संस्करण: 16 सितम्बर-2013

गुजरात एक आदर्श राज्य नही

? क्रिस्टोफ जेफ्रिलोट

        ''गुजरात में वृध्दि ऋणग्रस्तता पर निर्भर करती है, और यह विकास के लिये बाधक है।''

                वामपंथियों द्वारा विकास के गुजरात ढाँचे की अक्सर उसके सामाजिक पिछड़ेपन के कारण आलोचना की जाती रही है। दरअसल, राज्य के सामाजिक सूचकांक उसके आर्थिक प्रदर्शन से मेल नहीं खाते है। 2010 में गुजरात में 23 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे थे  जबकि संपूर्ण भारत का औसत 29.8 प्रतिशत था। अर्थात गरीबी के मामले मे गुजरात की स्थिति देश के औसत से बेहतर थी। लेकिन विगत तीन वर्षों में देश के औसत की तुलना मे यह अनुपात 10प्रतिशत से भी कम हो गया है। इस दर का कुछ संबन्ध आकस्मिक श्रमिकों की मजदूरी के साथ भी है।

               नेशनल सेम्पल सर्वे आर्गेनाइजेशन के 68 वें सर्वे (2011-12) के अनुसार गुजरात के शहरी क्षेत्रों मे आकस्मिक श्रमिकों के लिये सबसे कम औसत दैनिक मजदूरी है (शासकीय कार्यों के अलावा)जो रू.144.52है जबकि इन श्रमिकों के लिये दैनिक मजदूरी का राष्ट्रीय शहरी औसत 170.10रूपये है। यह गरीबी कुपोषण का कारण होती है। सामाजिक सूचकांकों में से एक जहाँ गुजरात सबसे नाटकीय अंतराल से पीछे दिखाई देता है, वह भूख सूचकांक है -भारतीय लोकप्रशासन संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में आई.सी.डी.एस. के तहत सिर्फ 43 प्रतिशत बच्चे सामान्य वजन के हैं।

              ये सूचकांक समग्र मे है। इनको अलग-अलग करके देखना हमे काफी जानकारी देता है। गुजरात में ग्रामीण एवं शहरी विभाजन सुस्पष्ट है। औसत प्रतिव्यक्ति मासिक व्यय के आकलन संबन्धी शहरी राष्ट्रीय सेम्पल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के ऑंकड़ों से यह स्पष्ट है। 1993-94 में गांवों की तुलना में शहरों और कस्बों में मासिक प्रतिव्यक्ति खर्च 49 प्रतिशत अधिक था। चौदह साल बाद शहरी प्रतिव्यक्ति मासिक खर्च 68 फीसदी अधिक रहा। 2011-12 में यह अंतर 68.1 प्रतिशत पर स्थिर है। निश्चित रूप से, नर्मदा बांध के संचालन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कुछ लोगों के लिए परिस्थितियों में सुधार हुआ है, लेकिन यह केवल आंशिक रूप से ही हो सका है। क्योंकि नहरें, खासकर सौराष्ट्र में खेतों तक नहीं पहुंच रही है। यह न सिर्फ खराब नियोजन के कारण हुआ बल्कि शहरों (उद्योगों सहित ) के लिए पानी की आपूर्ति प्राथमिकता के आधार पर किये जाने के कारण भी हुआ है। दूसरा, नकदी फसल बोने वाले किसान कृषि उत्पादों के कम मूल्य स्तर से भी प्रभावित हुए हैं। उदाहरण के लिये कपास को ही लिया जाये तो उसके मूल्य मे वृध्दि नही हुई है जबकि मुद्रास्फीति के कारण लागत बहुत ज्यादा हो गई है। तीसरा, कृषि योग्य प्रमुख भूमि उद्योगों के लिए दे दी गई है और औद्योगिक गतिविधियों ने प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित किया है। निरमा समूह को खनन गतिविधियों और सीमेंट कारखाने के लिए 3000 हेक्टेयर भूमि दी गई थी। भाजपा विधायक कनुभाई कलसारिया ने जब यह आपत्ति की कि वह जल सरोवर जिस पर ग्रामीण लोग पानी के लिये निर्भर रहते है, इससे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाएगा। इस बात पर उन्हे दरकिनार कर दिया और बाद में उन्होने सरकार की नीतियों से लड़ने के लिए पार्टी से इस्तीफा दे दिया।

