संस्करण: 17 दिसम्बर -2012

ईमानदार आदमी, बेईमान लोग

जनाब नितिन गडकरी के बंगारू न बनने के किस्से पर एक नज़र

? सुभाष गाताड़े

              'मैं ईमानदार आदमी हूं, इस्तीफा नहीं दूंगा'।

               पिछले दिनों एक टीवी चैनल से बातें करते हुए संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक एवं फिलवक्त उसके आनुषंगिक संगठन भाजपा के अध्यक्ष जनाब नितिन गडकरी ने इन बातों को कहा। उनकी बाडी लेग्वेज या उनकी भावभंगिमा में उस असहजता के पुट तक नहीं थे, जिसका कुछ दिन पहले वह मूर्तिमान रूप थे। याद करें जब भाजपा के इस 'युवा अध्यक्ष' ने कुछ दिनों तक मीडिया से बातचीत करने में परहेज बरता था क्योंकि उन्हें शायद डर इस बात का था कि कहीं लोग उनके द्वारा स्थापित कम्पनी पूर्ति एवं उसमें हुए निवेश को लेकर सवाल न पूछने लग जाएं।

                ध्यान रहे कि 'इण्डिया अगेन्स्ट करप्शन' की अंजली दमानिया द्वारा महाराष्ट्र के सिंचाई विभाग के प्रचण्ड घोटाले को लेकर जनाब नितिन गडकरी के कथित मौन को लेकर की गयी प्रेस कान्फेरेन्स के बाद -जिसमें जनाब गडकरी के खिलाफ कोई खास सबूत पेश नहीं किए जा सके थे - घटनाक्रम इतना तेजी से बदला कि खुद गडकरी को बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करना पड़ा था। उनके द्वारा खड़ी की गयी फर्जी कम्पनियों,उसके निदेशक के पदों पर अपने परिवारजनों या अपने ड्राइवर या अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति,कम्पनियों के हेड आफिस का कहीं किसी झोपड़ी में प्रदर्शित करना आदि को लेकर एक के बाद खुलासे होते गए थे। कई अग्रणी अख़बारों ने मामले की तह तक जाते हुए तमाम सारे तथ्य पेश किए थे, जिसमें इन कागजी कम्पनियों के निर्माण एवं उनके संचालन में जनाब गडकरी या उनके आत्मीयजनों की संलिप्तता साफ उजागर हो रही थी। टाईम्स आफ इण्डिया ने तो इतनाभी बताया कि उनकी खोजी रिपोर्ट पूर्ति समूह और उसमें निवेश करनेवाली 18कम्पनियों द्वारा रजिस्ट्रार आफ कम्पनीज के कार्यालय में जमा वार्षिक रिपोर्ट पर आधारित है।

               मामला इतना गम्भीर था कि नितिन गडकरी के पद पर बने रहने को लेकर संघ परिवार के अन्दर ही विवाद खड़े हुए। इस पूरे घटनाक्रम में संघ सुप्रीमो जनाब भागवत ने गडकरी के न हटने की हिमायत की। टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में गडकरी के पलटे आत्मविश्वास के मायने यही निकलते हैं कि अब संघ परिवार उनके साथ खड़ा है। यह अकारण नहीं कि कुछ समय पहले संघ के विचारक एस गुरूमूर्ति ने जनाब गडकरी को 'क्लीन चिट' दे दी थी।

               ध्यान रहे कि भागवत के करीबी रहे गडकरी को मिली 'क्लीन चिट' बरबस हमें भाजपा के एक दूसरे अध्यक्ष जनाब बंगारू लक्ष्मण के प्रति उसी संघ परिवार द्वारा अपनाए अलग पैमाने की याद ताजा करती है। याद रहे कि 'तहलका' द्वारा किए स्टिंग आपरेशन में बंगारू लक्ष्मण, कैमरे के सामने किसी रक्षा सौदे के काम को जल्दी करवाने के लिए पैसे लेते देखे गए थे। इस स्टिंग आपरेशन ने भाजपा एवं उसके सहयोगी दल जनता दल यू के कई शीर्षस्थ लोगों को बेपर्द करके रख दिया था। इस मामले में अधिक हीलाहवाली करने के बजाय संघ नेतृत्व ने तुरन्त जनाब बंगारू को 'असफल स्वयंसेवक'घोषित किया था। बाद में अदालत द्वारा उन्हें दोषी भी पाया गया था और सज़ा भी सुनाई गई थी।

               नितिन गडकरी की हिमायत के लिए आपसी मतभेदों को सुलझाए जाने के बाद समूचे परिवार का खड़े हो जाना और उसी परिवार द्वारा स्टिंग आपरेशन में बेपर्द बंगारू की 'बड़े बेआबरू होकर कूचे से निकाले'जाने के तर्ज पर उन्हें पद से मुक्त होने के लिए मजबूर करना, इस दोहरे व्यवहार की कैसे व्याख्या की जा सकती है ?

