संस्करण: 17 दिसम्बर -2012

नरेंद्र मोदी को कांग्रेस नहीं, भाजपा निपटा रही है

? मोकर्रम खान

                कुछ समय पूर्व आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने नरेंद्र मोदी को प्रधान मंत्री पद के लिये सबसे उपयुक्त बताया था। इससे माया मोह से दूर रहने का दावा करने वाले मोदी के अंदर भी प्रधान मंत्री बनने की इच्छा जागृत हो गई। पहले नरेंद्र मोदी कहा करते थे कि वह गुजरात के लिये बने हैं और गुजरात में ही रहना पसंद करेंगे किंतु जब अभिभावक संगठन आरएसएस ने उन्हें प्रधानमंत्री घोषित कर ही दिया तो परिवारविहीन मोदी ने भी भाग्य आजमाने का निर्णय ले लिया। आनन फानन में अपनी छवि सुधारने के प्रयास प्रारंभ कर दिये। गुजरात दंगों से दागदार हो चुके चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी  के लिये डाक्टर ढूंढने लगे। ईवेंट मैनेजर रूपी प्लास्टिक सर्जनों की सलाह पर मोदी ने पूरे गुजरात में सदभावना कार्यक्रम चलाये। इन कार्यक्रमों में मुसलमानों को आवश्यकता से अधिाक महत्व दिया गया। मोदी के साथ मंच पर तथा दर्शकों श्रोताओं की भीड़ में दाढ़ी टोपी धारी मुस्लिमों की संख्या तिलक-कमंडल धारी हिंदुओं से अधिाक रहती थी। इन आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च किये गये। कट्टरपंथी हिंदू मोदी की इस हरकत से कुपित भी हुये किंतु नरेंद्र मोदी आलोचनाओं से बेपरवाह,अपने चेहरे पर नित नये फेस पैक लगाते रहे। मोदी जानते हैं कि मार-काट से गुजरात तो जीता जा सकता है किंतु पूरा देश फतह नहीं किया जा सकता। देश का नेतृत्वं करने के लिये धार्मिक कट्टरता छोड़ सांप्रदायिक सदभावपूर्ण बनना होगा सो मोदी अपने आप को धर्म निरपेक्ष प्रदर्शित करने में लग गये। मुसलमानों के पक्ष में बयान भी देने लगे। मोदी के इस छवि सुधार कार्यक्रम से भाजपा में खलबली मचना स्वा्भाविक था। भाजपा में प्रथम पंक्ति में कई ऐसे नेता हैं जिनका कोई जनाधार नहीं है इसलिये चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं करते लेकिन फिर भी वे पार्टी के महत्वनपूर्ण पदों पर आसीन हैं। ऐसे नेताओं ने नरेंद्र मोदी के पर कतरने शुरू कर दिये क्योंरकि उनके हृदयों में सदैव यह भय बना रहता है कि नरेंद्र मोदी बुलडोजर हैं,जो भी सामने आ जाय,उसे कुचलते हुये आगे बढ़ जाते हैं, परिणाम की परवाह नहीं करते हैं। गुजरात में मोदी सर्वेसर्वा हैं।  वहां वे ही पार्टी हाई कमान, मुख्यमंत्री, मुख्यसचिव, वित्त प्रबंधक तथा पुलिस महानिदेशक सभी कुछ हैं। उनकी मर्जी के बगैर गुजरात में कुछ भी नहीं किया जा सकता है। वह गुजरात के चक्रवर्ती सम्राट हैं। भाजपा शीर्ष नेतृत्व भी उनके सामने असहाय है। एक बार महाराष्ट्र के एक महारथी पर कुपित हो गये तो उसकी कैसी दुर्गति की, पूरे देश ने देखा। मोदी की इसी बुलडोजर शैली के कारण दिल्ली में बैठे भाजपा नेता उनसे भयभीत रहते हैं और उनकी टांग खींचने के निरंतर प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष प्रयास करते रहते हैं। उन्हें यह डर सताता रहता है कि मोदी अभी केवल एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं तब इतने निरंकुश हैं, जिस दिन केंद्र की राजनीति में आ जायेंगे, उस दिन क्या होगा और यदि कहीं प्रधानमंत्री बन गये तो न जाने कितनों को दिल्ली् से अपना बोरिया बिस्तर समेटना पड़ेगा।

