संस्करण: 17 दिसम्बर -2012

समाज की जरूरत हैं

चिड़ियॉ और पक्षी

? शब्बीर कादरी

               भांति-भांति के पक्षियों और चिड़ियों का चहेता देश भारत इन दिनों अपने ऊपर मंडराते खतरे से लगभग बेफिक्र और निश्चिंत नजर आता है। जबकि पिछले कुछ सालों में देश के पक्षियों और चिड़ियों की विभिन्न प्रजातियों में भारी गिरावट महसूस की गई है। आंकड़े बताते हैं कि प्रजातीय विविधता के मामले में हमारा देश पहले स्थान पर रहा है। दुनियाभर में पक्षियों की 12प्रतिशत प्रजातियां हमारे देश में पाई जाती हैं और यह भी कि एक दशक पहले चिड़ियों की करीब 8,650 प्रजातियां थीं  जिसमें से 1200 के लगभग भारत में पाई जाती थीं। दुख है कि इस रंगीन अनमोल विरासत के आंकड़े अब अपनी चमक खो रहे हैं। विज्ञान विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक तकनीक ने हमारे परों वाले इन दोस्तों पर केवल खतरा नहीं जानलेवा खतरा पैदा किया है। वर्ल्डवाइड इंस्टीटयूट ने चेताया है कि जिस गति से जमीन पर पाए जाने वाले पक्षी और चिड़ियां लुप्त हो रही हैं उससे लगता है कि ये भी धरती से उसी तरह गायव हो जाऐंगे जैसे साढे छह करोड़ साल पहले डायनासोर लापता हुए थे।

               पक्षी विज्ञानी हावर्डस् यूथ ने अपने शोध-पत्र  'विंग्स मैसेंजर: द डिक्लाइन आफॅ  बर्डस्' में बताया है कि चिड़ियाएँ हमेशा बेहतरीन पर्यावरणीय संकेतक होती हैं। उनकी संख्या में कमी या बढ़ोतरी से हम आसन्न पर्यावरण्रीय संकटों का आसानी से पता लगा सकते हैं। पक्षियों के प्राकृतिक निवास उजड़ने के कारण एशिया में राज गिध्द और नीलकंठ जैसे 300से भी अधिक पक्षी विलुप्ती का संकट झेल रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व वर्ल्डवाइड इंस्टीटयूट के 180से अधिक पक्षी विशेषज्ञों  23एशियाई देशों पर केन्द्रित रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें कहा गया कि 2700 प्रजातियों मे से 323 प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। विशेषज्ञों ने 41 ऐसी प्रजातियों की पहचान की है जिनकी स्थिति खतरनाक हो गई है।  एशिया में सबसे अधिक खराब स्थिति इंडोनेशिया की है वहां पक्षियों की लगभग 115 प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पाई गईं। बेलगाम आधुनिकता की तेज रफतार से नाचती दुनिया में आदमी प्राकृतिक संसाधनों का असावधानीपूर्वक दोहन न केवल अपनी आवश्यकता पूरी करने बल्कि लालच के चलते कर रहा है उससे हमारी पृथ्वी पर मौजूद चिड़ियों की अनेक प्रजातियां लुप्त होकर सिर्फ आंकड़ों के रूप में किताबों की शोभा बढ़ा रही हैं। वर्ल्ड वाइड इंस्टीटयूट का कहना है कि आने वाल सालों में आठ में से एक चिड़िया या पक्षी की प्रजाति लुप्त हो जाएगी और इसकी वजह पक्षियों के आवास का उजड़ना और मानव आबादी का बेतहाशा बढ़ना है।

               'थ्रेटेन्ड बड्स आफ एशिया' यह पुस्तक डब्लूडब्लूएफ नामी संस्था द्वारा जारी की गई है जिसमें दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों के विलुप्त होने से उसके प्राकतिक वासस्थान का नष्ट होना प्रमुख कारण बताया गया है। पिछले दो दशकों में इन्सान ने ढेरों जंगलों को उजाड़ दिया हैऔर दलदली भूमि में उगी झाड़ियों को कृषि कार्य के लिए साफ कर दिया है पक्षी विज्ञानियों के अनुसार यही पक्षियों का प्रमुख वासस्थान था। विभिन्न देशों की सरकारें तर्क देती हैं कि यदि हमने जंगल उजाड़े हैं तो नए जंगल भी लगाए हैं गौरतलब है कि यदि इन सरकारों के दावे को मान भी लिया जाए तो सच्चाई यह है कि जो जंगल लगाए गए हैं उनमें व्यावसायिक दृष्टिकोण को महत्व दिया गया है पक्षियों के लिए वहां वासस्थान नहीं बन पाए हैं।

                 दरअसल पक्षियों का होना न सिर्फ जैव परिस्थितिकी के संतुलन के लिए आवश्यक है बल्कि समाज के लिए भी जरूरी है। इसे गिध्द और कौवे के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। गिध्द मरे हुए जानवरों को खाकर जिंदा रहता है यदि गिध्द न हों तो गाय,भैंस जैसे बड़े जानवरों के शव यूं ही सड़ेगे और सड़ांध फैलायेंगे। अंतत: उस जगह महामारी फैल सकती है इसी प्रकार कौवे भी गांव-मोहल्ले की गंदगी साफ करते हैं। प्रख्यात पक्षी विज्ञानी डॉ सालिम अली की टिप्पणी की थी कि भारत में न सिर्फ खुद-ब-खुद पक्षी विलुप्त हो रहे हैं बल्कि स्थानीय लोग भी उसे संरक्षण देने के बजाए शिकार करते हैं। स्थानीय लोगों की इस शिकारी प्रवृत्ति के कारण न सिर्फ नीलकंठ, हरियल, बंगेरी सहित असंख्य देसी पक्षी विलुप्त हो रहे हैं बल्कि प्रवासी साईबेरियाई पक्षियों का भी आना कम हो गया है। इसी तरह जल में रहने वाले अनेक बड़े पक्षी अपने स्वाभाविक भ्रमण की आदत छोड़ रहे हैं जहां ये पक्षी प्रवास पर आते रहे हैं क्योंकि वहां उनका शिकार किया जाने लगा है, आंकडे ग़वाह हैं पिछले कुछ वर्षों के दौरान सायबेरियन 'केन' काले सिर वाली 'स्पूनबिल' आदि का भारत आना काफी कम हो गया है। शरद ऋतु के दौरान विदेशी पक्षियों के भारत के विभिन्न रायों में आने की दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है।

               चिड़ियों और पक्षियों के संरक्षण के लिए समाज को एकजुट होकर सोचना होगा, उनकी दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण के लिए योजनाबध्द रणनीति लागू करनी होगी, शिकार करने वालों के लिए सख्त कानून अपनाने होंगे और दलदल तथा नम भूमि सहित अनेक ऐसे स्थान विकसित करने होंगे जिनमें ये परों वाले हमारे दोस्त निर्विघ्न होकर स्वतंत्रतापूवर्क विचरण कर सकें।

? शब्बीर कादरी