               क्या इसकी वजह बंगारू लक्ष्मण का दलित पृष्ठभूमि से आना और गडकरी का ब्राह्मण जाति में पैदा होना कहा जाना चाहिए ?

               ध्यान रहे कि स्टिंग आपरेशन में पकडे जानेवालों में बंगारू लक्ष्मण अकेले 'परिवारी' नहीं कहे जा सकते। हम इसे संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं का नवसिखियापन कह सकते हैं कि इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई में जब स्टिंग आपरेशन्स के जरिए सियासतदानों के बेपर्द होने के कई किस्से सामने आए,उन सभी में वही अव्वल रहे। छत्तीसगढ के नेता जूदेव के उन डायलॉगों को कौन भूल सकता है जब नोटों की गड्डियां स्वीकारते हुए कैमरे में यह कहते हुए कैद हुए थे 'पैसा खुदा तो नहीं, मगर खुदा के नूर से जुदा भी नहीं।' या संसद में पैसा लेकर प्रश्न पूछे जाने को लेकर जब 'कोब्रापोस्ट' के अनिरूध्द बहल आदि की तरफ से स्टिंग आपरेशन किया गया तो उसमें पकड़े जानेवाले सांसदों का बहुमत संघ की शाखाओं से ही निकला दिखा था। एक सांसद प्रश्न पूछने के ऐवज में जब नोट स्वीकार रहे थे, तब उनके पीछे संघ के प्रिय गुरू गोलवलकर की तस्वीर भी दिख रही थी। इन सभी मामलों में किसी भी कार्यकर्ता पर कोई कार्रवाई अनुशासित कहे जानेवाले संघ ने की।

               वैसे पार्टी अध्यक्ष के रक्षा सौदे में दलाली खाने के चलते सूर्खियों में पहुंचे पार्टी मुख्यालय से जुड़ा विवाद का यह कोई पहला मसला नहीं है।  चार साल पहले की बात है जब दिसम्बर 2008 में भाजपा मुख्यालय से 2.6 करोड़ रूपए गायब हुए थे। पैसे गायब होने की घटना का पता भी किसी अन्दरूनी व्यक्ति के जरिए ही मीडिया को मिला था। टुकड़े टुकड़े में इस सिलसिले में जो तथ्य सामने आए थे वे यही बताते थे कि खजाने में पांच सौ रूपए की नोटों की गड्डियां ज्यों की त्यों रखी हुई थीं, सिर्फ एक हजार रूपए की नोटों की गड्डियां गायब थी। गायब राशि का भार इकतीस किलो है, इतना भारी बैग कैसे पार्टी कार्यालय के बाहर गया और किसी की निगाह भी नहीं गयी, इसी पर सभी को आश्चर्य हो रहा है। अपनी झेंप मिटाने के लिए पार्टी के कोषाध्यक्ष रामदास अग्रवाल ने यह भी कहा था कि दरअसल यह अंकेक्षण अर्थात अकौंटिंग की गलति का मामला भी हो सकता है। और अपने ही खजाने से गायब हो गयी इतनी बड़ी रकम को लेकर प्रमुख विपक्षी दल ने पुलिस में जाने के बजाय प्रायवेट गुप्तचरों की मदद ली थी। यह अभी तक पता नहीं चल सका है कि इन गुप्तचरों ने क्या किया ?

               जनाब गडकरी अपने आप को जो भी कहें या उनकी उद्यमशीलता को लेकर 'परिवारजन' जो भी प्रमाणपत्र जारी करें, इस बात को भूला नहीं जा सकता कि यह मामला फिलवक्त संघ-भाजपा के गले में ऐसे अटका हुआ है कि न उनसे उगलते बन रहा है और न ही निगलते बन रहा है। पिछले दिनों संसद में रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश के मसले को लेकर चली मैराथन चर्चा में भी गडकरी का नाम कई बार उछला। यह बात भी सामने आयी कि जनाब गडकरी द्वारा शुरू की गयी पूर्ति सुपर बाजार की स्कीम भी हिट है।  इतनाही नहीं यहभी उजागर हुआ कि पिछले दिनों भारत व्यापी बन्द के दिनों में भी पूर्ति सुपर बाजार के दरवाजे खुले थे, भले ही गडकरी की पार्टी संसद या सड़क पर भारत बन्द के काम में मुब्तिला हो।

? सुभाष गाताड़े