संस्करण: 11 मई-2011

संदर्भ :- घाटी में कश्मीरी महिला पंड़ित की पंचायत चुनाव में जीत की हासिल
आतंक के गढ़ में कश्मीरी महिला
पंड़ित की जीत
 

? प्रमोद भार्गव

               लोकतंत्र में चुनाव हालातों को बदलने का सबव बनता है। कश्मीर घाटी में संपन्न हुए पंचायत निर्वाचन से तो यही संदेश निकलकर आया है। दो दशक में दूसरी बार हुए पंचायत चुनाव में आतंक के गढ़ माने जाने वाले बारामूला जिले के सबसे ज्यादा उग्रवाद से ग्रस्त क्षेत्र कुंजर विकासखण्ड की ग्राम पंचायत वुस्सन से कश्मीरी महिला पंड़ित आशा ने जीत हासिल करके केंद्र और राज्य सरकार को तो हैरानी में डाला ही है,उन आतंकवादियों को भी हैरानी में डाला होगा जो अर्से से इस्लाम व बंदूक के नाम पर मुसलमानों को बरगलाने में लगे हैं। इस नतीजे ने यह तो साबित कर दिया है कि आम अवाम को न तो मुट्ठी भर आतंकवादियों का भय है और न ही वे उन अलगावादियों के समर्थक हैं,जो घाटी को भारत से अलग करने की मुहिम चला रहे हैं। इस परिणाम से सबक अब जम्मू कश्मीर की जनता को नहीं बल्कि केंद्र व राज्य की उन सरकारों को लेने की जरूरत है,जो चंद पत्थरबाजों के सामने घुटने टेकने को लाचार हो जाती हैं। इस जीत को यह संदेश भी मानकर चलना चाहिए कि विस्थापित कश्मीरी पंड़ितों के पुनर्वास के लिए अलग क्षेत्र 'पनुन कश्मीर'बनाने की बजाय पंड़ितों की वादी में ही वापिसी के सार्थक उपाय किए जाएं।

 

               त्रिस्तरीय पंचायतीराज प्रणाली में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित किए जाने से महिलाओं को अपनी नेतृत्व-दक्षता दिखाने का सुनहरा अवसर मिला है। आरक्षण की सुविधा का लाभ उठाकर ही शासन-तंत्र के जिला पंचायत अधयक्ष,नगर पंचायत अधयक्ष और ग्राम पंचायत के सरपंच के रूप में महिलाओं की जबरदस्त भागीदारी सामने आई है। इसी सुविधा का नतीजा है कि दो दशक से भी ज्यादा समय से आतंकवाद से जूझ रही कश्मीर घाटी में बदलाव की बयार शुरू हो गई है। हालांकि आतंकवादी घाटी में चुनाव नहीं चाहते थे। अपनी इसी मंशा की पूर्ति के लिए उन्होंने जगह-जगह उम्मीदवारों और निर्वाचन-दलों पर जानलेवा हमले भी किए। कुछ उम्मीदवार जख्मी भी हुए। बावजूद इसके कश्मीर की अवाम ने चुनाव में बढ़-चढ़कर शिरकत करते हुए आतंकवादियों, अलगाववादियों और असामाजिक तत्वों को अपने मकसद में कामयाबी नहीं मिलने दी। घाटी में सुरक्षा के पर्याप्त उपाय किए जाने से भी वहां लोकतंत्र की रक्षा हुई। स्थानीय पुलिस,अर्ध्दसैनिक बल,भारत-तिब्बत सीमा पुलिस और सेना ने सख्ती व सर्तकता से आतंकवादियों की हरकतों को ऐस बढ़े काण्ड में तब्दील नहीं होने दिया जिससे चुनाव प्रभावित होता और डर के चलते मतदाता,मतदान के लिए घरों से निकलते ही नहीं। इसी वजह से एक अल्पसंख्यक हिन्दू महिला चुनाव लड़ी और बहुसंख्यक मुसलमानों ने उसे भरपूर समर्थन दिया। नतीजतन आशा देवी मुस्लिम समाज की प्रतिद्वंद्वी महिला सरबा बेगम को 11 वोटों से हरा पाईं। कश्मीर घाटी में आतंक को पनाह मिलने के बाद आशा पहली ऐसी हिन्दू महिला हैं जिहोंने चुनाव जीतने का इतिहास रचा।

 

               आशा व उनके परिजनों को इस बात के लिए भी दाद देनी पडेग़ी कि उन्होंने आतंकियों के भय से अपने पुश्तैनी गांव वुस्सन से पलायन नहीं किया। ऐसा न करके वे शरणार्थियों के अभिशापित जीवन यापन की मजबूरी से भी बचे रहे। इस गांव में कश्मीरी पंडितों के चार परिवार और भी रह रहे हैं। गांव के मुस्लिम समुदाय के वे बहुसंख्यक लोग भी बधाई के पात्र हैं,जिन्होंने अपने गांव के अल्पसंख्यकों का पलायन नहीं होने दिया और उनका सुरक्षा कवच बने रहने में अह्म भूमिका निभाई। इसीलिए विजयश्री हासिल करने के बाद आशा ने कहा भी,चंद सजातीयों के बीच,यहां के लोगों ने मुझमें जो यकीन दिखाया है,मैं उस पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगी। वैसे भी इन लोगों ने हमारा तब साथ दिया था,जब कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के सबसे बुरे दिन चल रहे थे। मुझे चुनाव लड़ने के लिए भी एक गांव के ही मुस्लिम भाई अब्दुल हामिद वानी ने प्रेरित व प्रोत्साहित किया।

