संस्करण: 17नवम्बर-2008

प्रदूषित हो रही है-

सियासत की पावन-गंगा

 

 

राजेन्द्र जोशी

गीरथ ने जिस उद्देश्य से पुण्य सलिला गंगा को पृथ्वी पर उतारा था, उसका हश्र आज संपूर्ण जगत देख रहा है। पापियों के पापों को धोते-धोते पतित पावनी माता-गंगा का आंचल आज इस हद तक मैला हो चुका है कि वह हमारी सांस्कृतिक आस्था की एक परिचायक अवश्य है, किंतु उसकी ममता के साथ इतना अधिक खिलदंड हो चुका है कि उसे अपनी संतानों की आस्था और प्रतिबध्दता पर खीज़ होने लगी है। जिस तरह से उस पुनीत नदी के तटों, उसके गर्भ में अठखेलिया करने और जीवन जीने वाले जंतुओं के मर्म पर प्रहार किया जा रहा है और उसकी जलराशि को प्रदूषित किया जा रहा है, वह हमारे सांस्कृतिक इतिहास और आस्था की परंपराओं के प्रति इस भौतिकवाद और बाज़ारवाद के दौर का एक बहुत बड़ा कुचक्र साबित हो रहा है।

ठीक इसी तर्ज पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन का बलिदान देकर आजाद भारत में जिस प्रजातंत्र के माध्यम से राजनीति की गंगा को उतारा था, वह राजनीति इतनी ज्यादा प्रदूषित होती जा रही है कि स्वतंत्रता की मूल भावना का अर्थ ही बदलता दिखाई देने लगा है।

जनता के लिए, जनता द्वारा जनता की सत्ता की स्थापना के पवित्र उद्देश्यों और उसके पीछे छुपे हमारे स्वायत्त-बोध की भावना को अब अपने निहित स्वार्थ की पूर्ति के लिए परिभाषित किया जाने लगा है। लोकतंत्र की स्वस्थ परिकल्पना में जहाँ जन से निर्मित सत्ता को महत्वपूर्ण माना गया है वहीं सत्ता पक्ष पर समुचित नियंत्रण रखने और  उसके ग्लेमर के मद में फंसकर भटकाव से बचाने के लिए विपक्ष की भूमिका के औचित्य को भी लोकतांत्रिक प्रणाली में सम्मानीय ढंग से प्रतिपादित किया गया है। प्रति पांच वर्ष में संसद और राज्य विधानसभाओं के आम निर्वाचनों के माध्यम से लोकतंत्र के इस महान देश में सत्ताओं का गठन होता है। विभिन्न राजनैतिक दल अपने दलों के निर्धारित मानदंडों, सिध्दांतों और नीतियों के अनुरूप केन्द्र और राज्य की सत्ताओं पर काबिज होने के लिए 'जन' को विश्वास अर्जित करते हैं और जनता की सेवा के नाम पर सत्ता पाने के हकदार बन जाते हैं। सत्ता में पहुँचकर कतिपय दल और इनके कतिपय प्रतिनिधि अब इस हद तक मदमस्त हो जाया करते हैं कि जिस 'जन' के समर्थन से वे कुर्सी पर आसीन हो जाते हैं, उसी की तरफ से आंख मूंद लेते हैं। पांच वर्ष के वैभवपूर्ण जीवन का कतिपय राजनेताओं को ऐसा चस्का लग जाता है कि वे अगली बार पुन: सत्ता में बने रहने के लिए जनादेश प्राप्त करने के लिए अपनी-अपनी तरह के कुचक्र चलाते रहते है। वे इस बात को विस्मृत कर देते हैं कि सत्ता के वैभव में चूर होकर वे केवल अपने आत्मीय और भौतिक सुख प्राप्ति के उपक्रम में ही खो जाते हैं।

