संस्करण: 17नवम्बर-2008

सिर्फ़ गंगा नदी की चिन्ता क्यों ?

 

डॉ.गीता गुप्त

केन्द्र सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने का निर्णय किया है। गंगा नदी से भारतवासियों का आध्यात्मिक एवं भावनात्मक लगाव सर्वविदित है। इस देश में अनेक नदियाँ हैं और आदिकाल से उनकी पूजा का विधान यहाँ प्रचलित है। पर्वों-त्योहारों पर यहाँ पवित्र स्नान की परम्परा युगों-युगों से चली आ रही है। मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त सम्पन्न होने वाले विभिन्न संस्कारों में नदियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है परन्तु भारतीयों के हृदय में गंगा का विशेष स्थान है। प्राय: धार्मिक संस्कारों में गंगाजल का उपयोग अनिवार्यत: किया जाता है। यह भी लोक विश्वास है कि मरणासन्न व्यक्ति के मुख में पवित्र गंगा-जल डालने से मृत्यु का कष्ट कम होता है और आत्मा शरीर से मुक्त हो जाती है। सचमुच, यह आश्चर्यजनक है।

दु:ख की बात यह है कि मनुष्य ने प्रकृति से सिर्फ़ लेना सीखा है। समस्त प्राकृतिक संसाधनों का असीम दोहन उसकी लिप्सा वृत्ति का प्रमाण है। नदियों पर बांध बना दिये गये, विद्युत-उत्पादन और सिंचाई के लिए जल का उपयोग सुनिश्चित कर दिया गया। नदी के प्रवाह को रोककर बांध बनाने और लाभ कमाने की युक्ति तो मनुष्य को सूझी परन्तु नदी के निचले हिस्से की चिन्ता उसे नहीं हुई। नदियों का अस्तित्व कैसे कायम रहेगा ? यह सोचने की ज़हमत उसने नहीं उठायी। पर्व-त्योहारों और धार्मिक संस्कारों के बहाने नदियों का जल निरन्तर प्रदूषित किया जाता रहा लेकिन कभी किसी के मन में यह विचार नहीं आया कि नदियों के साथ मानव का व्यवहार कितना अमानवीय हो चला है ? और यह भी, कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन नदियों का जीवन ख़तरे में पड़ जाएगा। मोक्षदायिनी गंगा अब कितनी प्रदूषित हो चली है ? यह आख़िर किसने किया ?

यहाँ प्रत्येक संकट के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। समाधान की अपेक्षा भी सरकार से ही की जाती है। जबकि यह सर्वथा अनुचित है। करे कोई-भरे कोई, आखिर क्यों ? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने भारतवासियों के लिए गंगा के महत्व को समझते हुए उसे राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मंशा ज़ाहिर की है। शोयद वे सोचते जों कि ऐसा करके देशवासियों को नदी की रक्षा के लिए प्रेरित किया जा सकेगा और गंगा के प्रदूषण पर रोक-थाम आसान हो जाएगी। लेकिन यह असम्भव है। इससे इतना ही सम्भव होगा कि गंगा का एक और स्वच्छता-अभियान आरम्भ हो जाएगा और आसानी से करोड़ों के वारे-न्यारे हो जाएँगे। क्योंकि मनमोहन सिंह जी पहले सत्ताधीश नहीं है, जिनके मन में गंगा के संरक्षण की चिन्ता उपजी हो। स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने प्रधानमंत्री का पद-भार ग्रहण करने के उपरान्त सर्वप्रथम जो महत्वपूर्ण निर्णय लिये थे, उनमें गंगा एक्शन प्लान भी शामिल था। उन्होंने गंगा के स्वच्छता-अभियान में फ्रांसीसी सहयोग की आकांक्षा से पेरिस-यात्रा भी की थी और सन् 1985 में ही बड़े जोर-शोर से गंगा का प्रदूषण स्तर कम करने के लिए 'गंगा एक्शन प्लान' प्रारम्भ किया गया था, जो बुरी तरह विफल रहा।