                राज्य की नीतियों से पीड़ित ग्रामीण समूहों के बीच आदिवासियों से संबधित एक मुद्दा है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार 1993-94 और 2004-05 के बीच गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले आदिवासी लोगों का हिस्सा 30.9 प्रतिशत से बढ़कर 33.1 प्रतिशत हुआ है जो राष्ट्रीय औसत से 10 प्रतिशत नीचे है। आदिवासियों और दलितों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में राशि आवंटित नही करने के लिये मोदी सरकार की आलोचना की गई है। जबकि आदिवासी और दलित गुजरात राज्य की आबादी का लगभग 18 प्रतिशत है। उन्हे 2007-08 में कुल परिव्यय की  11.01 प्रतिशत राशि आवंटित की गई। यह व्यय 2008-09 मे 14.06 प्रतिशत, 2010-11 मे 13.14 प्रतिशत किया गया और 2011-12 मे 16.48 प्रतिशत किया गया। इसके अलावा, वास्तविक खर्च भी कम थे। दलितों के साथ भी ऐसी ही स्थिति है जो राज्य की कुल जनसंख्या के 7.1 प्रतिशत है और जिन्हे 2007-08 मे कुल परिव्यय का  1.41 प्रतिशत आवंटित किया गया। 2008-09 मे 3.93 प्रतिशत, 2009-10 में 4.51 प्रतिशत, 2010-11 मे 3.65 प्रतिशत तथा 2011-12 में 3.20 प्रतिशत मे आवंटित किया गया।

               सामान्य तौर पर बात करे तो  गुजरात ने सामाजिक क्षेत्र मे इतना खर्च नही किया है जितना कि अन्य राज्यों ने। एक रिपोर्ट मे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने दर्शाया है कि गुजरात ने सामाजिक क्षेत्र मे अन्य राज्यों की तुलना मे कम खर्च किया है। शिक्षा को ही लें- 2010-11 मे गुजरात ने अपने बजट का 15.9 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय किया है। जबकि बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, केरल, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तार प्रदेश और पश्चिम बंगाल ने अपने बजट का 16 से 20.8 प्रतिशत के बीच खर्च किया है। इस अवधिा मे राष्ट्रीय औसत प्रतिशत 16.6 प्रतिशत था।

               वामपंथियों की ओर से की जाने वाली इन आलोचनाओं को सब अच्छी तरह से जानते है, किन्तु जो दक्षिणपंथी है विशेषकर उदारवादी, उन्होने भी वित्तीय अनुशासन को लेकर मोदी सरकार को दोषी ठहराया है। गुजरात का विकास पैटर्न ऋणग्रस्तता पर निर्भर करता है। राज्य पर कर्ज जो 2002 मे 45,301 करोड़ रुपये था वह बढ़कर 2013 मे 1,38,978 करोड़ रूपये हो गया है जो सामान्य तौर पर कर्ज मे डूबे प्रदेश कहलाने वाले उत्तरप्रदेश (1,58,400 करोड़) और पश्चिम बंगाल (1,92,100 करोड़) से बहुत ज्यादा पीछे नही है। राज्य के आकार को देखते हुए प्रति व्यक्ति कर्ज के मामले में यहाँ की स्थिति और अधिक चिन्ताजनक है। यदि राज्य की आबादी 6 करोड़ ही मान ली जाये तो प्रत्येक गुजराती पर 23163 रूपये का कर्ज आता है। सरकार की 2013-14 में 26,009 करोड़ रुपए का ताजा ऋण जुटाने की योजना है। इस राशि में से रुपए 19,877 करोड़  जो कुल राशि का 76 प्रतिशत है का उपयोग मौजूदा ऋण के मूलधान और ब्याज को चुकाने में इस्तेमाल किया जायेगा। यह आंकड़ा 100 प्रतिशत होने पर गुजरात  पूरी तरह कर्ज के जाल मे फॅस जायेगा।

