संस्करण: 16 सितम्बर-2013

उत्तराखण्ड में पूजा-पाठ नहीं, पुनर्निर्माण-कार्य आवश्यक है।

? डॉ. गीता गुप्त

         ह सर्वविदित है कि तीन माह पूर्व उत्तराखण्ड में आयी प्राकृतिक आपदा ने वहां का जनजीवन तबाह कर दिया है। अब जबकि समूचे देश में त्योहारों की धूमधाम शुरू हो चुकी है, केदार घाटी में वीरानी छायी है। चार सौ से अधिक गांव आज भी आपदाग्रस्त हैं और 150 से अधिक गांवों की हालत बहुत खराब है। सड़कें, अस्पताल, स्कूल, घर-सभी कुछ ध्वस्त हो चुके हैं। सड़कों के नाम पर सिर्फ पगडण्डियां दिखाई देती हैं। आवागमन अभी सड़कों के पुननिर्माण तक संभव नहीं। अगस्त्य मुनि, गौरीकुण्ड, गुप्तकाशी के मार्ग चलने लायक नहीं हैं। रूद्रप्रयाग से केदार घाटी के बीच खण्डहरों में तब्दील हो चुके गांव किसी युध्द में हुई बर्बादी के प्रतीक लगते हैं। खतरनाक रास्ते और टूटी सड़कें मरम्मत के इन्तजार में हैं। आपदा ने जिनके घरों को ध्वस्त कर दिया और आत्मीयजन को छीन लिया, वे शोकग्रस्त और किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। उन्हें नहीं सूझ रहा कि जीवन की गाड़ी आगे कैसे चलेगी ? केदार घाटी के मलबों से अब तक लाशें निकल रही हैं। पिछले दिनों 166 शव मिले हैं। केदारनाथ मन्दिर तक जाने का रास्ता अभी नहीं बना है मगर लापता श्रध्दालुओं के परिजन वहां आसपास भटक रहे हैं। वर्तमान स्थितियों में, एक पंक्ति में कहें तो-समूची घाटी के जीवन को पटरी पर लाने के लिए युध्द स्तर पर पुनर्निर्माण कार्य आवश्यक है।

                 प्रत्यक्षदर्शियों का मानना है कि अभी घाटी में यात्रा और पूजा-पाठ लायक स्थिति नहीं है। चार सौ गांव कस्बे जो तबाह हो चुके हैं उनमें एक भी घर नहीं बन पाया है। 1520 टूटी हुई सड़कों में से 1300 सड़कें अब भी जस की तस हैं। 350 छोटे-बड़े पुल बह चुके हैं पर एक भी नया पुल नहीं बना है। कुल 1100 किलोमीटर राजमार्ग का 800 किलोमीटर रास्ता अब तक क्षतिग्रस्त पड़ा है। सोचने की बात यह है कि उत्तराखण्ड की मदद के लिए केन्द्र सरकार 1400 करोड़ की राशि उपलब्धा करायी है। मुख्यमंत्री राहत कोष में 375 करोड़ रुपये आए। एशियाई विकास बैंक ने 7000 करोड़ की सहायता घोषित की। यानी अर्थसंकट जैसी कोई बाधा नहीं, फिर भी वहां स्थितियां पूर्ववत हैं। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्य सचिव आर.एस. टोलिया का कथन है कि 'सिर्फ निर्णय लेने में देरी हो रही है। यही वजह है कि उत्तराखण्ड का पुनर्निर्माण तीन माह बाद भी ठीक से शुरू नहीं हो पा रहा है। बारिश बाधा बनी हुई है।'

               सवाल यह है कि जब चार धाम की सड़कें पूर्णत: बदहाल हैं, जनजीवन अस्त-व्यस्त है। जनता राहत पाने के लिए व्याकुल है। तो सरकार का धयान उनकी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति पर केन्द्रित क्यों नहीं है ? वह क्यों 11 सितम्बर को केदारनाथ मंदिर में पूजा आरंभ करने हेतु आतुर है ? एक हिन्दी समाचार पत्र की टीम ने घाटी की दुर्दशा देखने के बाद जो रपट प्रस्तुत की है तदनुसार, ऋषिकेश-बद्रीनाथ राजमार्ग जोशीमठ से आगे इतनी खराब है कि बद्रीनाथ पहुंचने के लिए टुकड़ों-टुकड़ों में मार्ग बदलकर ही यात्रा संभव है। उत्तरकाशी-गंगोत्री राजमार्ग घरासू और बड़कोट से आगे बन्द है। यमनोत्री राजमार्ग वाडिया और फेडी के आगे पूरा खराब है। केदारनाथ राष्ट्रीय सोनप्रयाग से आगे जाने लायक ही नहीं है। और तो और, केदारनाथ मंदिर इलाके की ऊंची पहाड़ियों पर आज भी शव मिल रहे हैं जिन्हें रसायनों से नष्ट किया जा रहा है क्योंकि इतनी ऊंचाई पर दाह संस्कार हेतु न लकड़ियां हैं, न सरकार ने कोई व्यवस्था की है। ऐसी विषम परिस्थिति में पूजा की शुरूआत कर सरकार क्या संदेश देना चाहती है ? यही कि प्रदेश में सब कुछ ठीक है ? ज्ञातव्य है कि मुख्यमंत्री सहित तमाम मंत्री और नौकरशाह हेलीकॉप्टर से केदारनाथ मंदिर जाकर शाही पूजा कर सकें इसके लिए दो माह से 18 हेलीकॉप्टर प्रबंध में लगे रहे। पूजा के लिए अस्थायी निर्माण और विशिष्ट व्यक्तियों के लिए आवास प्रबंध हेतु निर्माण-सामग्री और मजदूर तक हेलीकॉप्टर से पहुंचाये गए। इस तामझाम में 45 करोड़ रुपये फूंक दिये गए।

