संस्करण: 16 सितम्बर-2013

नकली लालकिले से

लालच का तुष्टीकरण

 

? विवेकानंद

             हाल ही में नरेंद्र मोदी ने जयपुर रैली में ए बी सी डी के नए मायने समझाए। अच्छा होता पूरी पढ़ लेते। क्योंकि बी से बंगारू लक्ष्मण, और बाबूभाई बोखीरिया भी होता है, जिन्हें भ्रष्टाचार के मामले में कोर्ट ने सजा सुनाई है, बी से ही बीएस येदियुरप्पा होता है जिनकी कुर्सी भ्रष्टाचार के कारण गई है। एन से नितिन गडकरी होता है, पी से पुरुषोत्तम सोलंकी होता है जिन पर भ्रष्टाचार का केस चल रहा है। आर से राघवजी होता है, जिन पर अपने ही नौकर से कुकर्म का आरोप है।  और भी ऐसे कई नाम हैं जो ए बी सी डी से ही शुरू होते हैं।

             बहरहाल! हर आदमी आगे बढ़ने का सपना देखता है, सपने पूरे हों इसके लिए परिश्रम भी करता है। लेकिन कुछ लोग अतिमहत्वाकांक्षी होते हैं, वे सपना पूरा करने के लिए परिश्रम की बजाए छल-कपट, दबाव और झूठ का सहारा लेते हैं, ऐसे लोगों के सपने अक्सर पूरे नहीं होते, लिहाजा ऐसे लोग जब सपना पूरा होता नहीं देखते तो जैसा वे बनना चाहते हैं, वैसा स्वांग करके अपनी लालच को तुष्ट कर लेते हैं। कुछ लोग चतुरसुजान होते हैं, संबंधित व्यक्ति की लालच को तुष्ट करके उसकी इच्छा को और भड़काते हैं। इसका एक लाभ भी होता है कि अनावश्यक विवाद से बचे रहते हैं। छत्तीसगढ़ में पिछले दिनों ऐसा ही एक बाकया सामने आया। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भाजपा के अघोषित पीएम इन वेटिंग नरेंद्र मोदी की लालच को तुष्ट करने के लिए एक नकली लालकिले का निर्माण करा दिया, जिस पर चढ़कर फूले नरेंद्र मोदी ने अपनी झूठे आंकड़ों और दावों की जमकर तलवार भांजी। सही मायनों में देखें तो यहां रमन सिंह अन्य उन नेताओं से ज्यादा समझदार निकले जो मोदी का विरोध करके पार्टी और अपना नुकसान करते हैं। दरअसल रमन सिंह समझ चुके हैं कि नरेंद्र मोदी गगनगामी लालच के वशीभूत हैं, और इस स्थिति में पहुंच चुके हैं जहां उन्हें समझाने का कोई लाभ नहीं है, वैसा करो जैसा वे चाहते हैं। जब हकीकत के कठोर धरातल पर आएंगे तब सब अपने आप समझ में आ जाएगा। ऐसे और भी कई नेता हैं, और संदेह तो यहां तक है कि आरएसएस भी मोदी के साथ डबल गेम खेल रहा है। लेकिन लालच में अंधे मोदी को यह रणनीति समझ में नहीं आ रही है।

              मोदी की महत्वाकांक्षा जितनी ऊंचाई पर जाएगी, लक्ष्य न मिलने पर जब यह गिरेगी, उतना ही तीखा दर्द भी मोदी को ही झेलना पड़ेगा। संघ जिस तरह से यह जानते हुए भी कि अगले लोकसभा चुनाव में भी किसी को स्पष्ट बहुमत की उम्मीद नहीं है, मोदी के पक्ष में डटकर खड़ा है, इससे लगता है कि दाल में कुछ काला है। वरना अपने सबसे लोकप्रिय नेता को ऐसी गली में क्यों छोड़ता जहां आगे अंधेरा होने की आशंका है। संघ की आज्ञा पन भाजपा के सबसे बुजुर्ग नेता और संस्थापक सदस्य लालकृष्ण आडवाणी को मोदी के आगे दरकिनार कर दिया गया। संघ की आज्ञा से ही पहले गोवा में आडवाणी के विरोध को खारिज करके मोदी को चुनाव कैंपेन कमेटी का अध्यक्ष बनाया और अब आडवाणी को खारिज करके मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाया जा रहा है। लगता है इसमें संघ दोहरा लाभ देख रहा है। पहला तो यह कि मोदी का कद जो कि आज पार्टी से बड़ा हो गया है,यदि लोकसभा चुनाव में उनके आने के बावजूद पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है,तो कुछ कम हो जाएगा। दूसरा नरेंद्र मोदी अपनी फेसबुकिया लोकप्रियता पर इतरा रहे हैं,पराजय के बाद उनकी लोकप्रियता का गुब्बारा भी फूट जाएगा और उन्हें पार्टी की एकजुट ताकत का अहसास हो जाएगा। यानि स्पष्ट शब्दों में कहें तो फिलहाल संघ मोदी के अहंकार को तुष्ट कर रहा है, जीत गए तो अच्छा है, और हार गए तो अपनी हैसियत समझने लगेंगे। लेकिन मोदी का अहंकार इतना बढ़ चुका है कि उन्हें न तो उस व्यक्ति की आवाज सुनाई दे रही है,जिसने उन्हें राजनीति की गलियों में चलना सिखाया और गडढों से बचाया और न ही उन लोगों की बात समझ में आ रही है जो हकीकत का आईना लेकर सामने खड़े हैं। मोदी को लगता है कि उनके झूठे विकास के आंकड़े और अनाप-शनाप दावों पर बनजे वाली तालियां उनका बेड़ा पार कर देंगी। इस अहंकार के कारण वे अपने ही बुजुर्गों को बच्चों के बीच बैठकर संकेत भी देते हैं कि जिसने भी प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा बर्बाद हो गया। लेकिन राजनाथ सरीखे भाजपा नेता इसे गोलमोल तरीके से टाल देते हैं।