 

               सांप्रदायिकता को लेकर वुस्सन गांव का वातावरण बदरंग व कुटता से भरा भी नहीं है। यहां के बासिंदे न किसी को कश्मीरी पंडित मानते हैं और न ही कश्मीरी मुसलमान। बल्कि उनके लिए समन्वय और सद्भाव के मूल्य मायने रखते हैं। लिहाजा सभी एक-दूसरे को कश्मीरी मानते हैं। इस गांव में पढ़े-लिखे भी पंड़ित परिवारों के ही लोग हैं। आशा का परिवार सुख-दु:ख में सबका हमदर्द तो बनता ही है,वह हर तरीके से लोगों की मदद में भी लगा रहता है। इसलिए शायद यहां वह सियासत दिखाई नहीं दी जो पंचायत स्तर पर कश्मकश के चरम पर होती है। यहां मुसलमानों को वोट बैंक की दृष्टि से देखने वाली राजनीति भी पश्त हो गई। दरअसल कांग्रेस और अन्य सांप्रदायिकता का हौवा खड़ा करने वाले राजनीतिक दल मुसलमानों को हिन्दुओं और हिंदुओं को मुसलमानों से अलग रखने और उन्हें अपने वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं। समाज में हिन्दू-मुस्लिम परस्पर रचें-बसें,घुले-मिलें,ऐसे अवसरों व हालातों पर चोट करने से वे कभी बाज नहीं आए। देश-विभाजन के समय मुसलमानों ने भारत में अपने आप को पाकिस्तान से कहीं ज्यादा सुरक्षित महसूस किया था। यह सुरक्षा का भाव उन्हें,पुलिस,फौज अथवा राजनीतिक दलों के कारण नहीं मिला था,अपितु उन्हें हिन्दूओं पर पूरा भरोसा था कि वे उनके हितों की रक्षा करेंगे। इसी स्थिति को पलटकर हम वादी के वुस्सन गांव के परिप्रेक्ष्य में देख सकते हैं। वहां भी पंड़ितों के जो चार परिवार आतंकियों के भय के बावजूद निर्भय होकर अपनी मातृभूमि पर डटे रहे तो वे पुलिस,सेना,फारूक अब्दुल्ला अथवा मुती मोहम्मद सईद के बूते नहीं डटे रहे,बल्कि स्थानीय मुसलमानों के विश्वास पर डटे रहे। उन्हें पूरा भरोसा रहा होगा कि संकट आने पर वे उनकी जान-माल की सुरक्षा के लिए अपनी जान खतरे में डाल देंगे।

 

               इस जीत से निर्मित हुए हालात से अब उमर अब्दुल्ला सरकार को सबक लेने की जरूरत है। हालांकि उन्होंने माना है कि जीत घाटी और कश्मीरियत के लिए एक नई उम्मीद का पैगाम है। इस समय घाटी में पंड़ितों के अनुकूल हालात इसलिए भी हैं,क्योंकि कुछ ही समय पहले हुर्रियत कांफ्रेस के कट्टपंथी गुट के अधयक्ष सैय्यद अली शाह गिलानी ने भी विस्थपित पंड़ितों को कश्मीर लौटकर अपने पुराने घरों में बसने का आमंत्रण दिया था। गिलानी ने तो यहां तक कहा था कि वादी में पंड़ितों को अलग आवासीय बस्ती बनाकर देने का केंद्र सरकार जो प्रयास कर रही है उससे तो यह संदेश जाएगा कि सरकार दोनों समुदायों को गुटों में बांटकर राजनीतिक खेल,खेलना चाहती है।

 

                दरअसल घाटी में 1990 में शुरू हुए पाक प्रायोजित आतंकवाद के चलते कश्मीर के मूल सांस्कृतिक चरित्र के प्रतीक पंड़ितों को बेदखल करने की सुनियोजित साजिश रची गई थी। इस्लामी कट्टरपंथियों का मूल मकसद घाटी को हिन्दूओं से खाली करने का था। जिसमें वे कमोबेश कामयाब भी हुए। नतीजतन देखते-देखते वादी पंड़ित समेत अन्य हिन्दू जातियों से रिक्त हो गई और हिंदू अपने ही पुस्तैनी राज्य में शरणार्थी बना दिए गए। पूरे जम्मू कश्मीर में करीब 45 लाख पंड़ित हैं, जिनमें से सात लाख से भी ज्यादा विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। इन्हें अलग राज्य 'पनुन कश्मीर' बनाकर देने की कार्रवाही भी चल रही है। लेकिन इस तरह की बेतुकी पहल से एक संप्रभुता वाले राष्ट्र-राज्य की संकल्पना वाले नागरिक समाज व देश में पंड़ितों की समस्या का हल निकलने वाला नहीं है और न ही ऐसे उपायों से कश्मीर का धार्मनिरपेक्ष चरित्र बहाल होने वाला है, जो भारतीय संवैधानिक व्यवस्था का मूल मंत्र है। इस जीत के कालांतर में जो भी अर्थ निकलें, फिलहाल इतना फायदा तो जरूर हुआ है कि घाटी में बचे-खुचे कश्मीरी पंड़ितों व अन्य हिंदूओं में जहां सुरक्षा और विश्वास बढ़ेगा,वहीं कश्मीर से पलायन करने वालों की वापिसी का हौसला और इच्छाबल भी मजबूत होगा।
 

 
? प्रमोद भार्गव