संस्करण: 17नवम्बर-2008

सन्दर्भ: मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव

भाजपा के दिखाने के दाँतों की असलियत

 

वीरेन्द्र जैन

भारतीय जनता पार्टी काँग्रेस पर एक राजनीतिक दल न होने का आरोप लगाती हुयी अपने आप को अलग तरह की पार्टी बतलाती रही है। किंतु मध्यप्रदेश के तात्कालिक विधानसभा चुनावों के दौरान उनके टिकिट वितरण के ढंग और उस वितरण के दौरान हुये जूतमपैजार के बाद बागी उम्मीदवारों द्वारा भरे गये पर्चों को देखें तो साफ नजर आता है कि दरअसल वे एक पार्टी ही नहीं हैं अलग तरह की पार्टी होना तो दूर की बात रही। इस सब के बाद उनका कोई भी नेता विश्वास के साथ यह कह सकने की स्थिति में नहीं है कि वे प्रदेश में सरकार बना सकेंगे जबकि गत विधानसभा चुनावों में उन्हें प्रदेश में अभूतपूर्व बहुमत मिला था।

      लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई राजनीतिक दल सदैव ही सक्रिय रहता है व  जनता से जुड़ी दैनंदिनी गतिविधियों में सतत हस्तक्षेप रखता है जबकि चुनावी पार्टियाँ केवल चुनाव के समय ही सक्रिय होती हैं और येन केन प्रकारेण जनता से वोट झटकने और सत्ता से जुड़े लाभ उठाने के लिये पद हथियाने का प्रयास करती हैं। भाजपा की राजनीतिक सक्रियता केवल वातावरण को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए ही नजर आती है व वे रामसेतु या आतंकवाद की समस्या को साम्प्रदायिक रंग देने के काम ही करते नजर आये हैं। प्रशासन पर उनकी पकड़ बेहद कमजोर रही है जिसका कारण उनकी अक्षमता के साथ उनके मंत्रियों का भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त होना है। इस अपराध बोध के कारण वे न केवल प्रदेश की योजनाओं को ही लागू कराने में असमर्थ रहे अपितु केन्द्र सरकार द्वारा भेजे गये धन से संचालित होने वाली योजनाओं में भी क्रियान्वयन नहीं करा सके जिससे बहुत सारा फन्ड लैप्स हो गया। सत्ता मिल जाने के बाद सत्तारूढ दल के सदस्यों को सरकार की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुँचाने के काम में जुट जाना होता है किंतु भाजपा के सदस्य इसके विपरीत इन योजनाओं के लिए आवंटित धन को हड़पने या हाथ बनाने में जुटे रहे।

प्रदेश सरकार में केवल एक विभाग ऐसा रहा जिसने  अपने कार्य क्षेत्र से बहुत आगे बढ कर काम किया और वह विभाग है प्रदेश का जनसम्पर्क विभाग। रोचक यह है कि इस विभाग का काम दूसरे विभागों के द्वारा किये गये कामों के बाद ही प्रारंभ होता है और जब दूसरे विभाग कुछ भी नहीं कर रहे हों तो यह विभाग सरकार की उपलब्धियां कैसे गिना सकता है, पर इस विभाग ने सरकार के बिना कुछ किये ही अच्छे ढिंढोरची का काम किया और बाल्टी में झाग उठा कर उसे भरी दिखाने का निरंतर प्रयास किया। पर बिडम्बना यह है कि झाग की आयु अल्प होती है व यथार्थ की किरणों के आगे उसे बैठ ही जाना होता है।

चुनाव की पगधवनियाँ सुनाई देते ही प्रदेश के मुखिया ने ताबड़तोड़ पंचायतें बुलाना प्रारंभ किया जिससे सरकारी पैसे पर समाज के सभी वर्गों को बरगलाया जा सके। विकास महसूस करने की चीज होती है क्योंकि वह जीवन में परिवर्तन लाता है पर जब खाना खिलाने वाला अपने प्रचारकों के द्वारा खाना खाने वाले को यह बताने लगे कि उस का पेट भर गया है तो खाना खिलाने वाले द्वारा की गयी हेराफेरी के साफ संकेत मिलते हैं। जिसका पेट भर जायेगा वह स्वयं ही बोलने लगेगा, उसे बताने की जरूरत नहीं पड़ती पर भाजपा को उसके लिए रथ जोतने पड़ते हैं व कोचवान तय करने पड़ते हैं। यह जानना महत्वपूर्ण हो सकता है कि भाजपा ने चुनाव आयेग को मध्यप्रदेश में  जिन स्टार प्रचारकों की सूची सोंपी है उनमें से 12 प्रतिशत में हेमा मालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, स्मृति ईरानी, व नवजोत सिंह सिध्दू सम्मिलित हैं। पर इस बार काँग्रेस के स्टार प्रचारकों में एक भी ऐसा नाम सम्मिलित नहीं है। भाजपा के अन्य स्टार प्रचारकों में वे लोग सम्मिलित हैं जिन्हें या तो किसी राज्य के प्रमुख होने के कारण बड़ा लाव लश्कर जिनके साथ चलता है या उन्हें किन्हीं कारणों से जैड श्रेणी सुरक्षा मिली हुयी है। ऐसे लोगों में सम्मिलित हैं नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री गुजरात, प्रेम कुमार धूमल मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश, वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री राजस्थान, रमन सिंह, मुख्यमंत्री छत्तीसगढ, सुशील कुमार मोदी उपमुख्यमंत्री बिहार, यदुरप्पा मुख्यमंत्री कर्नाटक, तथा पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह व सुन्दरलाल पटवा।

