संस्करण: 17 दिसम्बर -2012

अपनी हिन्दी, कितनी हिन्दी

? ऋषि कुमार सिंह

               दि आप क्रिकेट प्रेमी हैं, तो क्रिकेट कमेंट्री हिन्दी में आने से जुड़ा विज्ञापन 'जो बात हिन्दी में है, वह किसी में नहीं' तो जरूर सुना या देखा होगा। जिन लोगों ने नहीं देखा है, उनके लिए बताते चलें कि विज्ञापन में आस्ट्रेलिया के पूर्व गेंदबाज शेर्न वार्न 'जो बात हिन्दी में है, वह किसी में नहीं' कहते हुए फिल्माया गया है । हिन्दी यह एक वाक्य कहने से पहले वे किताब से हिन्दी पढ़कर हिन्दी सीखने की बात भी कहते दिखाये गये हैं। बदलाव के लिहाज से कह सकते हैं कि क्रिकेट कमेंट्री में अंग्रेजी के मुकाबले में नदारद रहने वाली हिन्दी अपनी जगह बनाने में कामयाब हो रही है। यह बात खुद अंग्रेजी बोलने वाला खिलाड़ी बोल रहा है। दूसरी तरफ यह भी कह सकते हैं कि हिन्दी को बाजार में तवज्जो मिल रही है। लेकिन इन सबके बीच चिंताजनक पहलू यह है कि हिन्दी बोलने वाली आबादी का अपनी भाषा को लेकर उत्साह सिमट गया है। केवल हिन्दी जानने वालों पर अंग्रेजी न जानने अफसोस दिनोंदिन गहरा होता जा रहा है। बात यहां तक आ पहुंची है हिन्दी भाषी क्षेत्रों की एक बड़ी संख्या हिन्दी, हिन्दी की किताबों और इस विषय के पठन-पाठन से पीछे हट गई है।

               उत्तर प्रदेश के आंकड़े का हवाला है कि हिन्दी पट्टी इस हिस्से में विषय के तौर पर हिन्दी का पठन-पाठन बेहद दयनीय हो गया है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद बोर्ड के शैक्षणिक सत्र 2011 के हाईस्कूल नतीजों में केवल हिन्दी विषय में सवा तीन लाख बच्चे फेल हुए हैं । कंपार्टमेंट परीक्षा के जरिए दोबारा मौका पाने वाले साढ़े चार सौ बच्चों में से 59 दोबारा फेल हो गये। कहा जा सकता है कि यदि परीक्षा देने वाले बच्चे ने साल भर में हिन्दी की किताब के कुछ-कुछ पन्ने पढ़े होते या नियमित तौर कक्षाओं का हिस्सा होते, तो फेल होने जैसी नौबत नहीं आती। जिस तरह से स्कूलों में अध्यापकों की कमी है, उससे कक्षाओं का नियमित होना संदिग्धा लगता है। ऐसे में जो लोग हिन्दी विकास को लेकर राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन करने के लिए लालायित रहते हैं, वे विषय के तौर पर हिन्दी की दशा-दुर्दशा को लेकर सवाल क्यों नहीं उठाते हैं ?

               हमें ध्यान रखना होगा कि अंग्रेजी भाषी खिलाड़ी जब अंग्रेजी की ही टोन में हिन्दी का एक वाक्य बोलता है, तो बाजार व विज्ञापन में हिन्दी आने से एक खुशनुमा नजारा बनता है। लगता है कि हिन्दी सम्मानित हो रही है। लेकिन रोजगार देने के मामले में यह हकीकत से कहीं दूर है। पठ्न-पाठन के स्तर हिन्दी के साथ हो रही ज्यादती तब और विस्तारित हो जाती है, जब रोजगार की शर्त में अंग्रेजी के ज्ञान को अनिवार्य कर दिया गया होता है।

