संस्करण: 17नवम्बर-2008

25 नवंबर-विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस पर विशेष

''हरित भंडारों का निरंतर क्षरण, कैसे हो पर्यावरण संरक्षण''

स्वाति शर्मा

भारत के किसी भी बड़े शहर को देख कर पर्यावरण पर जनसंख्या के दबाव का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। मुंबई में रेलवे स्टेशन के भीतर और बाहर लोग कीड़ों की भांति रेंगने दिखाई देते हैं, लोगों का यह समुद्र जब काम पर जाने के लिए उमड़ता है तो स्टेशनों और आस-पास के वातावरण को प्रदूषित करता है। दिल्ली में पूरी सर्दी के मौसम में आप आकाश में झिलमिल करते तारों का अवलोकन नहीं कर सकते क्योंकि वाहनों से निकले कार्बन से प्रदूषण का जो बादल बनता है, वह पूरे शहर पर छा जाता है। विज्ञान और पर्यावरण केन्द्र के अनुसार दिल्ली में प्रति घंटे एक व्यक्ति की मौत वायु-प्रदूषण के कारण हो रही है। वास्तव में पिछले 20 वर्षों में भारत में सकल घरेलू उत्पाद तो दुगना हुआ है लेकिन वाहन प्रदूषण आठ गुना और औद्योगिक प्रदूषण चार गुना बढ़ा है। इन समस्याओं के मूल में जाएँ तो पाएँगे कि इनकी मुख्य वज़ह जनसंख्या वृध्दि तथा हरित भंडारों का क्षरण है।

पर्वतीय और मैदानी भागों में वनों तथा तटवर्ती क्षेत्रों में कच्छ वनस्पति के -हास से और टयूब वेल आदि के द्वारा भूमिगत जल के अधिक दोहन से भारत में बाढ़ तथा सूखा बारह मासी समस्याएँ बन गए हैं। पूर्वोत्तर भारत में चेरापूंजी भी, जहाँ वर्षा पूरे देश में सर्वाधिक होती थी, पानी की कमी का सामना कर रहा है। इसका कारण यही है कि वनों का -हास हो रहा है और जल संरक्षण की परंपरागत पध्दतियों को तिलांजलि दे दी गई है। छोटे और बड़े शहरों में पानी के लिए बर्तन हाथ में लिए लोगों की लंबी कतारें आम बात हो गई हैं और पानी के लिए लड़ाई झगड़े बढ़ते ही जा रही हैं। वास्तव में जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण ही वन संपदा सहित प्राकृतिक संसाधनों का अत्याधिक दोहन हो रहा है। बिहार, मधय प्रदेश, राजस्थान व उत्तर प्रदेश चार ऐसे राज्य हैं जिनमें जच्चा-बच्चा मृत्यु, निरक्षरता और मानव विकास संबंधाी आंकड़े बेहद खराब हैं। ये राज्य परिवार नियोजन के क्षेत्र में भी पिछड़े हुए हैं। इन चार राज्यों में भारत की जनसंख्या का 39 प्रतिशत हिस्सा वास करता है। यदि जनसंख्या वृध्दि की वर्तमान दर जारी रही तो 2050 तक का पिछड़े राज्यों में देश की आबादी का 54 प्रतिशत हिस्सा वास करेगा। दक्षिणी राज्यों-केरल, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु में देश की आबादी का 16 से 17 प्रतिशत हिस्सा ही रहेगा क्योंकि इन राज्यों ने अपनी जनसंख्या वृध्दि दर में स्थिरता लाने में सफलता प्राप्त की है और मानव विकास के क्षेत्र में भी इनकी उपलब्धियाँ बेहतर रही हैं।

भारत में 1987-89 के दौरान 19 प्रतिशत, भूभाग पर वन था, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की जो रिपोर्ट उपग्रह के माधयम से दुनिया भर के जंगलों के छायाचित्र लेकर तैयार की गई है, के अनुसार देश का अब केवल 8 प्रतिशत भू-भाग ही वनाच्छादित रह गया है। यह जंगलों की निरंतर कटाई का ही नतीजा है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट के अनुसार वनाच्छान और वन गुणवत्ता में सुधार की जो उम्मीद की जा रही है, जनसंख्या वृध्दि उससे कहीं अधिक तेजी से होने की संभावना है। सरकार की संयुक्त वन प्रबंधन नीति और पिछले 10 वर्षों में वृक्षारोपण के सहकारिता आंदोलन के बावजूद इस दिशा में ठोस नतीजे सामने नहीं आए हैं। प्रति व्यक्ति वनाच्छादित क्षेत्र की उपलब्धिता में तेजी से कमी आई है। भारत के वन विश्व वनों के अनुपात में केवल 2 प्रतिशत हैं। प्रति व्यक्ति 0.80 हेक्टेयर वन क्षेत्र के विश्व अनुपात की तुलना में हमारे यहाँ केवल 0.11 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति से भी कम वनभूमि उपलब्ध है। एक सर्वेक्षण के अनुसार पिछले चार दशकों में म.प्र. के 18 हजार 98 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा वनों का विनाश हुआ है। पूरे देश में वनों के विनाश की तुलना में 43 प्रतिशत अकेले मधयप्रदेश में हुआ है। प्रदेश के गठन के समय यहाँ 39 प्रतिशत वन थे, जो पहले घट कर 20 प्रतिशत हुए और अब केवल 8 प्रतिशत शेष रह गए हैं।

राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और बाघ सुरक्षित क्षेत्र, जो देश के कुल वन क्षेत्र का करीब 3 प्रतिशत हैं, जैव विविधाता और जीवन के असंख्य रूपों की दृष्टि से अत्यंत समृध्द हैं, किंतु उन पर भी अब भारी दबाव है। चोरी छिपे शिकार करने वाले और गरीबी की वजह से वनों में जा बसने वालों से हमारे वन्य जीवों को आघात पहुँच रहा है। खेती की जमीन, चारागाह और वनों पर बढ़ते-दबाव तथा गरीबी के कारण रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों और औद्योगिक केन्द्रों की ओर पलायन हो रहा है। शहरीकरण के कारण भी इमारती लकड़ी, जलाऊ लकड़ी और कागज की मांग में तेजी से वृध्दि हुई है जिससे वनों का -हास हुआ है और उनकी गुणवत्ता प्रभावित हुई है। वनों के -हास का एक अमानवीय पक्ष यह भी है कि इससे समाज के कमजोर वर्गों और पहले से ही संकटग्रस्त उन महिलाओं पर दबाव और बढ़ गया है, जिन्हे परंपरागत ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ईंधान, चारा, छोटे-मोटे वनोत्पाद, व पानी ढोकर लाना पड़ता है।

पर्यावरण के मुद्दे पर भारत की चिंता से समूचा विश्व सहमत हैं। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र ने पूरे विश्व को ही पर्यावरण संरक्षण हेतु एकजुट होने का आह्वान किया है। अब समय आ जाए। अगर हमने जीने का ढंग नहीं बदला तो न केवल खुद के लिए बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए भी हम घोर संकट खड़ा कर देंगे। वास्तव में एक प्रजाति के रूप में आज हमारा अस्तित्व खतरे में है। हम सभी को चाहिए कि विश्व को हरा-भरा और सुंदर बनाने में हम अपना योगदान दें।

 

स्वाति शर्मा