               विडम्बना यह कि उत्तराखण्ड शासन द्वारा जारी विज्ञापन में दर्शाया गया है कि केदारनाथ में पुलों का पुनर्निर्माण सम्पन्न हो चुका है और बिजली व जल की आपूर्ति बहाल कर दी गई है। इसे क्या कहा जाए ? क्षत-विक्षत राष्ट्रीय राजमार्ग पर केदारनाथ मंदिर में पूजा के नये होर्डिंग वहां के पीड़ितों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। सच्चाई यह है कि उत्तराखण्ड सरकार ने दो माह पूर्व आई.आई.टी. रूड़की के आपदा प्रबंधन और तकनीकी विभाग से मदद लेने का निर्णय लिया पर उन्हें यह नहीं बताया कि उनसे कैसी मदद चाहिए? फिर अमेरिका से भी विशेषज्ञों का बुलाने का निर्णय लिया। तो क्या हमारे देश के विशेषज्ञ आपदा प्रबंधन हेतु सक्षम नहीं? दिल्ली व देहरादून में बैठकें आयोजित कर, विदेशों से विशेषज्ञों को आमंत्रित कर केवल औपचारिक खानापूर्ति में ही धन व समय नष्ट करना कहां तक उचित है? यदि सरकार को जनता की सचमुच परवाह होती तो इन तीन महीनों में कुछ ठोस निर्माण कार्य हो चुका होता। आज हर संवेदनशील हृदय उत्तराखण्ड सरकार से पूछना चाहता है कि युध्द स्तर पर दो माह निर्माण कार्य को युध्द स्तर पर चलाना अधिक आवश्यक नहीं था ? जब तक वहां जनजीवन सामान्य नहीं हो जाता, जब तक सारी सड़कें, पुल और मकान नहीं बन जाते, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और तमाम संस्थान पुनर्निर्मित नहीं हो जाते, तब तक मंदिर में धार्मिक कर्मकाण्ड का औचित्य क्या है ? और देश भर के श्रध्दालुओं को यात्रा की अनुमति देने का भी औचित्य क्या है ? क्या पूजा-पाठ से वहां के निवासियों को संकट से मुक्ति मिल जाएगी ? या श्रध्दालुओं का आगमन उनके कष्ट को हर लेगा ?

              उत्तराखण्ड सरकार ने संकेत दे दिया कि उसके लिए पूजा-पाठ ही सर्वोपरि है, जनता की सुख-सुविधा या खुशहाली नहीं। चूंकि उत्तराखण्ड का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है, उसे तीर्थयात्रियों की ही चिन्ता है। ऐसे में श्रध्दालुओं को भी उत्तराखण्ड के पुनर्निर्माण हेतु आगे आना चाहिए। इस देश में लाखों तथाकथित साधु संत भी मौजूद हैं। यदि वे सब केदार घाटी में जाकर श्रम-दान करें तो महीने भर में अद्भुत निर्माण कार्य हो सकता है। लाखों साधु-संत यदि पूजा-पाठ और पवित्र स्नान के लिए एकत्र हो सकते हैं, तो कल्याण-कार्य के लिए क्यों नहीं ? यदि इस वर्ष अपने घर, नगर और राज्य में पर्वो-त्योहारों को धूमधाम से मनाने की बजाय सारे ईश्वरभक्त यह तय कर लें कि वे उस राशि से उत्तराखण्ड जाकर वहां की सरकार और जनता के साथ मिलकर वहां पुनर्निर्माण कार्य में प्रत्यक्ष सहभागी बनेंगे तो इससे बड़ा पुण्य कार्य और कुछ नहीं हो सकता।

               अभी त्योहारों की श्रृंखला आरंभ ही हुई है। सरकारें लधदड़ चाल से ही चलती आयी हैं और चलती रहेंगी, यह सर्वविदित है। ऐसे में तमाम श्रध्दालुओं को एक कल्याणकारी पहल करनी चाहिए। एक महत्वपूर्ण बात और, मीडिया प्राय: धार्मिक आडम्बर और अन्ध भक्ति को बढ़ावा देता है। अभी एक प्रतिष्ठित हिन्दी अखबार ने गणेशजी के सर्वश्रेष्ठ पंडालों को पुरस्कृत करने की घोषणा की है। कितना अच्छा होता यदि ऐसी टोली या ऐसे लोगों को पुरस्कार देने की घोषणा की जाती, जो इस पर्व के अवसर पर उत्तराखण्ड में जाकर कोई मकान, विद्यालय, अस्पताल या संस्थान निर्माण में योगदान करके आते ! खैर अब भी समय है, धर्मान्धता से परे सचमुच धार्माचरण अपनाकर पीड़ित मानवता के लिए कल्याण कार्यों में सहभागिता की पहल करें। इसी में देश का हित निहित है।

? डॉ. गीता गुप्त