गंगा एक्शन प्लान के अन्तर्गत भारत के 25 ए श्रेणी के नगरों से प्रतिदिन निकलने वाले 1340 मिलियन लीटर अनुपयोगी जल में से 882 मिलियन लीटर जल को रोकने, धारा की दिशा बदलने और जल-शुध्दिकरण पर विचार होना था। यह कार्य सन् 1990 तक राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय द्वारा पूर्ण किया जाना था। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया अतएव इस कार्य की अवधि सन् 2000 तक बढ़ा दी गयी। परन्तु 15 वर्षों के बाद भी गंगा का प्रदूषण-स्तर यथावत विद्यमान रहा। लगभग 901.71 करोड़ रुपये व्यय होने के बावजूद गंगा पूर्वापेक्षा अधिक बुरी दशा में है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी इस पर चिन्ता व्यक्त की जा चुकी है और मुख्य न्यायाधीश श्री के.जी. बालकृष्णन ने धन के अपव्यय को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि सम्पूर्ण राशि डकार ली गयी जबकि जनहित में उसका सदुपयोग किया जा सकता था।

अब पुन: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गंगा की स्वच्छता के लिए योजना लागू करने के इच्छुक हैं। योजना के प्रयासों पर नज़र रखने के लिए उन्होंने एक प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव रखा है। तदनुसार प्रधानमंत्री स्वयं प्राधिकरण के अधयक्ष तथा गंगा के प्रवाह से सम्बन्धित राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य होंगे। चिन्ताजनक बात यह है कि 15 वर्षों तक चले 'गंगा एक्शन प्लान' की घोर असफलता और भारी-भरकम राशि के दुरूपयोग को नज़रन्दाज नहीं किया जा सकता।जिससे सिध्द हो चुका है कि सरकार के बूते पर गंगा को प्रदूषण-मुक्त बना पाना सम्भव नहीं है। इसकी चिन्ता समाज को करनी होगी। योजनाओं के बहाने तो मुट्ठी भर अधिकारी अपना घर भरते आये हैं और भरते रहेंगे। भोपाल की भोज वेटलैण्ड परियोजना का एक और उदाहरण हमारे सामने है। जिसमें सिर्फ़ काग़जों पर ही झील की साफ़-सफाई के लिए लगभग ढाई सौ करोड़ रुपये ख़र्च हुए हैं क्योंकि झील तो अनवरत्-प्रदूषित होती चली गयी है। कथन का आशय यह है कि सरकारी योजनाएँ नदियों की दशा नहीं सुधार सकतीं। बढ़ते जल-संकट के कारण अब देश की जनता जल का महत्व समझने लगी है। ऐसी स्थिति में जन-जागरण से ही नदियों, झीलों और अन्य जल-स्त्रोंतों की अस्तित्व-रक्षा सम्भव है। शासन के प्रयास अपनी जगह हैं, पर इसमें जनता की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो चली है।

उल्लेखनीय है कि भारत की जनसंख्या जितनी तीव्र गति से बढ़ रही है, उतनी ही तीव्रता से गंगा का प्रदूषण भी बढ़ रहा है। अपने उद्गम स्थल हिमालय की गंगोत्री से प्रवाहित होने वाली गंगा बंगाल की खाड़ी गंगासागर अर्थात् 2510 किलोमीटर की दूरी तक व्याप्त है। यमुना, सोन, महानन्दा, कोसी, महाकाली, करनाली, गण्डक और घाघरा उससे मिलने वाली प्रमुख  नदियाँ हैं। गंगा के तट पर ' ए' श्रेणी के उनतीस बड़े शहर बसे हुए हैं, जिनकी जनसंख्या एक लाख से अधिक होती है। तेईस शहर 'बी' श्रेणी के हैं, जिनकी जनसंख्या पचास हज़ार से एक लाख होती है। इसके अलावा सत्तर कस्बे और अनेक गाँव बसे हुए हैं। इस समूची आबादी से गंगा के प्रदूषण में भयंकर वृध्दि हो रही है। 35-40 वर्ष पूर्व उत्तरकाशी में साधु-सन्तों के गिने-चुने आश्रम थे किन्तु आज वहाँ घनी आबादी है। हरिद्वार, कानपुर, कन्नौज, वाराणसी, पटना आदि बड़े शहरों से होकर बहने वाली गंगा को इन स्थानों से लगातार प्रदूषण की भेंट मिल रही है। इन शहरों में प्रति वर्ष लाखों श्रध्दालु और पर्यटक गंगा-स्नान व दर्शन करने पहुँचते हैं, जिनसे पर्यटन-उद्योग को आर्थिक लाभ होता है। इसके बावजूद गंगा की स्वच्छता पर गम्भीरतापूर्वक धयान न दिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है।

