संस्करण: 16 सितम्बर-2013

मोदी के गुजरात में किसान हो रहें हैं तबाह

? एल.एस.हरदेनिया

         क ओर गुजरात में 9 से 11 सितम्बर के बीच विश्व कृषि सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें कृषि के जरिए विकास के  संबंधा में बड़ी-बड़ी डींगें हांकी गईं। वहीं दूसरी ओर गुजरात का आम किसान इस समय बहुत ही दु:खी है। इसका मुख्य कारण गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की किसान-विरोधी नीतियां हैं। इस समय वहां के किसानों का आक्रोश पराकाष्ठा पर है। वहां के किसान इस बात से नाराज हैं कि नरेन्द्र मोदी बड़ी उदारता से किसानों के बुनियादी हितों की उपेक्षा करते हुए, कार्पोरेट जगत को बेशकीमती उपजाऊ जमीनें कौड़ियों के दाम  दिए जा रहे हैं। इस समय वहां के किसानों का नारा है कि ''जान देना है, मर जाना है पर जमीन नहीं देना है''। पहले से ही मोदी हजारों एकड़ जमीन विभिन्न उद्योगों के लिए दे चुके हैं।

                अभी हाल में यह फैसला किया गया है कि मारूति सुजूकी प्लांट और उसके नजदीक ही स्पेशल इंवेस्टमेंट रीजन के लिए 50 हजार हैक्टेयर जमीन दी जाएगी। इस 50 हजार हैक्टेयर क्षेत्र में मारूति उद्योग से जुड़े विभिन्न छोटे-छोटे उद्योग खुल जाएंगे। हजारों की संख्या में किसान ट्रैक्टरों और अन्य साधानों से गुजरात की राजधानी पहुंचे और इस निर्णय पर अपना आक्रोश प्रगट किया। अनेक किसान मोटरसाइकिलों से भी गए। यह पहली बार नहीं है, जबकि इस तरह का भारी भरकम प्रदर्शन हुआ हो। इसके पहले भी अनेक प्रदर्शन हो चुके हैं परन्तु इस बार बढ़ते हुए आक्रोश को देखकर, मोदी सरकार की ओर से आक्रोशित किसानों से बातचीत भी की गई और उनके गुस्से को शांत करने के लिए उन्हें कुछ आश्वासन भी दिए गए।