                 इस वित्तीय संकट के कई कारक है। पहला, यह कि अनेक गुजराती जो करों का भुगतान कर सकते है वे ऐसा नही करते। चाहे वे कंपनियों मे बड़े पदो पर बैठे लोग हों या फिर आम नागरिक। 2010 में अकेले अहमदाबाद, सूरत, बड़ोदा और राजकोट में समस्त करदाताओं से प्राप्त कर की राशि रू. 7,555 करोड़ थी। यह उस समय बिहार के वार्षिक कर संग्रह की तुलना में अधिक थी।

               दूसरा, मोदी सरकार के व्यापार के अनुकूल दृष्टिकोण के कारण सरकारी खजाना सीधा प्रभावित हुआ है। निवेशकों को लुभाने के लिए,करों मे कटौती और कम ब्याज दरों को अपनाया गया और जमीनों को कोड़ी के दाम बैच दिया गया है। नैनो कारखाने का ही उदाहरण लें। यदि के.नाग लिखित मोदी की जीवनी पर यकीन करें,तो गुजरात सरकार ने टाटा मोटर्स को बेमिसाल छूट दी है जिसमें 1100 एकड़ भूमि को 900 रूपये प्रति वर्गमीटर पर बेच दिया गया जबकि उस समय उसकी बाजार दर 10,000 रूपये प्रति वर्ग मीटर के आसपास थी। भूमि के विक्रय पर लगने वाली 20 करोड़ रूपये की स्टॉम्प डयूटी चुकाने की छूट प्रदान की गई। विक्रय पर लगने वाले वेट का भुगतान 20 वर्ष के लिये स्थगित किया गया। कंपनी को 2900 करोड़ के निवेश के विरूध्द 9570 करोड़ का ऋण (निवेश का 330 प्रतिशत) 0.1 प्रतिशत ब्याज दर पर 20 वर्षों के लिये दिया गया।  गुजरात में कई बड़ी कंपनियों मे से प्रमुख जैसे- अदानी, एस्सार, रिलायंस, फोर्ड, मारुति, एल एंड टी और अन्य के लिये विशेष रूप से सेज ढांचे के तहत, विशेष परिस्थितियों की पेशकश की गई है।

                निश्चित रूप से, निवेशकों को आकर्षित करना भविष्य की तैयारी के लिये अच्छा तरीका है और यदि इस निवेश से कर/राजस्व प्राप्त होता हो भारी कर्ज में कोई समस्या नहीं है। लेकिन ये निवेश सरकार के लिये कैसे उत्पादक बने रहते है,यह देखने की बात है। इनमें से कई तो कम से कम आंशिक रूप से ही अपनी किस्मत को आजमा रहे हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्र अधिनियम बड़े विशेष आर्थिक क्षेत्रों (1000 हेक्टेअर से अधिाक) के मालिकों को 75 प्रतिशत भूमि गैर औद्योगिक उध्देश्यों के लिये उपयोग करने की अनुमति देता है। (छोटे लोगों के लिए, एस.ई.जेड. का 50 प्रतिशत तक गैर प्रसंस्करण क्षेत्रों के लिए छोड़ा जा सकता है)। एस.ई.जेड. मालिक रीयल स्टेट के क्षेत्र मे उतर आते है और जिस भूमि को कोड़ियों के दाम खरीदकर उसे बाजार दर पर पट्टे पर देते है। यह दिलचस्प है कि  कॉरपोरेट सेक्टर को सूचना के अधिाकार के दायरे मे नही रखा गया है। पता नही ऐसा क्यों किया गया?

         वे दक्षिणपंथी जो इस तथ्य की अनदेखी करते है कि मोदी सरकार बाजार के अनुकूल होने की बजाय व्यापार के अनुकूल है (आश्चर्यजनक रूप से, उदारवादी के लिए) वे दावा करते है कि  जिस तरीके से गुजरात निवेशकों को आकर्षित कर रहा है वह वृध्दि के लिये अच्छा है। लेकिन यह सिर्फ वृध्दि के लिए ही अच्छा है। विकास के लिए शिक्षा के क्षेत्र में निवेश बहुत अधिाक लाभकारी होगा।

? क्रिस्टोफ जेफ्रिलोट

(लेखक पेरिस मे सी.ई.आर.आई. साइंसेस/एन.सी.आर.एस. मे वरिष्ठ शोधा सहायक है तथा किंग्स इंडिया इंस्टीटयूट लंदन मे भारतीय राजनीति एवं समाजशास्त्र के प्रोफेसर है।)