              राजनीति में अक्सर यह स्थिति बन जाती है और वक्त-वक्त पर इसके प्रमाण भी मिलते रहते हैं, लेकिन जिस आदमी की आंखों पर अहंकार का पर्दा चढ़ा होता है वह इन्हें देख नहीं पाता। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की परीक्षा हो चुकी है, हिमाचल में, उत्तराखंड में, कर्नाटक में लेकिन उन्हें अब तक यह समझ में नहीं आया कि उनकी लोकप्रियता फर्जी है, वे जो झूठ बोलते हैं और जरखरीद कर्मचारी उसे मीडिया में चलाते हैं, उससे देश परिचित हो चुका है। गुजरात के भ्रष्टाचार और अत्याचार की पोल खुल चुकी है, बावजूद इसके राजनीतिक मद में अंधे मोदी लगातार झूठ बोलते जा रहे हैं और नकली लालकिले पर चढ़कर अपनी लालच कितनी गहरी है, इसका प्रदर्शन कर रहे हैं। मोदी को सहयोगी भी इसी तरह के मिल रहे हैं। इनमें से दो साथी हैं सुब्रह्मण्यम स्वामी और बाबा रामदेव। सुब्रमण्यम स्वामी यूं तो कानून के बड़े जानकार हैं, लेकिन झूठ बोलने में उनका भी कोई मुकाबला नहीं है। पिछले दिनों स्वामी जी ने आम आदमी को भड़काने के लिए एक जोरदार तीर छोड़ा, हालांकि यह फुस्सी बम निकला। ताजा-ताजा भाजपा में शामिल हुए स्वामी ने मंदिरों से सोना लेने का मामला उठाया और कहा कि सरकार यदि मंदिरों का सोना लेगी तो आंदोलन किया जाएगा। यह आम आदमी को अनावश्यक रूप से भ्रमित करने वाला बयान था क्योंकि सरकार की ओर से ऐसी किसी योजना का न तो ऐलान किया गया न ही संकेत दिया गया। अलबत्ता भारतीय रिजर्व बैंक मंदिरों में पड़े सोने को खरीदने का विचार कर रहा है ताकि आम आदमी की जरूरत के लिए सोने का आयात न करना पड़े। इसमें किसी तरह की कोई बुराई नजर नहीं आती। मंदिरों में सोना है जो तिजोरियों में बंद है, जिसका कोई उपयोग नहीं है, यदि रिजर्व बैंक उसे पैसे देकर खरीदता है तो मंदिरों को और हिंदू धर्म को कौन सा नुकसान होता है? मंदिरों का सोना खरीदने से देश को सोना आयात नहीं करना होगा, उसके लिए डालर खर्च नहीं करना होगा जो देश के लिए ही लाभदायक होगा। अब यदि इस पर कोई तर्क दे कि सरकार की नीतियों के कारण आर्थिक स्थिति बिगड़ी है तो इस मौके पर उसे कुतर्क ही माना जाएगा। मान लेते हैं कि सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण स्थिति बिगड़ी है तो इसका मतलब यह तो कतई नहीं हो सकता कि अब उसे सुधारने ही न दिया जाए, और जो सुधारने के उपाए हैं, उन पर कुतर्क और झूठा बोलकर आम आदमी को भ्रमित किया जाए। ऐसे ही बाबा रामदेव हैं। भगवा पहनकर नेता का प्रशस्तिगान उन्हें आजकल बहुत भा रहा है। पता चला है कि पूजा-पाठ छोड़कर आजकल बाबाजी मोदी के लिए अपने समर्थकों और चेलों को राजनीतिक सबक सिखा रहे हैं। इन बाबाजी पर टैक्स चोरी के कई आरोप हैं। अपने ही गुरू के लापता होने के मामले में भी बाबा की भूमिका संदिग्ध है। इनका सहयोगी फर्जी कागज लगाकर पासपोर्ट बनवाने का अरोपी है। लेकिन इन्होंने अपने लिए गजब की ढाल तैयार कर रखी है। जब भी बाबा के गोरखधंधे की चर्चा होती है, वे तपाक से कहते हैं कि यह कांग्रेस का विरोध करने के कारण हो रहा है। क्या कांग्रेस का विरोध करने वाले को अपराध करने की छूट मिल जानी चाहिए? बाबाजी शायद यही चाहते हैं।  

? विवेकानंद