                परन्तु इन आश्वासनों से किसानों का गुस्सा कम नहीं किया जा सका। गुजरात में किसानों का जो आंदोलन चल रहा है उसका नाम है ''जमीन अधिकार आन्दोलन गुजरात''। यह गैर-राजनीतिक आंदोलन है और इसका नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कुछ नेता भी कर रहे हैं। ऐसी ही एक महत्वपूर्ण नेता हैं-डा.कानोभाई कलसारिया। कानोभाई गुजरात के एक अत्यधिक सम्मानित नेता हैं। वे इतने प्रभावशाली हैं कि आंदोलन का नेतृत्व करने के बावजूद, भारतीय जनता पार्टी उनके विरूध्द किसी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं कर पाई है। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया कि  नरेन्द्र मोदी की किसानो संबंधी नीति से भारतीय जनता पार्टी का भारी नुकसान होने वाला है। कानोभाई ने कहा कि नरेन्द्र मोदी टाटा की नैनो फैक्टरी को अपनी बहुत बड़ी सफलता मानते हैं। परन्तु इस क्या कारण है कि जहां यह फैक्टरी स्थित है, वहीं पिछले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार हो गई। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि वे औद्योगीकरण के विरूध्द नहीं हैं। ''मैं औद्योगीकरण का विरोध कैसे कर सकता हूँ जबकि मैं स्वयं मारूति कार में चलता हूं और सर्जरी करने के लिए विभिन्न उपकरणों का उपयोग करता हूँ।'' उनसे यह पूछा गया कि निरमा सीमेण्ट उद्योग के बारे में उनका क्या कहना है। कानोभाई ने बताया कि जहां यह उद्योग स्थापित किया जाना है, वहां के किसानों के साथ गंभीर अन्याय हो रहा है। न सिर्फ उनकी जमीन छीनी जा रही है बल्कि खेती के लिए मिलने वाला पानी भी सीमेण्ट प्लांट को दिया जा रहा है। सरकार इस बात को छुपा रही है। मैं तो विधायक हूं। मुझे भी इस संबंध में नहीं बताया गया। मुझे तो यह बात उस समय पता लगी जब उद्योग के उद्धाटन का कार्यक्रम रखा गया था। मुझे अधिकारियों ने बताया कि उन्हें सख्त हिदायतदी गई थी कि किसी हालत में यह बात मुझ तक नहीं पहुंचना चाहिए। इससे बड़ा  अन्याय और क्या हो सकता है? कानोभाई भाजपा के अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जो नरेन्द्र मोदी की उद्योगपरस्त नीतियों का विरोध कर रहे हैं। उद्योगों के लिए जिन लोगों की जमीनें ली गई हैं वे अब कंगाल हो गए हैं। उनमें से कईयों ने जो भी पैसा मिला था वह फालतू चीजों पर व्यय कर दिया है। और   उनके परिवार अब भुखमरी की कगार पर हैं। एक किसान नेता लालजी देसाई कहते हैं कि जिन्होंने भी जमीन बेची, वे आज रो रहे हैं। जो पैसा मिला उससे महंगी-महंगी कारें खरीद लीं और शानो-शौकत से शादियां कर लीं। उनमें से कई हमारे आंदोलन को समर्थन दे रहे और जोर-जोर से कह रहे हैं कि जो गलती उन्होंने की है वह अब दूसरे किसान न करें। अनेक स्थानों पर किसानों और उन उद्योगपतियों, जिन्हें जमीनें दी गई हैं, के बीच सतत् संघर्ष होता रहता है। उद्योगपतियों ने वहां पहरेदारों को लगा रखा है जो किसानों को जल्दी से जल्दी जमीन खाली करने की धमकी देते रहते हैं। इसी तरह के एक किसान नाथूभाई का कहना है कि एक दिन रात को जब वे अपनी फसल की देखभाल कर रहे थे तब उन्हें पुलिस पकड़कर ले गई और पुलिस थाने में उनकी जमकर पिटाई की गई। पुलिस वाले उनसे  कह रहे थे कि ''जिस जमीन की तू रखवाली कर रहा है वह अब तेरी नहीं है, वह तो अब मारूति उद्योग की हो गई है''।

                इस तरह की घटनाएं आए-दिन हो रही हैं। ''हम लोग सदा से भारतीय जनता पार्टी को वोट देते आए हैं। हम मोदी के भक्त रहे हैं पर अब नहीं हैं। हम लोग अब समझ गए हैं कि मोदी सिर्फ उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के हैं। उन्हें गरीबों से कोई लेना देना नहीं है'', ये शब्द हैं सरतन भाई भारवाड के। उद्योगपति और उनके प्रतिनिधि किसानों के असंतोष से और उनके आंदोलन से चिंतित तो हैं पर उन्हें लगता है कि मोदी इस तरह के आंदोलनों को बल प्रयोग से दबा देंगे। परन्तु उद्योगपति भी यह अनुभव करते हैं कि यदि उन स्थानों पर, जहां उनके उद्योग लगेंगे, असंतोष की स्थिति बनी रहती है तो वह उद्योग के विकास में बाधा सिध्द होंगे। इसलिए वे भी यह महसूस करते हैं कि किसानों की नाराजगी को दूर करना आवश्यक है, भले ही उसके लिए कुछ कीमत चुकानी पड़े।

                कुल मिलाकर यह महसूस किया जा रहा है कि गुजरात का विकास का मॉडल वह नहीं है जिसका प्रचार मोदी की तरफ से सारे देश में किया जा रहा है। गुजरात के किसान, गुजरात के मजदूर और गुजरात के गरीब अब यह महसूस करने लगे हैं कि नरेन्द्र मोदी उनके नहीं हैं। गुजरात के बाहर रहने वालों को नरेन्द्र मोदी की नीतियों और उनके कार्यकलापों के इस पहलू का ज्ञान नहीं है।

               यदि यह पहलू उन्हें पता लग जाए तो शायद आम आदमी भी यह महसूस करने लगेगा कि गुजरात में विकास का मॉडल है वही यदि संपूर्ण देश के विकास का मॉडल बन जाएगा तो उन करोड़ों भारतीयों का क्या होगा, जो आज भी गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं।

   

? एल.एस.हरदेनिया