संस्करण: 17नवम्बर-2008

दलित उत्पीड़न और सत्ता मोह

 

 

प्रमोद भार्गव

त्तर भारत के दलित मुख्यमंत्री मायावती के सत्ता में आने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि दलित उत्पीड़न की घटनाएं बतौर अपवाद ही सामने आएंगी और सामाजिक समरसता का वातावरण निर्मित होगा । लेकिन ये संभावनाएँ अटकले ही रहीं । जातीयता की बुनियाद पर टिका दलित उत्पीड़न जड़ हो चुकी परंपराओं के बहाने नित नई घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है और सत्तारूढ़ मायावती हैं कि सत्ता और संपति विस्तार के मोह जाल में कानूनी शिकंजे को शिथिल करने में लगी हैं।

 उत्तर प्रदेश के बुंदेलखण्ड क्षेत्र में आने वाले महोबा जिले के ग्राम बसौरा के एक तेरह - चौदह साल के दलित किशोर को सिर्फ इसलिए क्रूरतम यातना दी गई क्योंकि उसने सहज भाव से किशोर के ही साथ कुएं पर नहा रही सवर्ण बालिका का हाथ अपने हाथ में ले लिया था । गांवों में कुओं तालाबों पर अक्सर बालक - बालिकाएं साथ - साथ हंसी - ठट्टा करते हुए बालोचित हरकतें करते रहते हैं, जिन्हें कोई भी समाज रेखांकित नहीं नहीं करता और न ही ऐसी हरकतों को छेड़छाड़ की श्रेणी में रख पुलिस कारवाई की जाती है । पर महोबा में उस बालक के साथ जो घटा वह बेहद पीड़ादायक एवं हृदय विदारक था । बालक की पहले तो निर्ममतापूर्वक पिटाई लगाई गई । फिर उसे ट्रेक्टर के पीछे बांधकर घसीटते हुए गांव का चक्कर लगाया गया। बालक जब मरणासन्न हो गया तो उसे भगवान भरोसे रास्ते में ही छोड़ दिया गया।

 मायावती के सिंहासनारुढ़ होने के बाद दबंगों द्वारा किसी दलित को अपमानित व प्रताड़ित करने वाली यह पहली घटना नहीं है। इसी साल मई में मथुरा जिले के तरौली - झनौटी गांव की छह साल की दलित बच्ची को आग की लपटों में झोंक दिया गया था। इस बच्ची का अपराध सिर्फ इतना था कि वह अपनी माँ के साथ उस खेत की पगडंडी से गुजर रही थी जिस पर एक सवर्ण दबंग का कब्जा था। पहले कब्जाधारी युवक ने खेत से दलित के गुजरने पर बाधा उत्पन्न की लेकिन माँ ने वही से निकलने की जिद्द की तो आक्रोशित युवक ने बच्ची को माँ के हाथ से झपटकर उस कचरे के ढेर पर पटक दिया जिसे नष्ट करने के लिए जलाया जा रहा था।

इस घटना के कुछ दिन पहले ही जब फर्रुखाबाद जिले के रशीदपुर गांव में दबंग सवर्णों ने उस समय एक दलित दूल्हे और बरातियों की पिटाई लगा दी जब वह सवर्णों के घरों के सामने से घोड़ी पर सवार होकर गुजर रहा था। दलित युवतियों से सामूहिक बलात्कार और दलितों को खौलते तेल की कहाड़ी में डालने के झकझोर देने वाले भी कुछ मामले भी सामने आए हैं।

दलित मुख्यमंत्री के राज में यह उम्मीद करना जायज है कि दलित, वंचितों और लाचारों को शोषण से मुक्ति मिलेगी। उन्हें कानूनी हक मुहैया होंगे। सामाजिक न्याय के हकदार वे पूरी ठसक से होंगे। पुलिस कानूनी कारवाई तो करती है पर प्राथमिकी कुछ इस अंदाज में दर्ज किए जाते हैं कि आरोप कमजोर रहें जिससे अपराधाी को अव्वल तो थाना में ही जमानत मिल जाए या फिर आरोपी अदालत में पेश होने के साथ ही बेल आउट हो जाए। माया - राज की विडंबना तो यह हो गई कि मायावती ने देखते - देखते अनुसूचित जाति - जनजाति अत्याचार निरोधाक अधिनियम को ही कानूनी शिथिलता में ढाल दिया। जिससे दलित उत्पीड़न के आरोपी को दण्ड झेलने से बच निकलने में आसानी हो। इस अधिनियम में संशोधन करने से पहले तक बाईस प्रकार के शोषण व उत्पीड़न रेखांकित थे, जिनके तहत दलित एफआइआर दर्ज करा सकते थे। लेकिन संशोधन के बाद केवल हत्या और बलात्कार के मामले में ही दलित सीधो प्राथमिकी दर्ज करा सकते हैं। अन्य बीस प्रकार के मामलों में तो पुलिस परीक्षण के बाद ही प्राथमिकी संभव है। पुलिस एफआईआर किस बिना पर दर्ज करती है इसके स्पष्टीकरण की जरुरत नहीं है। यहां गौरतलब यह भी है कि जब उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार थी तो कल्याण सिंह ने दलित - सवर्णों के बीच झगड़े सामने आने पर अन्वेषण अधिकारी के स्तर पर जाँच कर लें कि मामला निजी रंजिश का कारण तो नहीं। लिहाजा निष्कर्ष के बाद ही एफआईआर काटे जाने का प्रावधान सुनिश्चित किया गया था। लेकिन दलितों की हिमायत करतें हुए मायावती ने हल्ला मचाया कि भाजपा सरकार दलितों पर अत्याचार करना चाहती है। वह सामंतवादी सोच को प्रश्रय दे रही है। यहां तक की रणचंडी बनी मायावती ने कल्याण सिंह को सरकार गिराने तक की धामकी दे दी थी। लेकिन अब मायावती सत्ता में बने रहने और प्रधानमंत्री की गद्दी पर आसीन हो जाने की मंशा के चलते वहीं सब दोहरा रही हैं जो महत्वाकांक्षी राजनीतिक नेतृत्व करता रहा है और ऐसे में दलित हितों को नकारते हुए दलित पैरोकार कतई विचलित भी नहीं होते

