संस्करण: 17 दिसम्बर -2012

भगवा छत्रपों में

सत्ता का अहंकार

?    विवेकानंद

               किसी भी दल के नेताओं में सत्ता की अभिलाषा होना स्वाभाविक है, लेकिन भाजपा एक ऐसी पार्टी है जिसके नेताओं में सत्ता की आकांक्षा अधिक बलबती दिखती रही है। और इसके लिए इस पार्टी के नेता कई बार ऐसे काम कर जाते हैं जिससे लाभ कम हानि यादा होती है। हाल ही में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने अपनी पार्टी कर्नाटक जनता पार्टी बनाकर भाजपा को चुनाव मैदान में उतने की चुनौती दे दी है। सरकार में उनके समर्थक मौजूद हैं,इसलिए यदि कहें कि इस वक्त कर्नाटक की जगदीश शेट्टार सरकार उनके रहम-ओ-करम पर चल रही है तो कुछ गलत नहीं होगा। पार्टी की चेतावनी नजरअंदाज करके 13विधायक और सात मंत्रियों ने उनकी रैली में भाग लिया। यह वही येदियुरप्पा हैं जिन पर भ्रष्टाचार के कई मामलों से चल रहे हैं,बावजूद इसके उनकी मांग थी कि पार्टी उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाए या फिर राय में पार्टी प्रमुख का पद दे। येद्दि की मांग जायज नहीं थी लेकिन लिंगायत समुदाय पर उनकी पकड़ और सरकार में बैठे लोगों के समर्थन ने उन्हें विवश कर दिया कि वे खुद को पार्टी से बडा साबित करके दिखाने पर आमादा हो गए। यह अहंकार था जो सत्ता पाने के बाद आया था। वरना पिछले 40 साल से तो पार्टी के कार्यकर्ता ही थे।

               गहराई से देखें तो भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने जब तक सत्ता का स्वाद नहीं चखा था तब तक उसके नेता ऐसे नहीं दिखाई देते थे। जहां-जहां भाजपा की सरकार बनती गई वहां-वहां नेता अहंकारी होते गए और खुद को पार्टी से बड़ा समझने लगे। धन की चमक दिखी तो खाने की भूख जाग गई और देश का सबसे साफ सुथरा विपक्ष  भ्रष्टाचार और अहंकार के घटाटोप अंधेरे में डूब गया।

               सत्ता के अहंकार का सबसे पहले उदाहरण पेश किया था गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने। गुजरात में गोधरा कांड के बाद वाजपेई जी ने मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह दी थी। उन वाजपेई,जिनकी एक आवाज पर देश कान टिका देता था, उन्हीं के मातहत काम कर चुके मोदी ने उन्हें अनसुना कर दिया। यह ठीक है कि मोदी गुजरात के रक्तपात में ही कमल खिलाने में सफल हो रहे हैं,लेकिन पार्टी और पार्टी के वरिष्ठों का तिरस्कार करने वाले वे पहले नेता बने, सत्ता पाने के बाद। मोदी का यह अहंकार यहीं नहीं रुका, जब-तब वे पार्टी पर भारी पड़ते रहे और फिलहाल तो संघ को भी आंखें दिखाने से नहीं चूकते। हाल ही में उन्होंने संघ के कर्मठ नेता संजय जोशी को पार्टी से निकलवाकर पार्टी से बड़े होने का सबूत दे दिया। और जब से उनके प्रधानमंत्री बनने की चर्चाएं शुरू हुई हैं, तब से तो वे खुद को खुदा ही मान बैठे हैं। पार्टी के शिष्टाचार को तो छोड़िए सामान्य शिष्टाचार से भी संघ के इस अनुशासित सिपाही ने नाता तोड़ लिया। एक महिला को सामान्य रूप से 50करोड़ की गर्ल्डफ्रेंड कहकर उसका अपमान किया।

               यदि यह कहें कि इसमें केवल मोदी का दोष है तो यह गलत होगा। इसमें पार्टी का भी दोष है। सफलता का मायने यह नहीं कि उसके सही-गलत किसी भी कार्य को स्वीकार किया जाए। जब-जब और जहां-जहां ऐसी गलतियां होती हैं, या हुई हैं उसका परिणाम प्रतिकूल ही निकला है। मोदी ने जब से गुजरात की सत्ता संभाली पार्टी ने अन्य नेताओं को भाव देना बंद कर दिया। इनमें अनेक नेता ऐसे हैं जिन्होंने अपने खून-पसीने से गुजरात में कमल को खिलाया। लेकिन जब पार्टी ने केवल मोदी को ही महान मान लिया तो उन्हें अपना अलग रास्ता चुनना पड़ा। केशूभाई पटेल उन्हीं नेताओं में से एक हैं। मोदी के लगातार तिरिस्कारपूर्ण व्यवहार के कारण उन्हें नई पार्टी बनानी पड़ी और आज वे मोदी को चुनौती दे रहे हैं। शंकर सिंह बाघेला भी इसी दुख का शिकार होकर कांग्रेस के साथ हैं।