               नरेंद्र मोदी को गुजरात में ही सीमित रखने तथा दिल्ली प्रवास से रोकने के लिये भाजपा नेताओं में शह और मात का खेल जारी है। गुजरात विधान सभा चुनावों में प्रचार के दौरान कुछ नेता ऐसे बयान दे रहे हैं कि यह समझना कठिन हो जाता है कि वे जिताने के लिये आये हैं या हराने के लिये। भाजपा के शीर्ष नेताओे ने मोदी के सदभावना कार्यक्रम की हवा पूरी तरह निकाल दी। मोदी अपने सदभावना कार्यक्रमों में दाढ़ी टोपीवाले मुसलमानों से खुले आम गलबहियां कर लोगों में यह विश्वास जगाने का प्रयास कर रहे थे कि वे मुस्लिम विरोधी नहीं हैं। समाचार माध्यमों में यह समाचार भी आये कि पार्टी तथा मोदी की छवि सुधारने के लिये इस बार कुछ मुसलमानों को भी टिकट दिये जायेंगे तथा जिन भाजपा नेताओं के नाम गुजरात दंगों में ज्यामदा उछले थे उन्हों टिकट नहीं दिये जायेंगे। इससे मुसलमान भाजपा की तरफ आकर्षित होंगे और नरेंद्र मोदी आसानी से चुनाव जीत कर फिर से मुख्ययमंत्री बन जायेंगे तथा 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों तक आम जनता में उनकी स्वीकार्यता इतनी बढ़ जायगी कि उन्होंने आसानी से प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट  किया जा सकेगा। परंतु जब भाजपा के नीति-निर्धारकों की बैठक हुई तो नरेंद्र मोदी के करोड़ों रुपये खर्च कर आयोजित किये गये सदभावना कार्यक्रम को डस्टक बिन में फेंक दिया गया और पुराने सांप्रदायिक दुर्भावना कार्यक्रम को पुनरू अपना लिया गया।जिन नेताओं पर 2002के सांप्रदायिक दंगों में अति सक्रिय भूमिका निभाने के आरोप लगे थे उन्हें ही टिकट वितरण में अधिक महत्वम दिया गया।

               कांग्रेस के लिये नरेंद्र मोदी का सदभावना कार्यक्रम के माधयम से लोकप्रिय होने का प्रयास थोड़ी चिंता का विषय हो सकता था किंतु कांग्रेस ने इस बात की परवाह ही नहीं की क्योंकि कांग्रेसी नेताओं को यह मालूम है कि मोदी को दिल्ली में बैठे  भाजपा नेता ही आगे नहीं बढ़ने देंगे।यदि मोदी किसी प्रकार दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ भी गये तो भाजपा नेता चौन खींच कर ट्रेन ही रोक देंगे।इसीलिये कांग्रेस गुजरात विधान सभा चुनावों को अधिक गंभीरता से नहीं ले रही है।कांग्रेस ने जनता को 2002के सांप्रदायिक दंगों की याद नहीं दिलाई। कांग्रेस चाहती तो गुजरात दंगों की वीडियो फिल्म दिखा कर मोदी के चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी की परत हटा सकती थी किंतु कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया।यह कार्य स्वयं भाजपा नेताओं ने किया। गुजरात के जिन भाजपा नेताओं पर सांप्रदायिक दंगों में संलिप्त ता के प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन हैं,उन्हें ही फिर से टिकट दे दिये। इससे मुसलमानों तथा धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं में यह संदेश भली भांति चला गया कि मोदी का सदभावना कार्यक्रम केवल एक राजनीतिक स्टंट था,वास्तव में नरेंद्र मोदी आज भी वही 2002 वाले नरेंद्र मोदी हैं जिनके मुख्यंमंत्रित्वं में सांप्रदायिक दंगों की भयावहता के नये नये रिकार्ड बने, नृशंशता तथा बर्बरता की नई नई विधिायों से देश तथा संसार को अवगत कराया गया।इस देश में हारर फिल्में पसंद करने वालों की संख्या 01प्रतिशत भी नहीं है इसलिये हारर फिल्म बाक्स आफिस पर फ्लाप हो जाती हैं। सांप्रदायिक दुर्भावना तथा विद्वेष के पुजारी भी देश में 01प्रतिशत से कम हैं।देश की जनता केवल सांप्रदायिक सौहार्द पसंद करती है।इसी कारण सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाली पार्टियां हमेशा हाशिये पर रहीं, कभी भी इतना बहुमत नहीं पा सकीं कि अकेले अपने दम पर सरकार बना सकें।कांग्रेस बेफिक्र है क्यों कि गुजरात लगभग 2 दशक पहले ही उसके हांथ से निकल चुका है। इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिये खोने के लिये कुछ भी नहीं है।मोदी यदि सफल नहीं हो पाते हैं तो उनका राजनीतिक कैरियर स्वेतरू समाप्ती हो जायगा और यदि जीत कर एक बार फिर मुख्यमंत्री बन जाते हैं तो भी उनका दिल्ली कूच का स्वप्न तो धवस्त  हो ही जायगा।इस प्रकार आरएसएस के पास कट्टरपंथी नेताओं का कोटा भी समाप्त हो जायगा क्यों कि आरएसएस ने आडवाणी को पहले ही अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी है, मोदी गुजरात में रह जायेंगे।  अब जो बचते हैं उनमें कई तो बैक डोर एंट्री वाले हैं।केवल कुछ ही हैं जो किसी प्रकार अपनी सीट निकाल सकते हैं, किंतु वह भी आसानी से नहीं बल्कि साम दाम दंड भेद के हथकंडों की सहायता से।पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा की एक शीर्ष नेत्री के विरुध्द चुनाव लड़ रहे कांग्रेस प्रत्याशी ने ऐसा पर्चा भरा कि वह खारिज हो गया और नेत्री ने एक तरफा विजय पताका फहरा ली। अब भाजपा के पास ऐसा कोई नेता नहीं बचता है जो राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो।  कांग्रेस के लिये यह सुविधाजनक तथा निश्चिंतता की स्थिति है।

? मोकर्रम खान