संस्करण: 16 मई-2011

ओसामा बिन लादेन की मौत
आइये सन्देह करें
 

? वीरेन्द्र जैन

               अमेरिका ने अपने सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक और सैनिक ठिकानों पर दिन के उजाले में किये गये चुनौतीपूर्ण हमलों के नौ-दस साल बाद इन हमलों के मुख्य योजनाकार ओसामा बिन लादेन को देर रात में पकिस्तान की राजधानी से लगभग साठ किलोमीटर की दूरी पर मार देने और उसकी लाश को किसी समुद्र के किसी अघोषित स्थान पर दफनाने का समाचार दिया है। इस समाचार पर दुनिया ने वैसे ही ऑंख मूंद कर भरोसा कर लिया जैसा कि उसने अमरीका के कहने पर ईराक में रासायनिक हथियार होने पर कर लिया था। वे हथियार तो कभी नहीं मिले किंतु अपने समय के सबसे मुखर अमरीका विरोधी सद्दाम हुसैन को फाँसी पर लटका दिया गया,पूरे ईराक को बरबाद कर दिया गया और उसके सबसे महत्वपूर्ण संस्थानों पर अमरीकी फौज ने अधिकार कर लिया।

 

                स्मरणीय है कि अमरीका की तुलना में एक बहुत छोटे देश ईराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन से जो भी मिलने जाता था उसे फर्श पर बिछे उस कालीन पर पैर रखकर गुजरना होता था जिस पर अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश का चित्र बना हुआ था। ऐसे व्यक्ति को स्वयंभू दुनिया का दादा अमरीका कैसे स्वीकार करता इसलिए तेल के कुँओं की ताकत से सम्पन्न ईराक पर रासायनिक हथियारों के नाम पर अधिकार कर लिया,और पूरी दुनिया चुपचाप देखती रही। ओसामा बिन लादेन की जिन बुराइयों के लिए उसे मार देने का दावा किया गया है वे उसमें तब भी थीं जब उसे अमरीका ने अफगानिस्तान में सोवियत सैनिकों के खिलाफ विद्रोही कार्यवाहियां करने के लिए भरपूर हथियारों और संसाधानों के साथ भेजा था। पर तब वह अमेरिका का काम कर रहा था इसलिए उसका दोस्त था पर जब उसने अमेरिका की ही खिलाफत शुरू कर दी तब से वह आतंकवादी प्रचारित कर दिया गया था। तब अमरीका की हर बात को स्वामिभक्तों की तरह मान लने वाली हमारे देश की सरकारों ने भी उसे तब से ही आतंकवादी माना,और अपने यहाँ घटी आतंकी घटनाओं को भी उसके साथ जोड़ लिया। वैसे हमारी जाँच एजेंसियों ने तो हर आतंकवादी घटना के बाद उन्हें ही जिम्मेवार मान लिया जिसे संघ परिवारियों और उनके पालतू मीडिया ने बिना किसी पड़ताल के बता दिया। यह तो बाद में साधवी भेष में रहने वाली प्रज्ञा के पकड़ में आने के बाद मामला पलटा,कि और कौन कौन क्या क्या कर रहा था और किसके भेष में कर रहा था। हमने नासमझी में कश्मीर के अलगाववादियों को भी उसी श्रेणी में रखना शुरू कर दिया जबकि उनकी हिंसा का तेवर बिल्कुल अलग था। हम 1993 में हुए बम विस्फोटों को ज्यादा याद नहीं करते क्योंकि वे 1992में बाबरी मस्जिद को ध्वंस करने के बाद हुए दंगों और उसमें पुलिस द्वारा की गयी पक्षपाती कार्यवाही के विरोध में हुये थे जिनके लिए जिम्मेवार 50 से अधिक लोगों को फाँसी की सजा हो चुकी है किंतु जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट अभी भी धूल खा रही है।


               आज कट्टरताबाद से जन्मे इस आतंकवादी के मर जाने की खबर पर जितनी खुशी अमेरिका की सरकार प्रकट कर रही है उतनी ही खुशी हमारे देश की सरकार और उससे ज्यादा मुख्य विपक्षी दल भी कर रहा है,जबकि हमारे पास ऐसा करने का कोई ठोस कारण नहीं है। भाजपा तो खुले आम पाकिस्तान पर दाउद,और मुम्बई के ताज होटल को निशाना बनाने आये हमलावरों के सरगना के नाम पर ऐसा ही हमला करने का आवाहन कर रही है। जबकि न तो हम अभी तक दाउद का ठिकाना तलाश पाये हैं और ना ही मुम्बई कांड के हमलावरों के सरगना का।

 

                सच तो यह है कि जितना भरोसा उसके मरने की खबर पर किया जा सकता है उतना ही अविश्वास भी किया जा सकता है।

 

              पिछले दिनों पाकिस्तान में कट्टरवादियों द्वारा निरंतर जो आतंकी हरकतें की गयी हैं,वे हमारे देश में घटित आतंकी घटनाओं से कई गुना अधिक हैं और उनमें जन धन व नेतृत्व की हानि भी अधिक हुयी है। ऐसे में यह मान लेना कि पाकिस्तान जानबूझ कर इस आतंकी को छुपा कर रखे था और अपने यहाँ आतंकी घटनाएं होने दे रहा था, तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

 