किसी पार्टी की सरकार का सुचारू रूप से काम करना उसके सामूहिक कार्य से ही संभव हो पाता है किंतु अपने तथाकथित अच्छे कार्यों का ढिंढोरा पीटने वाली पार्टी को अपने सैंतालीस विधायकों के टिकिट काटने पड़ते हैं जिसका मतलब है कि एक सौ तिहित्तर विधायकों में से सैंतालीस के सहयोग के बिना ही उन्होंने ये प्रचारित काम किये। इतना ही नहीं उन्हें अपने तीन मंत्रियों के भी टिकिट काटने पड़ते हैं। दूसरी ओर अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को छोड़ कर दलबदल कर आये  विजयबहादुर सिंह,(सपा) शेखर चौधारी व प्रेम नारायण ठाकुर (काँग्रेस), रामखिलावन(बसपा) व हर्षसिंह(समानता दल) को टिकिट देना पड़ता है क्योंकि अपने तथाकथित विकास के ढिंढोरे पर उन्हें स्वयं ही विश्वास नहीं है जो उनकी पार्टी को चुनाव जितवा सके। इतना ही नहीं उन्हें वर्तमान सांसदों को भी प्रत्याशी बनाने को विवश होना पड़ता है जिनमें राम लखन सिंह, सरताज सिंह, व रामपाल सिंह सम्मिलित हैं।

यह जानना रोचक है कि पिछले विधानसभा चुनावों में एक सौ तिहित्तर सदस्यीय तथाथित योग्य लोगों के विधायक दल में एक भी विधायक ऐसा नहीं था जो मुख्यमंत्री पद को सुशोभित कर सके इसलिए तत्कालीन सांसद शिवराजसिंह चौहान को दिल्ली से भेजा गया जिस कारण उन्हें अपनी संसद सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा और विधायक बनने के लिए बुधनी से तत्कालीन विधायक से सीट खाली कराना पड़ी। इस दौरान मुख्यमंत्री को चुनाव जिताने के लिए जुटे कलैक्टर को चुनाव आयोग को हटाना पड़ा व चुनाव एक सप्ताह आगे बढाने पड़े। मुख्यमंत्री के चुने जाने के बाद उनके द्वारा खाली की गयी लोकसभा की सीट पर कोई योग्य प्रत्याशी न मिलने के कारण विश्वसनीयता को आधार बना कर अपने खास सहयोगी रामपाल सिंह को जो मंत्रीपद को भी सुशोभित करते हुये अपना आर्थिक विकास कर रहे थे, को उनके अनचाहे लोकसभा का उम्मीदवार बनाना पड़ा। उनके चुन लिये जाने के बाद उनके द्वारा खाली की गयी सीट पर पुन: विधायक पद के लिए योग्य भाजपायी नहीं मिला और विश्वसनीयता के आधार पर उनकी ही पत्नी को उम्मीदवार बनाया गया पर अब उन्हीं रामपाल सिंह को फिर से विधान सभा के लिए उम्मीदवार घोषित किया गया है और अगर वे चुन लिये जाते हैं तो एक बार फिर लोकसभा से त्यागपत्र दैंगे क्योंकि उनके मुँह में मंत्रीपद का खून लग चुका है। ये अच्छी सरकार का ढिंढोरा पीटने वाले इस बात का जबाब नहीं दे पाते कि उन्हें पार्टी में दूसरे अच्छे लोग क्यों नहीं मिलते जिन्हें वे प्रत्याशी बना सकें और बार बार कुछ ही लोगों के आस पास न घूमते रहें।

चुनाव के पूर्व भाजपा ने सबसे पहले ढिंढोरा पिटवाया था कि वे तीस प्रतिशत महिलाओं को चुनाव में टिकिट देंगे पर टिकिट देना तो दूर उन्होंने सुधा जैन जैसी पुरानी सक्रिय विधाायक का टिकिट भी काट दिया व कुल प्रतिशत दस का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाया। जो महिलायें इस पार्टी के झूठे भरोसे पर उससे जुड़ी थीं उनमें ही नहीं अपितु प्रदेश की बहुसंख्यक महिलाओं को उनसे निराशा हुयी है व उनकी समझ में भी आ गया है कि जो पार्टी उमा भारती जैसी जुझारू महिला को पार्टी से बाहर कर सकती है वह महिलाओं को अधिकार देने के सवाल पर रामायण काल से आगे नहीं बढ सकती।

गत विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी लगभग दो फाड़ हो चुकी है व उमा भारती के नेतृत्व में भारतीय जनशक्ति पार्टी के रूप में दूसरा संगठन उनको जिताने वाले वोटों से कई गुना अधिक वोट काट चुका है। टिकिट वितरण के बाद भाजपा से टिकिट वंचित नेताओं के भाजश से जुड़ने के बाद तो  भाजपा का पतन सुनिश्चित ही हो चुका है। जागरूक वोटर देख रहा है कि सैंतालीस विधायकों के टिकिट काटने वाली भाजपा का नेतृत्व डंपर कांड के आरोपी शिवराजसिंह के पास है तथा पैंशन घोटालों से लेकर अनेक घोटालों में लिप्त कैलाश विजयवर्गीय, साढे छब्बीस करोढ से अधिक राशि जिनके अधीनस्थों के यहाँ छापों में मिल चुकी है ऐसे नरोत्तम मिश्रा, जमीनों के आरोपों से घिरे कमल पटेल, अपने विभागों के घोटालों में आरोपी कुँवर विजय शाह, गोपाल भार्गव, जयंत मलैया ,कुसुम मँहदेले, चौधरी चंद्रभानसिंह, मोती कश्यप  और राम दयाल अहिरवार ही नहीं अजय विश्नोई को टिकिट मिल सकता है तो फिर यदि दुबारा इनकी सरकार बन गयी तो क्या होगा!

 

वीरेन्द्र जैन