संस्करण: 16 मई-2011

शिक्षा रोजगार की फॅक्टरी है ?

? अंजलि सिन्हा

              औद्योगिक विकास की तेज गति को देखते हुए व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र मे व्यापक परिवर्तन की तैयारी चल रही है। औद्योगिक जगत के कुशल कारीगरों की मांग को पूरी करने के लिये व्यावसायिक शिक्षा में दाखिला 10वी के बजाय 8वी में दिया जायेगा ताकि दो वर्ष के अन्दर छात्रों को व्यावसायिक ज्ञान से लैस कर दिया जाये। मानव संसाधान विकास मन्त्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि सभी राज्यों के शिक्षणमन्त्रियों से राय ली जा चुकी है ताकि नये पाठयक्रम तैयार करने तथा दाखिला प्रक्रिया की तैयारी की जा सके। कहा जा रहा है कि इसी महिने यह शुरु हो जाने की सम्भावना है। दो साल या तीन साल के कोर्स के बाद युवा उद्योग जगत् की नौकरी पा सकेंगे। एसोचेम जो भारतीय उद्योगपतियों की एक संस्था है उसके द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में केन्द्रीय मन्त्री बोल रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की सम्भावनाएं बहुत हैं। अभी मात्र 16 प्रतिशत छात्रों को दाखिला मिल पाता है उसे 30 प्रतिशत करने की जरूरत है। इसके लिये 1,000 विश्वविद्यालय तथा 40 हजार कालेजों की जरूरत होगी। अभी मात्र 504 विश्वविद्यालय तथा 26 हजार कालेज हैं। यानि सरकार अपनी जिम्मेदारी का वहन नहीं कर निजी क्षेत्र को प्रेरित कर रही है कि वह युवाओं का भविष्य सम्भाले और शिक्षा सम्भाले और शिक्षा से मुनाफा कमाये। पहले से ही मौजूद निजी संस्थानों की लूटखसोट की कहानियाँ आयें दिन आती रहती है ऐसे में उन्हें यह जिम्मेदारी देना आखिर किसके हित की बात होगी?

              वैसे तो हर आम घरवालों की यही ख्वाहिश रहती है कि उसकी सन्तानें पढ-लिख कर जल्दी कोई नौकरी हासिल कर ले। नौकरी गृहस्थी चलाने के लिए जरूरी है। हर काम चाहने वाले के हाथ में काम हो यह बुंनियादी जरूरत है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि पढ़ाई सिर्फ अच्छी नौकरी पा लेने के लिये होती है। 10 वी तक तो बच्चे परिपक्व होने की अवस्था में होते है। यदि वे 8 वी के बाद ही स्पेशलाइज शिक्षा में चले गए तो उनके लिए सामान्य ज्ञान का दायरा और सिमट जायेगा। शिक्षा रोजगारपरक हो और वह लोगों की जरूरत है लेकिन इसमें कही यह जरूरत दब गयी है कि शिक्षा ज्ञान को और उँचाइयों तक ले जाने के लिए भी है। आखिर क्यों अच्छा शोध करने वालों को विदेशी शिक्षण संस्थानों का सहारा लेना पड़ता है,जिसके लिए देरतक पढ़ना सम्भव हे उसे ज्ञान के लिए पढना चाहिए।

               एक तरफ तो सरकार ने शिक्षा के अधिकार को कानून बना दिया और वह अच्छी प्रगति है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता भी सुनिश्चित करना जरूरी है। वैसे सरकार की तरफ से कहा गया है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना का फोकस अगर अधिक से अधिक लोगों को शिक्षा उपलब्ध कराना था तो 12वीं योजना के केन्द्र में क्वालिटी शिक्षा उपलब्ध कराना है। 2017 तक देश की आबादी को 100 फीसदी साक्षर करने का लक्ष्य भी रखा गया है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में पिछले दिनों हुई योजना आयोग की पूर्ण बैठक में पूरे देश में सेकेंड्री एजुकेशन को एक समान करने की बात भी कही गयी, यहां पर भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल को अपनाने पर ही जोर रहेगा।