               कह सकते हैं कि देश में हिन्दी बोलने-लिखने वालों के खिलाफ संस्थागत सहमति तैयार की जा चुकी है। लगातार वर्षों में जिस तरह से सिविल सेवा परीक्षा में हिन्दी भाषा में परीक्षा देने वाले प्रतियोगियों की सफलता दर कमजोर हुई है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि हिन्दी भाषा के साथ खुली साजिश हो रही है। ध्यान रखना होगा कि सिविल परीक्षा का आयोजन अच्छी लोकसेवा दे सकने वाले उम्मीदवारों की तलाश होती है, ताकि वे समाज को समझने और उसके अनुरूप नीति निर्माण में मददगार हो सकें। यानि पूरा मामला भाषायी ज्ञान के परीक्षण से कहीं ज्यादा व्यापक महत्व का है, लेकिन बदली हुई परीक्षा नीतियां हैं कि लोक प्रशासकों को खोजने वाली परीक्षा बेहतर अनुवाद क्षमता को परखने का माधयम बन रही हैं।

              अन्य सामाजिक विषयों के साथ साथ हिन्दी के साथ एक और दिक्कत पेश आ रही है। विषय का पठ्न-पाठन और परीक्षा मूल्यांकन लकीर पीटने की तर्ज पर काम कर रहा है। असर यह हुआ है कि लोग किसी विचार प्रक्रिया के तहत मौलिकता का प्रयोग करने के बजाय किताबी व्याख्याओं पर केंद्रित होते  जा रहे हैं। इसके लिए गाइड व स्योर सीरीज के खड़े होते बाजार को सबूत के तौर पर लिया जा सकता है। परीक्षा मूल्यांकन की यह समस्या तब और बड़ी हो जाती है, जब परीक्षा हिन्दी माधयम से दी जा रही हो। आज शायद ही ऐसा कोई संस्थान है, जहां हिन्दी माधयम में हुई परीक्षा को लेकर भेदभाव न किये जाने की बात को विश्वासपूर्ण तरीके से कहा जा सकता है।

              कुल मिलाकर कोई समाज या सरकार या जनमानस, जब अपनी बोली-भाषा से भागने की कोशिश करता पाया जाता है, तो आजाद नागरिक के हक के मामले में समस्या देखी जाती है। इसके विपरीत अपनी बोली भाषा में दिलचस्पी इस बात का संकेत मानी जाती है कि समाज अपनी पहचान को लेकर चिंतनशील है। वह अपने हक के लिए भी मजबूती से खड़ा होने की क्षमता रखता है। लेकिन अपनी भाषा के प्रति उत्साह का अभाव प्रतिरोध के अभाव के रूप में देखा जाता है। ऐसे ही कमजोर दौर में अवसरवादी ताकतों को सबसे ज्यादा विस्तार का मौका मिला है। भारत में हिन्दी (व अन्य स्थानीय भाषाओं) की दुर्दशा और राजनीतिक क्षेत्र की अविश्वनीयता या जनहित के साथ समझौतों की परिघटनाएं साथ-साथ देखी जा रही हैं।

              अपनी भाषा को जानने या इस्तेमाल करने के समर्थन का अर्थ किसी अन्य बोली व भाषा को सीखने या पठ्न-पाठन के विरोध से नहीं लगाया जा सकता है। कोई जब अपनी भाषा को भूलकर ऐसा कुछ करता है, तो वह आर्थिक मुनाफे के लिहाज से बेहतर लग सकता है, लेकिन राजनीतिक संदर्भ में यह कदम गुलाम व आजाद होने के बीच के फर्क को नकारात्मक तौर पर प्रकाशित करता है। लिहाजा मौजूदा दौर की जरूरत है कि इस बात को बड़े ही साफ लहजे में स्थापित किया जाये कि हिन्दी जानना, लिखना व बोलना अयोग्यता नहीं है। यहीं से पठ्न-पाठन में नये उत्साह को पैदा किया जा सकता है और देश-समाज से कटकर होने वाले हिन्दी चिंतन का दौर समाप्त हो सकता है।

? ऋषि कुमार सिंह