संस्करण: 17नवम्बर-2008

यह कहना बेबुनियाद है कि

''हिन्दू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता''

 

एल.एस.हरदेनिया

'हिन्दू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता।' इस घोषणा के साथ दिनांक 10 नवंबर को भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने मध्यप्रदेश विधान सभा चुनाव के लिए अपनी पार्टी के चुनाव अभियान का श्रीगणेश किया। दिनांक 10 नवम्बर को लगभग एक स्वर में एक दर्जन से ज्यादा भाजपा दिग्गजों ने मध्यप्रदेश के अनेक स्थानों पर यह घोषणा की कि हिन्दू कभी आतंकवादी हो ही नहीं सकता।

लगभग इसी भाषा में और इतने ही जोर-जोर से 50 हजार से ज्यादा मुसलमानों ने भी ऐसी ही घोषणा की। जमीयत-उल-उलेमा-ए-हिन्द के तत्वावधान में मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने यह दावा किया कि कोई भी सच्चा मुसलमान आतंकवादी नहीं हो सकता। हैदराबाद में आयोजित सम्मेलन में इन धार्मिक नेताओं ने एक स्वर से आतंकवाद को इंसानियत का सबसे बड़ा दुश्मन बताया।

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और हैदराबाद के सम्मेलन में भागीदारी करते मुस्लिम नेताओं के बयानों में एक बुनियादी अंतर है। जहां हैदराबाद सम्मेलन में किसी भी मुस्लिम आतंकवादी की रक्षा में एक शब्द भी नहीं कहा गया वहीं भाजपा नेताओं ने अपनी बात प्रज्ञा ठाकुर के पक्ष व हक में कहते हुए कहीं। भाजपा नेताओं का यह दावा है कि प्रज्ञा ठाकुर निर्दोष है और जानबूझकर महाराष्ट्र की कांग्रेसी सरकार ने उसे फंसाया है। यह हिन्दुओं के विरुध्द षडयंत्र है। भाजपा नेताओं ने जिस भाषा का उपयोग किया उससे लगता है कि वे प्रज्ञा ठाकुर को वैसी ही संन्यासिन मानते हैं जैसे उन्होंने उमा भारती को माना था। इसलिए उमा भारती ने प्रज्ञा ठाकुर को चेतावनी दी है कि जैसे मेरा उपयोग कर मुझे दूध की मक्खी के समान फेंक दिया गया वैसा ही तुम्हारे साथ होगा। इसलिए सावधान रहो।

