संस्करण: 16 सितम्बर-2013

मोदी का 'वंजारा' अतीत :

राज्य नीति के तौर पर फर्जी मुठभेड़ें

? सुभाष गाताड़े

        निलंबित चल रहे अफसरों - जो गम्भीर आरोपों के अन्तर्गत सलाखों के पीछे बन्द हों - उनके इस्तीफे के पत्र हुक्मरानों के लिए कोई मायने नहीं रखते। लेकिन जहां तक गुजरात के निलम्बित डीआईजी डाहयाजी गोबरजी वंजारा का सवाल है,जो आतंकवादी विरोधी दस्ते के मुखिया रह चुके हैं और सूबे में हुकूमत की बागडोर सम्भालनेवालों के बेहद करीब रह चुके हैं, और चन्द गोपनीय उद्धाटनों से उन्हें अधिक असुविधाजनक स्थिति में डाल सकते हैं, मामला थोड़ा अलग हो जाता है। यह अकारण नहीं कि विगत छह साल से अधिक वक्त से जेल की सलाखों के पीछे रह रहे वंजारा द्वारा दिए इस्तीफे को राज्य सरकार ने स्वीकारा नहीं है।

                कल्पना करें कि कई फर्जी मुठभेड़ों के कर्णधार कहा जा सकनेवाला शख्स अपनी नौकरी छोड़ना चाह रहा है और राज्य सरकार - जो उन मुठभेड़ों के चलते तीखी आलोचना का शिकार बनी है - उसे अपनी सेवा में बनाए रखना चाह रही है। एक की तार्किक कारण समझ में आता है कि अभियुक्त अधिकारी के पास ऐसे तमाम राज हैं, जिनसे खुल जाने से हुकुमत चलानेवालों के लिए सफाई देना मुश्किल हो सकता है।

               फिलवक्त प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी पार्टी की तरफ से नामित होने वाले मोदी को उन कदमों का जवाब भी देना पड़ सकता है, जो उसने पहले उठाए थे, मगर अब उनकी चर्चा उसकी नैया को डांवाडोल कर सकती है। उदाहरण के लिए जिन दिनों वंजारा डी आई जी पद पर विराजमान थे उन दिनों मोदी सरकार द्वारा 'आतंकवाद विरोधा' के नाम पर तय की गयी कार्रवाई योजना/एक्शन प्लैन (counter-terrorism action plan)का खुलासा हुआ था, इसका स्वरूप ऐसा था कि 'गुजरात पुलिस की इस योजना ने प्रदेश के धार्मिक अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों को नये सिरेसे आतंकित किया था।

             इसके पीछे राज्य सरकार की अपनी समझदारी इस प्रकार थी, जिसे खुद जनाब वंजारा ने पत्रकार को बयां किया था। (The Rediff Special, Sheela Bhatt in Ahmedabad, How Gujarat plans to counter terrorists, July 15, 2004) इस 'आतंकवाद विरोध की योजना' के निशाने पर समूचे अल्पसंख्यक समुदाय को रखा गया था जिसमें यह धारणा अन्तर्निहित थी गोया उसका हरेक सदस्य सम्भावित आतंकवादी है। अगर ऐसा नहीं होता तो 'आतंकवाद विरोधी योजना' को राज्य पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी की अगुआई में अमली जामा पहनाने के पहले राज्य सरकार ने पहले प्रदेश भर के मस्जिदों, मदरसों यहां तक कि वहां पढ़ रहे, पढ़ा रहे लोगों की बारीक से बारीक जानकारी हासिल करने की कोशिश नहीं की होती। इतना ही नहीं उसने प्रदेश तथा देश के अलग अलग हिस्सों में सक्रिय इस्लामिक संगठनों, उनकी गतिविधियों, उनके साहित्य से लेकर उनके फण्डिंग के नेटवर्क को भी जानने की कोशिश की थी।

             आतंकवादविरोधी इस योजना में अन्तर्निहित था कि कानून एवं व्यवस्था के रखवाले पुलिसकर्मियों को खुली छूट दी गयी थी कि वह आतंकवादविरोधा की दुहाई देते हुए अल्पसंख्यकों को तंग करें और समय समय पर उन्हें पकड़ें और उनमें से चुनिन्दा का एनकाउण्डर कर दे ताकि एक्शन प्लान की सार्थकता पर मुहर लग सके।

