संस्करण: 17नवम्बर-2008

आओ एड्स के खिलाफ़ एक हो जाएँ

 

 

डॉ. महेश परिमल

कुछ समय पहले अखबारों में पढ़ा था कि पश्चिम बंगाल के एक व्यक्ति के रक्त की जांच में उसे एचआईवी पॉजीटिव पाया गया। इसके बाद तो उस व्यक्ति का जीना ही मुहाल हो गया। उसे अपने ही नाते-रिश्तेदारों की उपेक्षा सहनी पड़ी। उसे समाज से ही बहिष्कृत कर दिया गया। सभी उसे कटाक्ष सहनी पड़ी। लोग उससे दूर-दूर रहते। कई लोग तो उसे छूना भी पसंद नहीं करते। एक तरह से तो वह जीवित रहकर भी मरणासन्न हो गया था। कई दिनों बाद पता चला कि रिपोर्ट को उसकी रिपोर्ट बता दिया गया। उस व्यक्ति को सही साबित कर दिया गया पर इस बीच उसने जो कुछ सहाए वह मौत से बदतर था। वह अपने ही लोगों की आंखों के सामने गिर गया। आखिर तक उसे वह इज्जत नहीं मिल पाईए जिसका वह हकदार था।

यह हमारे समाज की एक ऐसी सच्चाई है जिसे हर कोई स्वीकार तो करता है पर इसे दूर करने की दिशा में एक कदम भी नहीं उठाना चाहता। एक दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस था। तमाम अखबारों को पढ़ने पर पता चला कि हमारे देश में एड्स रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी के साथ बढ़ रहे हैं इस बीमारी की रोकथाम के उपाय। हम सभी जानते हैं कि एड्स एक जानलेवा बीमारी है। सावधाानी ही इससे बचने का एकमात्र उपाय है। लोगों में यह आम धारणा है कि यह बीमारी केवल बड़ों को ही होती है। पर सच तो यह है कि इस रोग के संबंधा में आवश्यक जागरूकता एवं सावधानी के अभाव में आज बच्चों में भी एड्स तेजी से बढ़ रहा है। विश्व में 15 साल से नीचे की उम्र के एक करोड़ बालक ऐसे हैं जो एड्स के कारण अपने माता-पिता की छत्रछाया से वंचित हो गए हैं। इन बच्चों का भविष्य अंधाकारमय हो गया है।

हाल ही में ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि हमारे देश में अभी भी हमारो बच्चें ऐसे हैं जिन्हें यह बीमारी विरासत में मिली है। माता यदि एचआईवी पॉजीटिव होय तो बालक जन्म के साथ ही यह बीमारी अपने साथ लाता है। एड्स का वायरस उसके खून में पहले ही समा चुका होता है। यह एक चिंता का विषय है कि आजकल हमारे देश में कई बच्चे माता की कोख में ही इस बीमारी से ग्रस्त हो रहे हैं। अब तो माँ की कोख भी सुरक्षित नहीं रही। इस जानलेवा बीमारी को रोकने के लिए विश्व स्तर पर वैज्ञानिक शोधाकार्य में लगे हुए हैं निश्चित रूप से इसके अच्छे परिणाम सामने आएँगे पर इसके लिए समय लगेगा। अभी तो इसके लिए बिना किसी की सहायता लिए अपनी ओर से एक कदम उठाना ही होगा। यह कदम क्या होए इस पर कई लोगों के कई विचार हो सकते हैं। सबसे पहले तो यह हो सकता है कि इस बीमारी से ग्रस्त लोगों से प्यार से बातचीत करें। उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव न करें। उसके सामने ऐसी कोई हरकत न करें जिससे उसे लगे कि उसकी उपेक्षा की जा रही है। इस बात को हमेशा ध्यान में रखे कि एड्स न तो रोगी के कपड़े पहनने से होता है न हाथ मिलाने से होता है और न ही उसके साथ भोजन करने से होता है। यह सब करने से केवल प्यार ही बढ़ताव है। यदि हमें पता चल जाए कि किसी व्यक्ति को एड्स है तो उससे इस तरह से व्यवहार करें जिससे उसे अपनी जिंदगी से प्यार हो जाए और वह पूरी शिद्दत के साथ जिंदगी जीने की कोशिश करें। यह आश्चर्य की बात है कि पूरे विश्व में अब तक 4 करोड़ लोग एचआईवी ग्रस्त हैं। इस बीमारी ने अभी तक 80 लाख लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है। इसके बाद भी विश्व में अभी भी 80 प्रतिशत लोगों को यह मालूम ही नहीं कि एड्स आखिर है क्या ? यह अज्ञानता ही है जो लोगों को इस बीमारी के करीब ला रही है। एक बार जो इसकी चपेट में आ गया वह मौत के करीब पहुँच जाता है। पर सच तो यह है कि यदि रोगी के भीतर जीने की लालसा होए तो इस बीमारी को भी अपने से दूर भगा सकता है। इससे ग्रस्त निराश लोगों में जीवन का संचार करने में हम सबको महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। एड्स रोगी भी यह तय कर ले कि चाहे कुछ भी हो मुझे इस बीमारी से लड़ना ही है तो उसका आत्मविश्वास ही उसे एड्स से छुटकारा दिला सकता है। हमारे ही समाज में ऐसे कई लोग हुए हैं जो एड्सग्रस्त होने के बाद भी पूरी तरह से सामान्य जीवन जीया है।  जीवन जीने की कला यही है कि मौत से पहले मत करो और दुख आने से पहले दुखी मत हो हाँ लेकिन सुख आने के पहले ही उसकी कल्पना में ही सुख का अनुभव करो। खिलखिलाहट के पहले ही अपने होठों पर मुस्कान खिला लो। सकारात्मक सोच का सफर काफ़ी लम्बा होता है और नकारात्मक सोच का सफर शुरू होने से पहले ही तोड़कर रख देता है। यह सब कुछ निर्भर करता है हमारे व्यवहार पर। इस व्यवहार में सोच की परत जितनी अधिक जमेगी जीवन की खुशियाँ उतनी ही परतों के नीचे दबती चली जाएगी। निर्णय हमें करना है कि एड्स रूपी राक्षस के बारे में अधिक सोच-सोच कर जीवन को भार बनाना है या उसका मुकाबला कर जीवन को फूलों की पंखुड़ी सा हल्का और सुकोमल बनाना है क्योंकि एड्स की भयावहता निश्चित ही एक क्षण को हमें कमजोर बना देती है, किंतु आज आवश्यकता इस चुनौती को स्वीकारने की और इससे लड़ने की। एक बार फिर हमें अपने आपको समर्पित करना होगा। एचआईवी के विरुध्द दृढ़ होकर खड़े रहने के लिए और साथ ही इस बात का भी संकल्प लेना होगा कि हम इस वायरस से पीड़ित लोगों के जीवन में आशा की एक नई सुबह लाएंगे और उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेंगे, ताकि वे अपना सामान्य जीवन जी सकें और हमारे साथ हँसी-खुसी से रहे सकें।

 

डॉ. महेश परिमल