भारतीय जनता पार्टी का यह दावा कि हिन्दू आतंकवादी हो ही नहीं सकता पूरी तरह तथ्यात्मक स्थिति के विपरीत है। क्या भाजपा नेता गल्ती से यह कह गए ?  क्या वे यह भूल गए कि अनेक ऐसे आतंकवादी संगठन हैं जिनके सभी सदस्य हिन्दू हैं। ऐसे संगठनों में उल्फा, बोडो, नक्सलाइट आदि शामिल हैं। श्रीलंका के आतंकवादी संगठन लिट्टे ने भी बहुसंख्यक हिन्दू हैं। इसलिए यह दावा किया कि हिन्दू आतंकवादी हो ही नहीं सकता पूरी तरह बेबुनियाद है। जैसे इस बात पर बरबस विश्वास नहीं हो सकता कि कोई भी सच्चा मुसलमान आतंकवादी वहीं हो सकता है वैसे ही यह बात भी विश्वास से परे है कि कोई हिन्दू आतंकवादी नहीं है। जैसे दुनिया के अनेक स्थानों पर मुसलमानों को आतंकवादी बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है उसी तरह हिन्दुओं के एक वर्ग को आतंकवादी बनने की ट्रेनिंग दी जाती है। क्या अब किसी से यह बात छिपी है कि हमारे देश के अनेक स्थानों पर बम बनाते हुए बजरंग दल के कार्यकर्ता पकड़े गए। कुछ कार्यकर्ता मारे भी गए। फिर संघ परिवार के सदस्यों को ईसाईयों से घृणा करने की ट्रेनिंग दी जाती है। उचित अवसर आने पर यह घृणा विस्फोटक रूप धाारण कर लेती है, और घृणा हिंसक रूप अख्तियार कर लेती है। मुसलमानों और ईसाईयों के विरुध्द अपमानजनक, भड़काऊ भाषा का उपयोग किया जाता है। प्रशिक्षण का मुख्य आधार इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करना होता है। जैसे उन्हें बताया जाता है कि औरंगजेब ने हजारों हिन्दुओं की हत्या कर उनके द्वारा पहने गए जनेऊओं को नदियों में बहा दिया था। इसी तरह यह बताया जाता है कि जिस गति से मुसलमानों व ईसाईयों की जनसंख्या में वृध्दि हो रही है उसके चलते वह दिन दूर नहीं जब हिन्दू अपनी मातृभूमि में ही अल्पसंख्यक हो जाएंगे। कुरान में काफिरों (अर्थात हिन्दुओं) को मारने का आदेश दिया गया है। यद्यपि संघ परिवार यह भूल जाता है कि जिस इस्लाम के संस्थापकों को यह ज्ञात ही नहीं था कि दुनिया में कोई ऐसा देश है जहां हिन्दू रहते हैं। इस तरह की शिक्षा से संघ परिवार के सदस्यों में आक्रोश उत्पन्न होता है और इस आक्रोश के चलते ही अल्पसंख्यकों के विरुध्द दंगे भड़कते हैं, और आज इसी आक्रोश के चलते आधुनिक तकनीकों का प्रयोग कर बम विस्फोट किए जा रहे हैं।

यह अफसोस की बात है कि सार्वजनिक रूप से प्रज्ञा ठाकुर को निर्दोष घोषित करना अप्रत्यक्ष रूप से जांच की प्रक्रिया में बाधा पहुंचाना है। क्या यह बात भुलाई जा सकती है कि बम विस्फोट के किसी मामले में जब किसी मुसलमान की गिरफ्तारी होती है संघ व भाजपा के नेता उसे तुरत-फुरत दोषी घोषित कर देते हैं। वे मांग करने लगते हैं कि उसे फांसी दे दी जाए और उसे इस्लामी आतंकवादी घोषित कर देते हैं।

मैं स्वयं इस बात का हामी हूं कि किसी आतंकवादी के धार्म के कारण उसकी हरकतों को उसके धार्म से जोड़ना पूरी तरह अनुचित है। जैसे, यदि किसी हिन्दू ने बम विस्फोट किया है तो उसे हिन्दू आतंकवादी नहीं कहा जाना चाहिए। इसी तरह बम विस्फोट की घटना से जुड़े किसी मुसलमान को इस्लामिक आतंकवादी नहीं कहा जाना चाहिए। यह प्रसन्नता की बात है कि जमेयत उलेमा ने भी ऐसा ही रवैया अपनाया है। अपने हैदराबाद अधिवेशन में पारित प्रस्ताव में उसने स्पष्ट रूप से हिन्दू आतंकवाद और इस्लामिक आतंकवाद के समान विचारों की निंदा की है। मुसलमानों के एक संगठन द्वारा इस  तरह का रवैया अपनाया जाना स्वागत योग्य है। संघ परिवार समेत सारे देश के सभी राजनैतिक एवं सामाजिक संगठनों को इसका स्वागत करना चाहिए, इसकी प्रशंसा करनी चाहिए कि जमीयत ने अपने सम्मेलन में श्री रविशंकर समेत अनेक धर्मों की प्रमुख हस्तियों को आमंत्रित किया था। यहां सर्वाधिक समझने की महत्वपूर्ण बात यह है आतंकवादी का संबंध राजनीति से है, धर्म से कतई नहीं।

 

 

एल.एस.हरदेनिया