               पाकिस्तान पूरी तौर पर अमरीका के टुकड़ों पर पल रहा है,और उसकी कोई भी सरकार अमरीकी सरकार की इच्छा के खिलाफ किसी लादेन को संरक्षण नहीं देना चाहेगी,भले ही उसे सुरक्षित बाहर जाने का रास्ता दे दे। इस दौरान पाकिस्तान में हलचलों भरा सत्ता पलट होता रहा है,और सारी सत्ताओं का रवैया एक सा नहीं हो सकता। 18 जनवरी 2002को पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपना अनुमान प्रकट करते हुए कहा था मैं अब समझता हूं कि वह मर चुका है क्योंकि किडनी का मरीज था। 11जनवरी2008 को पाक सेना के प्रमुख अशफाक परवेज कयानी ने कहा कि लादेन का पता नहीं लगा पाने पर आलोचना ठीक नहीं है,उसकी तलाश की कार्यवाही के ट्रेक रिकार्ड देखें। 28 अप्रैल 2009 को पाक राष्ट्रपति जरदारी ने बयान दिया कि हमारी खुफिया एजेंसी के अनुसार लादेन का वजूद नहीं है वो मर चुका है। 3 दिसम्बर 2009 को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने बताया कि हमारे देश में लादेन मौजूद नहीं है। 11मई2010 को पाक राष्ट्रपति के प्रवक्ता फरहतुल्ला बाबर ने कहा कि हमें भी नहीं मालूम कि लादेन जिन्दा है या मर चुका है।


               तय है कि इस बीच में भले ही उसकी देह जिन्दा रही हो किंतु उसका आतंक तो मर ही चुका था क्योंकि जब देश या लोग आतंकित होना बन्द कर दें तो आतंक का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता।
 

               जब अमेरिका ने सद्दाम को फाँसी पर चढाया था तब न केवल उसके फोटो ही जारी करवाये थे अपितु उसका वीडियो भी लोगों के सामने आया था,पर क्या कारण है कि इस इतने बड़े बताये जा रहे आतंकी की मृत्यु का कोई भी असली फोटो अखबारों में छपा फोटो बाद में नकली बताया गया,नहीं छपवाया गया और उसकी लाश को किसी अज्ञात समुद्र के अज्ञात स्थान पर दफनाये जाने की सूचना दी गयी। यह सामान्य मनोविज्ञान है कि जब भी किसी डाकू को मारा जाता है तो चारपाई से बाँध कर उसकी लाश को पुलिस दिखाती है ताकि आतंकित जनता भय मुक्त हो सके। इसी तरह नामी गुंडे को सड़कों पर जूते मारते हुए घुमाया जाता रहा है।
 

                एक ने सवाल किया कि तुम्हारे सिर पर कितने बाल हैं,तो दूसरे ने तुरंत उत्तर दिया कि एक लाख आठ हजार सात सौ सोलह। पहले ने कहा कि ऐसा कैसे हो सकता है तो दूसरे ने कहा कि तुम गलत सिध्द करके बताओ। अब जब तक कोई ओसामा के जिन्दा रहने,या दूसरे समय पर दूसरी तरह से हुयी मौत का सबूत नहीं दे सकता तब तक यही मानना पड़ेगा कि वह इसी कार्यवाही में मारा गया।
 

               अमरीका ने अपनी फौजें 2011 में हटाने की घोषणा कर रखी थी और उसके सैनिकों के परिवार बेसब्री से उनकी वापिसी की प्रतीक्षा में हैं। अफगानिस्तान में अपनी फौजें भेजने से पहले अमरीका ने भारत से अपनी फौजें भेजने का प्रस्ताव किया था जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री बाजपेयी ने विपक्ष से बात करने के बाद अस्वीकार कर दिया था। बाद में निर्माण कार्यों के बहुत सारे ठेके हमारे देश को मिले जिनके पूरा होने में अभी लम्बा समय लगेगा। तय है कि अमरीकी फौजें हटने के बाद अलकायदा के लोग उग्र होकर हमारे द्वारा संचालित होने वाले कार्यों पर हमला करें जैसा कि वे बीच बीच में करते रहे हैं,तब मजबूरन हमें अपनी फौजें वहाँ भेजना होंगीं। शायद यही अमेरिका भी चाह्ता रहा है और हमें दिये आश्वासन के बाद वह कह सकता है कि हम लादेन के सफाये के बाद ही वहाँ से हटे हैं।
 

               क्या विक्कीलीक्स के खुलासों के बाद हमारी ऑंखें नहीं खुली हैं जो बताते हैं कि राजनीतिक सच वही नहीं होते जो बताये जाते हैं अपितु बिटवीन दि लाइंस होते हैं। आखिर सबूतों को दबाने वाली इस सूचना पर हम सन्देह क्यों न करें !
 

               क्या उद्देश्य की दृष्टि से यह विचारणीय नहीं है कि मुम्बई के ताज और ओबेराय होटल पर हमला किस के खिलाफ था? भारत के या अमरीका के?
 

                इसलिए क्या यह जरूरी नहीं है कि हम अपने हाजमे के अनुसार ही साम्राज्यवादी पूंजीवादी देशों की सूचनाओं को हजम करें और जो हजम नहीं हो रही हों उन पर सन्देह करते हुए सत्य की तलाश को उन्मुख रहें। विमर्श करें। वादे वादे जायते तत्वबोध:।
 


? वीरेन्द्र जैन