गंगा में ऐसे बैक्टीरिया पाये जाते हैं जो अनेकानेक रोगों को दूर करने में सहायक होते हैं, किन्तु निरन्तर बढ़ते प्रदूषण के कारण उसका जल अपनी यह गुणवत्ता खोने लगा है। गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने से उसके संरक्षण और देखभाल के लिए विशेष कार्य योजना निर्मित की जाएगी। इसके अन्तर्गत सर्व प्रमुख कार्य गंगा को प्रदूषण-मुक्त बनाना होगा। चिन्ता की बात यह है कि प्राय: सभी सरकारें प्राकृतिक संसाधनों के प्रति उपभोक्तावादी दृष्टिकोण रखती हैं। जब नदियों का प्रबंधान उनके हाथ में होता है तो परियोजना के बहाने सम्बन्धित अधिकारी सपरिवार अपने दीर्घ सुखमया जीवन का प्रबंधान कर लेते हैं, योजनाएँ धारी की धारी रह जाती हैं।

यह भी सच है कि अब नदियों के किनारे तटबन्धा बना दिये जाते हैं, विशाल भवन और पांच सितारा होटलों का निर्माण कर दिया जाता है। सस्ती बिजली मिलने के कारण नदियों के किनारे बसे ग्रामवासी खेतों में सिंचाई के अलावा भी पानी का अंधाधुंध दुरुपयोग करते हैं। तीज-त्योहारों पर कर्मकाण्डों के माध्यम से नदी में प्रवाहित की जाने वाली अनेक वस्तुएँ और अनगिनत मूर्तियों का विसर्जन भी प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण हैं।

गंगा ही नहीं, देश की तमाम नदियों के प्रति मनुष्य में अटूट आस्था, श्रध्दा और विश्वास है। चूँकि सिंचाई, बिजली एवं अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जल की उपलब्धता सदैव अनिवार्य रहेगी अत: अब नदी के संरक्षण का दायित्व समाज को ही सामूहिक रूप से सौंपा जाना चाहिए। अपनी धार्मिक परम्पराओं में अब समयानुरूप परिवर्तन कर सिर्फ़ गंगा ही  नहीं बल्कि प्रत्येक नदी के संरक्षण के लिए सामूहिक पहल करनी चाहिए। सरकार के भरोसे गंगा तो क्या, किसी भी नदी की रक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती। चूंकि मानव समाज का नदियों से सीधा सरोकार है अत: इस समाज को ही नदी के संरक्षण का उपाय करना चाहिए। सरकारी प्रयास का दुष्परिणाम विगत तेईस वर्षों से जनता देख भी रही है।

यह वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण का दौर है। सरकारें अधिकाधिक लाभ अर्जित करने हेतु आतुर हैं। उनके द्वारा आम जनता के हितों की अवहेलना कर निजी कम्पनियों और उद्योगपतियों को लाभ पहुँचाना सामान्य बात हो गई हैं। प्रसंगवश्, यहाँ उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने अपने यहाँ बहने वाली शिवनाथ नदी को एक उद्योगपति को बेच दिया है और ऐसा करके नदी किनारे बसे हुए लोगों को जल की नैसर्गिक सुविधा से वंचित कर दिया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार और उद्योग पतियों के उपभोक्तावादी दृष्टिकोण एवं जनता के अविवेकपूर्ण आचार से असमय ही नदियों पर अस्तित्व, समाप्त हो जाने का ख़तरा मंडरा रहा है। जबकि नदियाँ मोक्षदायिनी ही नहीं, जीवनदायिनी भी हैं। जल नहीं होगा तो हमारा 'कल' कैसे सुरक्षित होगा ? अकेले गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने से कुछ लाभ नहीं होगा। 'राष्ट्रीय' विशेषण जड़ देने से गंगा नदी प्रदूषण मुक्त नहीं हो जाएगी। उसके समानान्तर प्रवाहित भ्रष्टाचार की गंगा उसका कल्याण नहीं होने देगी।

वैसे भी जल-प्रदूषण और जल संकट पूरे भारत में व्याप्त है, इसलिए सभी नदियों, झील-तालाबों, कुओं-बावड़ियों और जलाशयों को संरक्षण की आवश्यकता है। इन सबको राष्ट्र की सम्पदा समझा जाना चाहिए और सबके संरक्षण का उपाय किया जाना चाहिए। वस्तुत: नदी और समाज के बीच जो महत्वपूर्ण जीवन्त सम्बन्ध है, उसे ध्यान में रखकर उनके सामूहिक संरक्षण और समुचित प्रबंधन की ठोस पहल की जानी चाहिए। तभी सुखद परिणाम सामने आएँगे।

 

डॉ.गीता गुप्त