     सवर्ण नेतृत्व को दरकिनार कर पिछड़ा और दलित नेतृत्व एक - डेढ दशक पहले इस आधार पर उभरा था कि पिछले पचास साल से केन्द्र व राज्यों में काबिज रहीं कांग्रेस ने न तो सबके लिए शिक्षा, रोजगार और न्याय के अवसर उपलब्ध कराये और न ही सामंतवादी व जातिवादी संरचना को तोड़ने में अह्म भूमिका निभाई बल्कि सामाजिक व आर्थिक विषमता का दायरा आजादी के बाद और विस्तृत को ही हुआ। इसलिए पिछड़ों, दलितों, वंचितों और लाचारों को कथित विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए पिछड़ों में दलितों का सत्ता का आना जरुरी है। हालांकि अस्पृश्यता को दण्डनीय अपराध, दलितो  सामाजिक सम्मान व नौकरियों में आरक्षण के प्रावधान संविधान में दर्ज कांग्रेस ने ही किए। आजादी के बाद करीब तीन दशकों तक कांग्रेस के लिए दलितों के परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक आजादी से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण सामाजिक समरसता लाने और आर्थिक विषमता दूर करने के मुद्दे थे। गांधी ने तो कहा भी था, 'जब तक हिन्दू समाज अस्पृश्यता के पाप से मुक्त नहीं होता, तब तक स्वराज की स्थापना असंभव है।' लेकिन मायावती दलित हित सरंक्षण का चोला ओढ़ बसपा के बुनियादी सिध्दांतो के साथ खिलवाड़ कर रहीं है वह कांशीराम का निष्ठावान अनुयायी होने पर सटीक नहीं बैठता।

बहुजन समाज पार्टी को वजूद में लाने से पहले कांशीराम ने लंबे समय तक दलितों के हितों की मुहिम डीएस - 4 के माधयम से लड़ी थी। इसी डीएस - 4 का सांगठनिक ढांचा खड़ा करने के वक्त बसपा की बुनियाद पड़ी और पूरे हिन्दी क्षेत्र में बसपा की संरचना तैयार किए जाने की कोशिशें ईमानदारी से शुरु हुंई। कांशीराम के वैचारिक दर्शन में डाँ भीमराव आंबेडकर से आगे जाने की सोच तो थी ही दलित और वंचितों को करिश्माई अंदाज में लुभाने की प्रभावशाली शक्ति भी थी। यही कारण रहा कि बसपा दलित संगठन के रुप में सामने आई लेकिन मायावती की पद प धानलोलुपता ने बसपा के विभिन्न प्रयोगों का तड़का लगाकर उसके बुनियादी सिध्दांतों के साथ खिलवाड़ ही कर डाला। नतीजतन आज बासपा सवर्ण और दलित का बेमेल समीकरण है। बसपा कार्यकर्ताओं की पार्टी स्तर पर सांगठनिक संरचना नदारद है। प्रधानमंत्री पद की दौड़ की कवायद उनके लिए इतनी महत्वपूर्ण हो गई कि दलितों के कानूनी हितों को सीमित कर देने के अब उनके  लिउ कोई मायने नहीं रह गए हैं ? इसलिए मायावती उन नीतियों में बदलाव के लिए कोई पहल नहीं कर रहीं हैं जिनसे शैक्षिक व आर्थिक विषमताएँ दूर हों ? यही कारण है कि परंपरागत भेद की भावनाएं घृणा के ऐसे वीभत्स रुपों में सामने आ रहीं हैं जो मानवीयता के सारे सरोकारों को झुठलाती हैं।

 

प्रमोद भार्गव