चूंकि सत्ता की अवधि पूर्ण होने पर पुन: इन खुदगर्ज नेताओं और उनके दलों को जनता के बीच जाना होता है इसलिए वे अपनी पांच वर्ष के कार्यकाल के दौरान खोई हुई कलंकित छवि को पुन: चमकाने के लिए कई तरह तंत्र-मंत्र और यत्न करते हुए तथा नीतियों और सिध्दांतों को तिलांजलि देकर किसी न किसी तरह सत्ता में पहुँचने के हथकंडों में व्यस्त हो जाते हैं। राजनैतिक दल आसन्न निर्वाचन के लिए अपने-अपने दलों के प्रतिनिधियों का चयन करते हैं और वे अपने दल के लिए उपयोगी तथा निष्ठावान, ईमानदार और प्रतिबध्द व्यक्तियों को अवसर प्रदान करते हैं। किंतु वर्तमान दौर में हो रहे निर्वाचनों के इस दौर में प्राय: सभी बड़ी-बड़ी पार्टियों के प्रतिनिधि अपनी उम्मीदवारी के लिए पहले से कहीं अधिक अपनी दावेदारी के लिए ताल ठोंकते देखे गये। एक-एक क्षेत्र से 20-20, या 30-30 लोग अपनी पार्टी से चुनाव मैदान में उतरने का शंखनाद कर देते हैं। स्वाभाविक है अवसर तो केवल एक ही प्रतिनिधि को मिलेगा। ऐसे में शेष दावेदारों के तेवर विद्रोही हो जाते हैं। वे अपने ही दल के सिध्दांतों, नीतियों को भूलकर अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए चुनाव मैदान में अपने को अतिश्रेष्ठ और महत्वपूर्ण सिध्द करते हैं। जब वे अपने इन इरादों में असफल हो जाते हैं तो बागी तेवर अपनाकर या तो निर्दलीय प्रत्याशी बन जाते हैं या फिर किसी दूसरे ऐसे दल में प्रवेश लेकर सम्मानित हो जाते हैं जिनके वे शुरू से ही विरोधा में रहते आये हैं।

अपने दल में अवसर नहीं मिलने पर किसी विपक्ष के दलों में प्रवेश लेकर अपने स्वार्थ की राजनीति को चमकाने का चलन इन दिनों जोरों पर है। राजनीति में मिले सत्ता-पहुँच अवसर का लाभ उठाने के लिए लोग अपना मान-सम्मान, प्रतिष्ठा ईमानदारी और प्रतिबध्दता को पलीता लगाने में पीछे नहीं हैं। निर्वाचन में व्यक्तियों को प्रत्याशी बनने की उदारता और प्रजातांत्रिक व्यवस्था का कतिपय धनबल और बाहुबल के लोगों द्वारा अपनी निष्ठायें बदल-बदल कर खूब लाभ उठाया जा रहा है। राजनैतिक दलों के समक्ष भी सत्ता पर काबिज होने की चुनौतियों की निर्वाचन ही एक ऐसी घड़ी है कि यदि उसमें कामयाबी नहीं मिली तो आगामी पांच वर्ष तक उनका दल और उनके अपने जनप्रतिनिधि सत्ता की धारा से बिल्कुल ही कट जायेंगे। अत: प्रतिस्पर्धाओं के खेल में राजनैतिक दल और उनके नेता राजनीति की शुचिता को बलाए-ताक रख कर जनता को अपने मायाजाल में फांसने के लिए षडयंत्रों और साजिशों का सहारा लेने के लिए मज़बूर हो जाते हैं।

वर्तमान में जिन राज्यों में निर्वाचन के इस दौर में टिकिट वितरणों के दृश्य उभर कर आये हैं वे चकित कर देने वाले हैं। बड़ी-बड़ी पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं को यह मानने पर मज़बूर होना पड़ रहा है कि पार्टियों द्वारा प्रत्याशियों के चयन में भारी पक्षपात और धांधलबाजियां हुई है। राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों का कहीं कहीं तो ऐसा मकड़जाल बिछ गया है कि जो व्यक्ति विगत निर्वाचन में जिस पार्टी के खिलाफ जीतकर आया था वह उसी विपक्ष की पार्टी का एक महत्वपूर्ण प्रत्याशी बनकर अपने ही राजनैतिक भ्राता को मात देने के लिए मैदान में कूद पड़ा है। सियासत के उसूलों की मज़ाक बनाकर कतिपय निहित स्वार्थी लोग अपनी सफेदी का ढोंग रचकर आम मतदाता को अपना भगवान मान रहे हैं। आम जनता के साथ छल-कपट कर उसे धोखे में रखकर भ्रमित कर रहे हैं, वे ही नेता अपनी स्वार्थ-सिध्दि के उपरांत सिंहासन पर आरूढ़ होकर राजनीति का चक्रवर्ती घोषित करने में भी ऐसे लोगों को किसी तरह की हया का बोधा नहीं हो पाता। अब तो राजनीति में मिले निर्वाचन के इस अवसर को लोगों ने अपने दारिद्रों को धोने अपनी, गरीबी को हटाने, सात-प्रश्नों तक का इंतजाम करने का एक पर्व समझ लिया है। राजनीति की गंगा में डूबकी लगाकर अपने-अपने मन के पापों और स्वार्थों के वस्त्र धवल करने के लिए संपूर्ण गंगा के जल को अपने मैल से प्रदूषित कर दिया है।

 

राजेन्द्र जोशी