             अगर हम इस्तीफे की ओर फिर लौटें तो यह जानी हुई बात है कि वंजारा एवं उसके सहयोगी 31 अन्य पुलिस अफसर उन 15 फर्जी मुठभेड़ों के चलते जेल की सलाखों के पीछे हैं, जिन्हें गुजरात पुलिस ने 2004 से 2007 के दरमियान अंजाम दिया। गौरतलब है कि इन्हें अंजाम देने का तरीका एक जैसाही था, फिर चाहे इशरत जहां एवं उसके साथ मारे गए तीन अन्य लोगों की हत्या हो ; सोहराबुद्दीन शेख की हत्या हो सादिक जमाल मेहतर की हत्या हो। यह सभी मुठभेड़ें रात के वक्त हुईं और 'आतंकियों' के तमाम 'आधुनिक आटोमेटिक हथियारों से लैस होने' के बावजूद (जैसा कि बाद में बताया गया) पुलिस बल को खरोंच तक नहीं आयी। ऐसी हर मुठभेड़ के बाद यही बताया गया कि यह लोग जनाब मोदी एवं उनके सहयोगियों को खतम करने के लिए आए थे।

             अपने दस पेजी इस्तीफे के पत्र में जनाब वंजारा ने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं हैं। कहीं भी वह इन हत्याओं पर पश्चात्ताप प्रगट नहीं करते बल्कि यकीं करते हैं कि इन्हीं के चलते गुजरात में बाद में आतंकी हमले नहीं हुए। उनके मुताबिक 'गुजरात के विकास मॉडल' की कामयाबी 'वे और उनके अफसरों की कुर्बानी पर ही टिकी है'। इस अभूतपूर्व परिस्थिति पर अपनी राय प्रगट करते हुए कि उनके सहयोगी इकतीस अन्य पुलिस अधिकारी जेल की सलाखों के पीछे हैं, जिनमें से कई आई पी एस रैंक के भी हैं, वह बताते हैं कि 2002 से 2007 के दरमियान वे या उनके जैसे अधिकारियों ने ''सरकार की सचेत नीति के अनुरूप ही काम किया'' और इसके बावजूद उनके राजनीतिक आंकाओं ने उनके साथ विश्वासघात किया। पत्र में नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह - जो गृहराज्यमंत्री रह चुके हैं - को निशाना बनाया गया है। इसमें भले ही अमित शाह पर अधिक गुस्सा प्रगट होता दिखता है, मगर मोदी को लेकर भी उसमें कोई मुगालता नहीं है। कभी मोदी को 'खुदा' समझनेवाले वंजारा, उन पर खुल कर हमला करते हुए कहते हैं कि ''वे दिल्ली की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं'' जेल में बन्द उन पुलिस अधिकारियों के बारे में बिना सोच जो उनके आदेशों का ही पालन कर रहे थे।

             पत्र में लिखा गया है :

       सोहराबुद्दीन, तुलसीराम, सादिक जमाल और इशरत जहां मुठभेड़ मामलों की जांच में मुब्तिला सीबीआई जांच अधिकारियों को चाहिए कि वह उन नीति निर्माताओं को भी गिरफ्तार करें, जिनकी सचेत नीति को हम अधिकारी अमल में ला रहे थे..मेरा साफ मानना है कि इस सरकार की जगह गांधीनगर में होने के बजाय तलोजा सेन्टल जेल या साबरमती सेन्ट्रल जेल में होनी चाहिए।

