संस्करण: 17 दिसम्बर -2012

दूर के ढोल सुहावने हैं

मोदी के विकास के दावे

?  एल.एस.हरदेनिया

               गुजरात के चुनावों का परिणाम कुछ भी हो। चुनाव में अपने भड़काऊ मुस्लिम विरोधी रवैये के कारण भले ही नरेन्द्र मोदी फिर से सरकार बनाने में सफल हो जायें परन्तु मैंने मेरे पांच दिन के गुजरात प्रवास के दौरान यह महसूस किया कि नरेन्द्र मोदी का विकास पुरूष होने का दावा खोखला है।

               जब भारतीय जनता पार्टी केन्द्र की सरकार की असफलताओं की सूची बनाती है तो उसमें सर्वोच्च प्राथमिकता अनियंत्रित बढ़ती मंहगाई को देती है। पर शायद भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को गुजरात की हकीकत मालूम नहीं। अन्यथा वह यह आरोप केन्द्र की सरकार पर नहीं लगाती। मैं 30नवंबर को जबलपुर सोमनाथ एक्सप्रेस से गुजरात के लिये रवाना हुआ था। ट्रेन ज्योंही गुजरात की सीमा पर पहुँची मैंने चाय वाले से एक कप चाय ली। चाय पीने के बाद जब मैंने उससे भाव पूछा तो उसने दस रूपये माँगे। मैंने उससे कहा कि मैं देश के अनेक स्थानों पर जाता रहता हूँ कहीं भी चाय की कीमत 10 रूपये नहीं है। इस पर डिब्बे में बैठे अनेक लोगों ने कहा कि गुजरात में तो यही रेट है। राजकोट के प्रवास के दौरान मैं एक सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरा था। वहाँ चाय बाहर से बुलाना पड़ती है। मैंने भी बुलाई। जो केयर टेकर चाय लाया उसने 15 रू. मांगे। मैंने पूछा यह क्या? उसने कहा यहां तो यहीं रेट है। मुझे यह भी बताया गया है कि गुजरात में अन्य राज्यों की तुलना में सभी चीज मंहगी है। गुजरात में मोदी का राज है। मोदी को कुछ लोग प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं। स्पष्ट है उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद सारे देश में चाय 15 रू. से कम में नहीं मिलेगी। एक क्षेत्र नहीं है कि जहां गुजरात का आम आदमी परेशान नहीं है। गुजरात प्रवास के दौरान बार-बार यह बात सुनने को मिली कि पिछले वर्षों में मोदी ने यदि किसी वर्ग का भला किया है तो वह कुछ बड़े उद्योगपतियों का वर्ग है। सरकारी खजाने की कीमत पर कुछ उद्योगपति घरानों की ही सेवा की है। यह बात अभी हाल में अरविंद केजरीवाल द्वारा लगाये गये आरोप से साबित होती है। केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि नरेन्द्र मोदी ने अडानी समूह को सभी नियम कानून तोड़कर सहायता दी है। इसी तरह मुकेश अंबानी की कंपनी को एक लंबे समय के लिये बिक्री कर से मुक्ति दी है। इस मुक्ति से राज्य सरकार का हजारों करोड़ का नुकसान हुआ है।

               यह बात सही है कि गुजरात के अनेक क्षेत्रों में 24 घंटे बिजली उपलब्ध रहती है परन्तु सिंचाई के लिये बिजली की उपलब्धता 6 से 8 घंटे तक सीमित हैं। मैंने स्वयं कुछ गांवों में प्रवास के दौरान देखा कि अनेक किसान सिंचाई के लिये डीजल पंप रखते हैं। मुझे यह भी बताया गया सिंचाई के लिये बिजली के कनेक्शन की 6 लाख प्रार्थना पत्र लंबित है। यदि इतनी बड़ी संख्या में प्रार्थना पत्रों पर निर्णय नहीं होता है तो यह सिध्द होता है कि मोदी सरकार आम जनता की सरकार नहीं है।

                आम जनता से संबंधिात क्षेत्र शिक्षा का भी होता है। गुजरात में शिक्षा का काम पूरी तरह से निजी हाथों में सौंप दिया गया है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। शिक्षण संस्थाओं को सरकारी ग्रान्ट पूरी तरह से बंद है। इससे प्रायवेट संस्थायें अनाप-शनाप फीस लेकर अपनी संस्थाओं का संचालन करती है।