               अभी बुनियादी शिक्षा पर और निवेश की जरूरत है। शिक्षा के ढांचागत विकास में अभी काफी पीछे है हमारा देश जहाँ न तो पर्याप्त स्कूल है न शिक्षक ,न ही उपलब्ध स्कूलों में पर्याप्त सुविधायें। 32 फीसद स्कूलों मे शौचालय तक नहीं है। न ही पेयजल की व्यवस्था। कक्षाओं के लिए भवन तक नहीं है। ऐसे में बच्चों को अच्छी शिक्षा कैसे मिलेगी ?शिक्षा मन्त्रालय अब दूरस्थ शिक्षा द्वारा साक्षरता के लक्ष्य को हासिल करना चाहता है। यदि साक्षर हो भी गए लोग तो वह साक्षरता किस काम की रहेगी आज के आधुनिक युग में।

               एक तरफ शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के संकल्प दोहराये जाते हैं और हम पा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी के कारण तीन तीन घण्टे का शिफ्ट कर दिया गया है। शासन ने 1अप्रैल 2011 से सूबे के प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाई की नई व्यवस्था लागू की है। पहले अगर प्राथमिक स्कूलों में प्रतिदिन पांच घण्टे की पढ़ाई का प्रावधान था। अब यह शिफ्टों में कर दिया गया है। इन तीन घण्टों में बच्चे मिड डे मील भी खायेंगे और खेलेंगे भी और पढेंगें भी। शिक्षक जो दो पालियों में रहेंगे वे कितनी मेहनत कर पायेंगे बच्चों के लिये यह भी अन्दाजा लगाया जा सकता है। सरकार की तरफ से फिलवक्त यही कहा जा रहा है कि शिक्षकों की कमी के कारण इस कदम को उठाया जा रहा है और यह कमी दूर होने पर पुरानी व्यवस्था कायम कर दी जाएगी। नवउदारवादी के मौजूदा समय में जबकि सरकार शिक्षा,स्वास्थ्य एवम सार्वजनिक कल्याण जैसे मदों पर खर्चों मे कटौती कर रही है, इस दौर में पुरानी व्यवस्था कायम होने में कितना वक्त लगेगा,या इसी अस्थायी व्यवस्था को स्थायी बना दिया जाएगा,इसके बारे में दावे के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता। और अगर प्राथमिक स्कूलों में अधययनरत बच्चों की बुनियाद कमजोर रह गयी तो हम अन्दाज़ा ही लगा सकते हैं कि बाद में वह शिक्षा की कितनी गुणवत्ता हासिल कर सकेंगे।

              शिक्षा की गुणवत्ता का आलम बिहार के प्रायमरी टीचर्स की योग्यता के लिए आयोजित टेस्ट परीक्षा से भी पता चलता है। मालूम हुआ कि इस परीक्षा में बड़ी संख्या में वे फेल हो गये और कुछ नकल करते पकड़े गए। दरअसल विगत कुछ सालों में बिहार सरकार ने ठेका प्रणाली के आधार पर 2लाख से अधिक शिक्षकों को भरती किया,जिन्हें प्रायमरी,सेकेन्डरी और हायर सेकेण्डरी कक्षाओं को पढ़ाने के लिए पंचायती राज प्रणाली के तहत नियुक्त किया गया। जब इन शिक्षकों की गुणवत्ता पर प्रश्नचिन्ह खड़े हुए तब सरकार ने इनके लिए योग्यता टेस्ट निर्धारित की जो हर ऐसे अध्यापक को देनी पड़ेगी। पता चला कि दो लाख में से 8,844अध्यापक इस परीक्षा में फेल हुए। जब दुबारा इन अध्यापकों की परीक्षा ली गयी तब 174अध्यापक फिर फेल पाए गए। सरकार यह वादा कर रही है कि 12वी पंचवर्षीय योजना में वह शिक्षा की गुणवत्ता पर जोर देगी लेकिन इसके लिए अभी से वह क्या कदम उठाती है ,नीतियां तैयार कर रही है यह ध्यान देने लायक है।


? अंजलि सिन्हा