            इसमें कोई दोराय नहीं कि इस पत्र के अचानक नमूदार होने से मोदी एवं अमित शाह दोनों ही बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर किया है। अपनी तुरन्त प्रतिक्रिया में सीबीआई ने भले ही कहा हो कि इस इस्तीफे का 'राजनीतिक मूल्य' है, मगर उसने इस बात पर गौर नहीं किया है कि बंजारा का बयान अभियोजन पक्ष को और मजबूत बना सकता है। इस पत्र की कॉपी सीबीआई को भी भेजी गयी है और वह चाहेगी तो पत्र में किए गए आरोपों को लेकर स्पष्टीकरण के लिए वह वंजारा को बुला सकती है ताकि यह जाना जा सके कि आखिर हुकूमत में बैठे लोग किस तरह इन मुठभेड़ों में 'शामिल' थे। एक क्षेपक के तौर पर यहां यह बताया जा सकता है कि कुछ समय पहले जब इशरत जहां का मामला सूर्खियों में था तब सीबीआई ने बताया था कि उसके पास एक अभियुक्त पुलिस अधिकारी का बयान मौजूद है, जिसमें टेप पर यह दावा किया गया है कि वंजारा ने उन्हें बताया था कि मामले की जानकारी सफेद दाढ़ी (संकेत मोदी की तरफ) और काली दाढ़ी (संकेत अमित शाह का) को दी गयी है।

              जैसे कि उम्मीद की जा रही थी कि भाजपा ने इस पत्र को किसी किस्म की अहमियत देने से इन्कार किया है और कहा है कि वह 'राजनीति से प्रेरित' है। मगर वह अच्छी तरह जानती है कि मामला आगे बढ़ा तो प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बन रहे मोदी की सम्भावनाओं पर गहरा असर हो सकता है। पत्रकार भारत भूषण के मुताबिक 'यह पत्र एक ऐसा टाइम बम है, जो थोड़ा विलम्ब से विस्फोट कर सकता है। (..a time bomb with a long fuse).(एशियन एज, 7 सितम्बर 2013) वैसे जितना मोदी या भाजपा, गुजरात के इन पुलिस अधिकारियों की करतूतों से दूरी बनाने की कोशिश करेंगे, उतना उनके लिए मुश्किलें बढ़ती जाएंगी। मालूम हो कि अपने पद से इस्तीफा देने वाले वंजारा दूसरे पुलिस अफसर हैं, इसके पहले एक अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सिंघल भी इस्तीफा दे चुके हैं -जो इशरत फर्जी मुठभेड़ काण्ड में अभियुक्त हैं। उन्होंने भले सीधो गुजरात सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया हो - मगर जब इशरत मामले में सीबीआई जांच में राज्य सरकार आनाकानी कर रही थी तो उन्होंने तथा उनके सहयोगियों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर इसे सुनिश्चित कराया और अब यह चर्चा भी हो रही है कि सोहराबुद्दीन मामले में जेल में बन्द एक अन्य अधिकारी पुलिस अधीक्षक राजकुमार पांडियन भी इस्तीफे के बारे में सोच रहे हैं।

            मेल टुडे अख़बार के सम्पादक एवं वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण लिखते हैं :

            '' मोदी की परेशानियां जल्द कम नहीं होने वाली हैं। जनाब वंजारा अगर अपने इस्तीफे के ख़त में महज यह लाइन जोड़ दें कि पुलिस जो कर रही थी उसके बारे में मोदी अवगत थे, तो मोदी बुरी तरह फंस सकते हैं। अगर अदालत यह मान लेती है कि भले ही मोदी को अभियुक्त नहीं बनाया गया हो, लेकिन वह किसी न किसी रूप में इनमें से किसी फर्जी मुठभेड़ के बारे में अवगत रहे हैं तो उन्हें आपराधिक दण्ड संहिता की धारा 319 के अन्तर्गत अदालत के सामने बुलाया जा सकता है और अभियुक्त पुलिस अधिकारियों की तरह उन्हीं धाराओं में उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है। ..

      अगर ऐसी परिस्थिति में भाजपा फिर भी जनाब मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने पर जोर देती है तो ऐन मुमकिन है कि उसके पचीस प्रवक्ता भी उनकी हिफाजत करने के लिए कम पड़ जाएं। http:\\www. asianage.com\columnists\vanzara-bomb-has-long-fuse-modi-824एशियन एज, 7 सितम्बर 2013)

      आगे क्या होता है इसे वक्त ही बता सकता है।

? सुभाष गाताड़े