड़ मूल्यांकन वाली भूमि पर महज हजार रूपये की कर्ज सीमा निर्धारित करने के लिए किसान की ऐड़ियॉ रगड़वा दी जाती हैं।पहले किसान पटवारी के चक्कर लगाता है खसरा किश्तबंदी और नक्शा की सत्यापित प्रति के लिए जोर लगाता है। फिर बैंकों में नोडयूज का चक्कर। इसके बाद सर्च रिपोर्ट के लिए वकील के चक्कर। तहसीली में भूमि बंधक करने की कार्यवाही उसके बाद बैंक मैनेजर की मर्जी की कितना कर्ज मिलेगा किसान को? क्रेडिट कार्ड के चक्कर में दलालों के जलवे हैं प्रतीत होता है कि बैंक,पटवारी और वकील सब दलालों के सहयोगी हैं लेकिन किसानों के चूषक? सच में क्रेडिट कार्ड की सरकारी व्यवस्था के बाद भी अपनी ही कृषि भूमि को गिरवी रखकर कर्ज पाना आसान काम नहीं है। विकास के लिए भूमि अधिग्रहण के फलसफे ने प्रदेश के किसानों को सड़क  पर  खड़ा कर दिया है। कटनी के वेलस्पन पावर प्लांट की बात हो या फिर नरसिंहपुर के एनटीपीसी पावर प्लांट की बात। इन पावर प्लांटों की बिजली से कौन से शहर और कारखाने रोशन होगें यह तो भविष्य के गर्त में है। लेकिन हजारों की संख्या में किसान,मजदूर और पट्टाधारी आदिवासी किसानों की जिंदगी में अभी से अंधोरा जरूर आ गया है। कटनी जिले के डोकरियॉ बुजबुजा गॉव में वेलस्पन पावर द्वारा ओने पोने दामों में किसानों की जमीन छीनने से त्रस्त महिला सोनिया की आत्महत्या के मामले से पावर कंम्पनियों के शोषण और उनको मिल रहे सरकारी संरक्षण की बात सामने है। नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा में बन रहे एनटीपीसी पावर प्लांट से बड़ी संख्या में ऐसे आदिवासी किसान सड़क पर आ गए हैं, जो बर्षों से शासन द्वारा प्रदत्त भुमि पर खेती कर रहे थे। पिछले दिनों प्रस्तावित एनटीपीसी पावर प्लांट द्वारा बगैर मुआवजे के अधिाग्रहण की गई जमीन को लेकर क्षेत्र के उमरिया और कजरोटा के ग्रामीण निवासी और मजदूर धरने पर बैठे थे। उल्लेखनीय है कि इनको 1984,1988 और 2002 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में साढ़े पॉच-पॉच एकड़ शासकीय भूमि खेती हेतु दी गई थी जिस पर ये खेती कर खुसहाल जीवन  व्यतीत कर रहे थे लेकिन अब ये सड़क पर आ गए है। सरकारी संवेदनहीनता के चलते  न तो इन्हें कोई मुआवजा मिलने वाला है न ही कोई रोजगार। ये किसान और आदिवासी प्रश्न कर रहें हैं कि ऐसी गंभीर स्थिति में इनके समक्ष भिखारी या आत्मघाती बनने के ही विकल्प हैं? खेती की जमीन के अधिग्रहण से किसान भी बर्बाद हो रहे है। क्योंकि वो सिवाए खेती के अलावा और कुछ कर नहीं सकते हैं और मुआवजे की राशि में जमीन अधिग्रहीत जमीन के बदले खेती योग्य जमीन मिल पाना दुष्कर है। किसानों के साथ  बड़ी संख्या मे बटाई,गहाई और कृषि कार्यो में लगे मजदूर भी बेघर और बेरोजगार हो गए हैं।

               वास्तव में किसानों के मामले में  प्रदेश सरकार की संवेदनहीनता की स्थिति से किसानों की समस्याएॅ और शोषण बढ़ रहा है।जिससे त्रस्त होकर वो आत्मघाती कदम उठा रहें है। सरकार के कृषि कैबिनेट या फिर कृषि बजट के शिगुफे से अब तक किसानों का कुछ भी भला नहीं हो पाया है। किसान म.प्र.सरकार के खेती को लाभ का धंधा बनाने बात को भी गोरी गप्प ही मानने लगे है। वास्तव में प्रदेश के किसान कंगाल हो रहें है।  

? डॉ. सुनील शर्मा