संस्करण: 16 सितम्बर-2013

'संत' की परिभाषा

विवादों में

?  राजेन्द्र जोशी

         'संत' शब्द इतना पावन है कि इसकी परिभाषा का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है। यह शब्द सम्मान सूचना, आस्था पैदा करने वाला है जो उस व्यक्ति के प्रति श्रध्दा पैदा करता है जिसमें संतों के गुणों का भंडार पाया जाता है। पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों में जहां जहां भी 'संत' शब्द का उपयोग होता चला आया है वहां सहज आम आदमी के हृदय में संतों के प्रति आदर श्रध्दा और आस्था उमड़ पड़ती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ धार्मगुरूओं और ऐसे व्यक्ति ही संत है जो वेशभूषा से बाबाजी दिखे, दाढ़ी मूंछ, और बड़े-बड़े लम्बे बालों की जटाएें रखें। 'संत' शब्द अपने आप में इतने व्यापक गुणों का खजाना है कि इसमें व्यक्ति के चरित्र में कहीं से भी काले छींटे उड़कर नहीं लग पाये हो। 'संत' घोषित हो जाने का यह आशय भी नहीं इसकी आड़ में व्यक्ति अपने दुर्गुणों और काली रात की करतूतों को छुपा सके और आत्मप्रचार के रूप में स्वयंभूं संत बनकर दुनिया के साथ छलावा करे।

                 काम, क्रोध, मद लोभ तथा साम दाम दंड भेद और छल कपट व्यक्ति की उम्र और उसकी वेशभूषा की आड़ में कितने ही छुपाने के प्रयास किए जाय, छुप नहीं सकते। 'संत' कैसा होना चाहिए उसका चरित्र कैसा होना चाहिए और प्राणिमात्र के प्रति उसका दृष्टिकोण क्या होना चाहिए यह अब विवादों में उलझ चुका है। हमारे समाज में 'संत' शब्द का आदर और सम्मान है कि जिस व्यक्ति में भी सद्गुण दिखते हैं और जिसका चरित्र एकदम कपास की तरह सफेद और साफ है उसे भी संत की संज्ञा दे दी जाती है, चाहे वह गृहस्थ ही क्यों न हो। इस तरह के उज्ज्वल चरित्र के व्यवसाय, राजनीति प्रशासन और सेवा के विभिन्न क्षेत्रों में आज भी मौजूद पाये जाते हैं जिनकी चर्चाएं इस आडम्बर युक्त समय में कोई करना ही नहीं चाहता है। ईमानदार व्यक्ति को हंसी-हंसी में यह कहकर टाल दिया जाता है कि 'बड़ा ईमानदार बनता है,चरित्रवान बनता है, संत बनता है' अपने और अपनी सात पीढ़ी के लिए कुछ काला-पीला कर नहीं पाया। एक तरफ जहां लोग चरित्र से डिग जाते हैं, दुर्गुणों को अपना लेते है, गोल-माल करते हुए मालामाल हो जाते ऐसे लोगों को समय के कतिपय क्षेत्र में पूजा जाने लगता है और उनके दुर्गुणों का अनुसरण होने लगता है।

              इन सबके बीच 'संत' शब्द की परिभाषा बदल चुकी है उसके मायने दूसरे हो गये हैं। तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है-

             'साधु चरित सम चरित कपासू'

              संतों का चरित्र कपास के चरित्र के समान शुभ है। कपास उज्ज्वल और एकदम सफेद होता है, संत के हृदय में अज्ञान और पास का अंधोरा नहीं होता।

              'मुद मंगलमय संत समाजू-जिमिजग जंगम तीरथराजु!!

              संतों को चलता फिरता तीरथराज प्रयाग माना गया है। उनका सम्मान आनंद और कल्याणमय है। यह तो सही अर्थों में संतों की परिभाषा किंतु कतिपय तथाकथित संतों की करतूतों का जब समाज के सामने चिट्ठा खुल जाता है तो लगता है कि ये धोखेबाज लालची और समाजद्रोही हैं। संत के नाम की चादर ओढ़कर ऐसे तथाकथित संत भूमाफिया के अलावा कुछ भी नहीं है। अपराध करने से इनकी आत्मा इन्हें जरा भी कचोटती नहीं है। लालच और संग्रह की प्रवृत्ति के साथ ही अपने चरित्र की ऐसे संतों को चिंता नहीं होती। व्यभिचार अहिंसा और क्रूरता इनकी दिनचर्या बन जाती है।

               देश के विभिन्न भागों में अपनी नौटंकिया रचकर अनेक तथाकथित संत समाज को धोखा दे रहे हैं। मीडिया से अब इन तथाकथित संतों का असली चेहरा उजागर होता है तो लोग दांतों तले ऊंगली दबा लेते हैं। आज के इस आधुनिक और प्रगतिशील युग में भी समाज के लोगों में संतों के प्रति श्रध्दा आस्था के भाव हैं। जब भी जहां भी लोगों को संत साधु नुमा कोई शख्स मिल जाता है तो लोग उसके चरणस्पर्श करते आये हैं किंतु संतों के नाम पर जब से ठगी शुरू हुई है जनता के हृदय में भी ऐसे तथाकथित संतों के तिरस्कार की भावना बढ़ गई है। ऐसा नहीं कि समाज में सभी संतों को एक ही तराजु पर तोला गया हो। अनेक ऐसे संतों के नाम है जिनका नाम लेते ही उनके सद्कार्य और सद्विचार नजरों के सामने घूमने लगते हैं। संत हिरदारामजी का नाम इस दिशा में लिया जा सकता है जिनको समाज ने बहुत कुछ ग्रहण किया। उनके आश्रय की सादगी वैचारिक गहराई और सेवा के प्रति आस्था के भाव उनमें थे।

   
? राजेन्द्र जोशी