               अहंकार का यह अवगुण केंद्रीय नेतृत्व में भी दिखा। इसी के चलते संघर्ष में मजबूत होने के बाद भाजपा लगातार बिखरती चली गई। पार्टी के भीतर से लोकतंत्र मर गया। नेताओं में एक दूसरे को नीचा दिखाकर खुद को ताकतवर सिध्द करने की होड़ लग गई। और इनमें से कई नेताओं,जो अपनों से ताकतवर के शिकार हुए उन्होंने केशूभाई की तरह वक्त-वक्त पर पार्टी को चुनौती दी। भारत-पाक विभाजन के लिए जिम्मेदार कहे जाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना पर किताब लिखना जसवंत सिन्हा को भारी पड़ गया। उन्हें 2009में बीजेपी से निकाल दिया गया। हालांकि बाद में उनकी वापसी भी हो गई। लेकिन उन्हें निकाला क्यों गया इसके विषय में बहुत कम लोग जानते हैं। जिन्ना तो एक बहाना थे, असल बात यह थी कि एक वक्त पर जब आडवाणी जी बाबरी मस्जिद ध्वंस के केस में घिरते नजर आ रहे थे,तब उनकी गैरमौजूदगी में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की जो सूची बनी थी उसमें जसवंत सिंह का भी नाम था। बस यही उनके खिलाफ पार्टी में षडयंत्र का कारण बना और अंतत:जिन्ना मुद्दे पर जसवंत को पार्टी से बाहर कर दिया गया।

               मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री चुनी गई उमा भारती को भी 2003 में पार्टी से बाहर निकाल दिया गया। हालांकि उमा भारती स्वयं केंद्रीय सत्ता में मंत्री रहते हुए इतनी अहंकारी हो गई थीं कि उन्होंने पार्टी के बुजुर्ग नेताओं की इजत करना बंद कर दिया था। वे खुद को बहुत बड़ा समझने लगी थीं। उमा भारती को इसलिए पार्टी से बाहर कर दिया गया था कि उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी की बैठक में सरेआम पार्टी नेताओं को ही चुनौती दे डाली थी। पार्टी से निकाले जाने के बाद उमा भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी नाम से अपनी अलग पार्टी भी बना ली। लेकिन वे कामयाब नहीं हुईं। लंबे वक्त के बाद नितिन गडकरी ने प्रयास किए और जून 2001 में उनकी भाजपा में वापसी हुई। इसी तरह कल्याण सिंह जो कभी उत्तरप्रदेश में भाजपा के हिंदुत्व का चेहरा हुआ करते थे, पार्टी से बाहर जाना पड़ा। वर्ष 1999 में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। कारण इतना था कि यूपी में उनका जनाधार बढ़ रहा था और पार्टी नेताओं को यह अच्छा नहीं लग रहा था। इसलिए उनके खिलाफ जमकर लॉबिंग की गई और उन्हें पार्टी से बाहर करवा दिया गया। इसके बाद 5जनवरी 2000को उन्होंने जनक्रांति पार्टी बना ली। यूपी में पार्टी को खासा नुकसान पहुंचाया तब पार्टी ने 2004 में उन्हें पुन: वापस बुला लिया लेकिन फिर भी खटपट जारी रही और 2007 में उन्होंने खुद ही पार्टी से किनारा कर लिया। अब चर्चा है कि गडकरी उन्हें वापस लाना चाहते हैं, लेकिन वे खुद ही इस वक्त पार्टी के सबसे बड़े संकट साबित हो रहे हैं। पार्टी हालांकि अपनी जिद पर कायम है कि गडकरी निर्दोष हैं, पर पार्टी के नेता कह रहे हैं कि खुद ही फैसला करने की आदत गलत है। लेकिन संघ का अदृश्य डंडा घूम रहा है इसलिए लालकृष्ण आडवाणी जी भी सिर झुकाए सबकुछ बर्दास्त कर रहे हैं। पार्टी की चौतरफा थू-थू हो रही है, लेकिन जिद की कील से पार्टी के माथे पर ठुका स्वार्थ और अहंकार इतना मजबूत है जो मानने को तैयार ही नहीं है। इसके उलट वह उन नेताओं को ही पार्टी से निकालने पर आमादा है जो मौके और वक्त की नजाकत देखकर पार्टी को पुन: स्थापित कर सकने वाले निर्णय लेने की सलाह दे रहे हैं। राम जेठमलानी कैसा भी बोलते हों लेकिन इस वक्त उनकी मांग जायज है। पार्टी यदि गडकरी को अध्यक्ष पद से हटाती है तो उसकी साख बनेगी और वाकई वह उस श्रेणी में एक बार फिर खड़ी दिखाई देगी जिसका दावा किया करती है। यशवंत सिन्हा भी सही कह रहे हैं कि ऐसा न करके बीजेपी जनता के उस भरोसे को तोड़ रही है जो जनता ने उससे पिछले 10 वर्षों में उससे बांधा है। लेकिन कमाल यह है कि भाजपा उन्हें बाहर वाला मानती है। कई नेता तो यहां तक कहते हैं कि पार्टी में उनका योगदान ही क्या है। जिस पार्टी में इस तरह का माहौल हो और ऐसे अहंकारी नेता हों वह सत्ता की स्वभाविक दावेदार कैसे हो सकती है? जनता यही सोच-सोचकर परेशान है।

? विवेकानंद