               शिक्षकों के अभाव का एक मुख्य कारण सरकार की वेतन संबंधी नीति है। गुजरात में नव-नियुक्त शिक्षक या अन्य कर्मचारी को नियुक्ति के बाद पांच वर्ष तक फिक्स वेतन मिलता है। यह वेतन दो हजार से पांच हजार के बीच होता है। पांच वर्ष के बाद उसे रेगुलर वेतन मिलना प्रारंभ होता है। इसके अतिरिक्त स्थायी सरकारी कर्मचारी भी मोदी सरकार से बेहद खफा है। भारी संख्या में सरकारी कर्मचारियों को अभी तक छटवे वेतन आयोग का लाभ नहीं मिला है। इससे सरकारी कर्मचारियों के सभी संगठनों ने मोदी और भाजपा को चुनाव में हराने का फैसला किया है। बताया तो यह गया है कि सरकारी कर्मचारियों के संगठनों ने सार्वजनिक रूप से मोदी और भाजपा को हराने की अपील की है।

               आर्थिक दृष्टि से परेशान शासकीय सेवकों की एक और परेशानी है। वह है नरेन्द्र मोदी का तानाशाही रवैया। वे सरकारी सेवकों के साथ घरेलू नौकरों के समान व्यवहार करते हैं। सरकारी कामकाज में डेमोक्रेटिक नजरिये का पूरी तरह अभाव रहता है। उनके इस रवैये से सरकारी कर्मचारियों के अलावा संघ परिवार के लोग भी परेशान हैं। मोदी ने गुजरात में विश्वहिन्दू परिषद को पूरी तरह नेस्त-नाबूद कर दिया है। विश्व हिन्दु परिषद के तोगड़िया तो गुजरात में एक भी सार्वजनिक गतिविधि नहीं कर सकते हैं। इसी तरह संघ के प्रमुख नेता संजय जोशी भी वहां मुँह तक नहीं खोल सकते हैं। मुझे बताया गया है कि संघ परिवार से जुड़े किसान संघ के गांधीनगर स्थित कार्यालय को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया गया।

               एक बात जो बार-बार कही जाती है कि मोदी के गुजरात में भ्रष्टाचार नहीं है। परन्तु मुझे बताया गया कि प्रशासन के उच्च स्तर से लेकर नीचे तक बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। ग्रामीण क्षेत्र के एक पत्रकार हंसमुख कन्सारा ने मुझे बताया कि गुजरात में गरीब मेलों का आयोजन होता है। इन मेलों में गरीबों को प्लाट,सिलाई मशीन,साइकिल आदि नि:शुल्क दी जाती हैं। परन्तु यह सब उन गरीबों को मिलता है जो पर्दे के पीछे संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को रिश्वत देते हैं। इस पत्रकार ने आगे बताया कि प्लाट के लिये 50 हजार, सिलाई मशीन के लिये एक हजार एवं साइकिल के लिए 500 रू. की रिश्वत देना पड़ती है तब उन्हें ये सब मिल पाता है।

               इसी तरह सरकारी कार्यालयों में काम करवाने के लिये खुलेआम रिश्वत देना पड़ती है। पहिले रिश्वत कहीं और ली जाती थी अब तो सीधो कार्यालयों में ली जाती है।

               मोदी स्वयं और मोदी के समर्थक आये दिन यह दावा करते हैं कि गुजरात में अभूतपूर्व विकास हुआ है। विकास के जो मापदंड है उनमें सर्वप्रथम प्राथमिकता पीने के पानी की आपूर्ति होती है। परन्तु सौराष्ट्र के भ्रमण के दौरान सब जगह पानी के अभाव का हाहाकार सुनाई दिया।

               नरेन्द्र मोदी का एक ऐसा चेहरा है जिसकी वीभत्सता का अंदाजा लगाना कठिन है। वह चेहरा है मोदी का अन्धा मुस्लिम विरोध। मोदी मुसलमानों को गुजरात के नागरिक नहीं मानते। मैं गुजरात के जिन शहरों में गया वहां की मुस्लिम बहुल कालोनियों में किसी भी प्रकार की नागरिक सुविधायें उपलब्ध नहीं हैं। इन कालोनियों में न तो बिजली के खंबे हैं, न सफाई की व्यवस्था है और न ही पक्की सड़कें हैं। मोदी मुसलमानों को नागरिक नहीं मानते हैं इसलिये उनने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दी है।

               इस तरह गुजरात के पांच दिन के प्रवास में मुझे गुजरात का ऐसा चेहरा देखने को मिला जो उससे पूरी तरह से भिन्न है जो हमें मोदी का प्रचार तंत्र मधयप्रदेश और जगहों पर दिखाता है।

? एल.एस.हरदेनिया