संस्करण: 16 सितम्बर-2013

मप्र में कुपोषण के नाम पर किसका 'पोषण'

 

 

? राखी रघुवंशी

         ध्यप्रदेश के माथे पर लगे चुके कुपोषण के कलंग को मिटाने के लिए प्रदेश सरकार जहां पानी की तरह पैसा बहा रही है वहीं आज भी मप्र में कुपोषण के नाम पर कुपोषित का नहीं, बल्कि किसी और का पोषण हो रहा है। मध्यप्रदेश में हर साल करीब 30 हजार बच्चे अपना पहला जन्मदिन तक नहीं मना पाते और काल के गाल में समा जाते हैं। ये वो अभागे अबोध बच्चे हैं, जो धरती पर पैर रखने के साथ ही कुपोषण के शिकार होते हैं और जन्म के बाद पोषण आहार की कमी के चलते अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसी कलंक की बदौलत मध्यप्रदेश देश के उन पिछड़े राज्यों में शुमार है, जहां शिशु मृत्युदर सबसे ज्यादा है। मध्यप्रदेश में शिशुमृत्यु दर 70 प्रति हजार है। गरीबी, पिछड़ेपन और अशिक्षा की मार झेल रहे मध्यप्रदेश में कुपोषण की स्थिति चिंताजनक है, जबकि प्रदेश की भाजपा सरकार इसे लेकर गंभीर नहीं है। हालांकि पिछले दिनों भारत सरकार द्वारा राज्य सरकार और केंद्र के अधिकृत प्रतिवेदनों के आधार पर जारी रिपोर्ट के बाद प्रदेश सरकार को शर्म से झुकना पड़ा और उसने स्वीकार किया कि मध्यप्रदेश में हर साल हजारों बच्चे कुपोषण के कारण बेमौत मारे जाते हैं और इसके बाद प्रदेश सरकार ने इससे निजात का वादा किया और जिसका आगाज अटल बाल अरोज्य मिशन के तौर पर की गई है पर देखना यह है कि यह मिशन प्रदेश के माथे से इस कलंक को मिटाने में कितना सफल हो सकेगा।

                 मध्यप्रदेश को कुपोषण की समस्या से निजात दिलाने का वायदा आश्वासन बनकर ही रह गया। आंकड़े इसके प्रमाण हैं। वर्ष 2008-09 में राज्य में कुपोषण के कारण 29 हजार 274 बच्चों की मौत होने की पुष्टि खुद राज्य सरकार ने विधानसभा में की है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में कुपोषण 54 प्रतिशत से बढकर 60 प्रतिशत पहुंच गया है। रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश में 12.6 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण का शिकार हैं, जबकि देश में औसतन 6.4 प्रतिशत बच्चे ही गंभीर रूप सेकुपोषित हैं। मध्यप्रदेश में 13 लाख 35 हजार बच्चे (पांच वर्ष तक की आयु के) गंभीर रूप से कुपोषित हैं तो प्रदेश में पिछले 32 महीनों में 82 हजार से अधिक शिशुओं की मौत हो चुकी है। इसमें अकेले सतना जिले में इस दौरान करीब 5 हजार से अधिक शिशुओं की मौत हुई, जो कि प्रदेश में सर्वाधिक है।

               विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही प्रमुख दलों ने चुनावी घोषणा पत्रों में राज्य को कुपोषण मुक्त बनाने का वायदा किया था, लेकिन कमजोर इच्दाशक्ति, उदासीन प्रशासन तंत्र, शासन-प्रशासन में भ्रष्टाचार और जनता के प्रति संवेदनहीन रवैये के कारण हर साल करोड़ों-अरबों रुपए पानी की तरह बहाने के बाद भी कुपोषण की समस्या भयावह रूप में मौजूद है। राज्य सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के ग्रोथ चार्ट के मानदंडों के अनुसार मध्यप्रदेश में कुपोषित बच्चों का पता लगाने के लिए दिसंबर 2009 में एक अभियान चलाया था। अभियान के तहत 6 माह से 6 वर्ष तक के बच्चों का वजन लेकर उनमें कुपोषण के स्तर का पता लगाने लिए बच्चों की तीन श्रेणियां तय की गई। इसमें सामान्य, कम वजन और अति गंभीर कुपोषित बच्चों के आधार पर सर्वे किया गया। इस अभियान के तहत कुल 57 लाख बच्चों का वजन लिया गया, जिसमें से करीब 2 लाख 82 हजार बच्चे अति गंभीर कुपोषित पाए गए। यहीं नहीं औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या भी करीब 18 लाख के आसपास रही, जबकि सामान्य वजन के बच्चों की संख्या मात्र 36 लाख सामने आई।

                सरकारी रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिले में कुपोषण की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक पाई गई है, जिनमें राज्य के झाबुआ, अलीराजपुर, मंडला, सीधी, धार और अनूपपुर जिलों में अतिकुपोषित बच्चों की संख्या 7 से 15 प्रतिशत तक रही। हालांकि कुपोषण की स्थिति का पता लगाने के लिए बच्चों के वजन मापने के इस अभियान में कई तरह की खामियां और गड़बडियां भी सामने आईं, जिसके कारण प्रदेश में कुपोषण के शिकार बच्चों की वास्ततिक स्थिति सामने नहीं आ सकी। ऐसे में इन नतीजों पर पूरी तरह से भरोसा तो नहीं किया जा सकता, किन्तु यह राज्य सरकार और इसके कर्ता-धर्ताओं के लिए आंख खोलने वाले हैं। गड़बडियों में वजन मापने की मशीनों की कमी के कारण 30 हजार से ज्यादा आंगनबाड़ी केंद्रों में दूसरे स्थानों से मशीने लाई गईं और कई मशीनें बिगड़ जाने से सुदूर ग्रामीण अंचलों में उन्हें सुधारा भी नहीं गया और मनमाने तौर पर बच्चों का वजन लिया गया। फिर भी इन ताजे परिणामों से भी यह सिध्द होता है कि मध्यप्रदेश में बच्चों में कुपोषण की स्थिति काफी खतरनाक स्थिति में हैं।

               कुपोषण को लेकर प्रदेश सरकार और प्रशासनिक अमला कितना गंभीर है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मध्यप्रदेश में समेकित बाल विकास सेवाओं के लिए पूरे राज्य में जहां एक लाख 46 हजार आंगनबाड़ी केंद्रों की जरूरत है, वहां राज्य में केवल 70 हजार आंगनबाड़ी केंद्र ही संचालित हो रहे हैं, जो कि राज्य के मात्र 76 फीसदी बच्चों को ही अपनी सेवाएं दे पा रही हैं, जबकि एक चौथाई बच्चे अभी भी बाल कल्याण सेवाओं से पूरी तरह से वंचित हैं। मध्यप्रदेश की केवल 13 हजार आदिवासी बस्तियों में समेकित बाल विकास सेवा का लाभ पहुंच रहा है, लेकिन तकरीबन 4200 आदिवासी बस्तियां इस सेवा से आज भीवंचित हैं। राज्य में वर्ष 2007-08 में इस सेवा के लिए जहां 1320 करोड़ रुपयों की आवश्यकता थी वहीं सरकार ने इसके लिए केवल 320 करोड़ रुपए ही उपलब्ध कराये। इसमें भी पोषण आहार के लिए तो मात्र255 करोड़ रुपए। मध्यप्रदेश सरकार 2008-09 के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि राज्य में कुल 367बाल विकास परियोजनाओं के अंतर्गत कुल 69 हजार 2 सौ 38 आंगनबड़ी केंद्रों से तकरीबन 49 लाख 24 हजार बच्चों तथा 10 लाख 31 हजार गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली माताओं को पोषण आहार सेवा का लाभ उपलब्ध कराया जा रहा है।

                 नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ न्यूट्रीशन हैदराबाद (एनआईएन) की रिपोर्ट के अनुसार राजधानी भोपाल समेत पूरे मप्र के आधो से अधिक बच्चे सामान्य से कम वजन के हैं, जो कहीं न कहीं कुपोषण के दायरे में हें। भोपाल के 55.80 प्रतिशत बच्चे सामान्य से कम वजन वाले और 21 प्रतिशत बच्चे अत्यंत कम वजन के हैं। सतना जिले में सर्वाधिक 67.10 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हें। इसके अलावा प्रदेश की स्थिति भी ठीक नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 51.77 प्रतिशत बच्चे सामान्य से कम वजन के पाए गए हैं, जबकि सामान्य बच्चों की संख्या 48.1 प्रतिशत है। दरअसल,करीब 28 सौ करोड़ सालाना बजटवाले महिला एवं बाल विकास विभाग में कुपोषण मिटाने के लिए कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन इससे मुक्ति नहीं मिल पा रही है।

 

? राखी रघुवंशी