संस्करण: 16 मई-2011

क्या गुजरात में समन्वय,
शांति और मेलजोल है?

? एल.एस.हरदेनिया

               पिछली 1 मई को गुजरात ने अपनी स्थापना की 50वीं वर्षगांठ मनाई। इस अवसर पर गुजरात में बड़े पैमाने पर उत्सव मनाया गया। 1 मई को गुजरात के साथ साथ-साथ महाराष्ट्र के गठन को भी 50 वर्ष पूरे हो गये।

 

              तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राज्यों के पुर्नगठन का आधार क्या हो,इस संबंध में सुझाव देने के लिए राज्य पुनर्गठन आयोग की नियुक्ति की थी। आयोग ने भाषा को राज्यों के पुनर्गठन के आधार के रूप में स्वीकार किया था। आयोग की रपट के आधार पर 1 नवंबर 1956 को अनेक नये राज्य देश के नक्शे पर उभर कर आये। इन राज्यों में केरल (मलयालम),तमिलनाडू (तमिल),कर्नाटक (कन्नड़),आंध्रप्रदेश (तेलुगु),पश्चिम बंगाल (बंगला),असम (असमिया),उड़ीसा (उड़िया) आदि शामिल थे। बिहार,उत्तरप्रदेश,मध्यप्रदेश,राजस्थान आदि हिन्दी भाषी राज्य बने। सभी को उम्मीद थी भाषा के आधार पर महाराष्ट्र और गुजरात भी पृथक राज्य बनाए जाएंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। पूर्व की तरह,महाराष्ट्र और गुजरात को मिलाकर एक राज्य बना रहा। पहले की तरह बम्बई उसकी राजधानी बनी रही। पृथक राज्य न मिलने से महाराष्ट्र और गुजरात में जबरदस्त आक्रोश फैला। दोनों राज्यों में पृथक राज्य के गठन की मांग लेकर आंदोलन हुए। अनेक स्थानों पर हिंसक घटनायें हुइ। कुछ स्थानों पर पुलिस को गोली चलाना पड़ी जिसमें काफी लोग मारे गये। इससे दोनों राज्यों में कांग्रेस-विरोधी वातावरण बना। चार वर्ष तक किसी न किसी रूप में ये आंदोलन चलते रहे। अंतत:1960में पृथक महाराष्ट्र और गुजरात के गठन की घोषणा हुई। बम्बई को महाराष्ट्र की राजधानी बनाया गया और अहमदाबाद, गुजरात की राजधानी बना। बाद में गुजरात की नई राजधानी बनी जो अब गाँधीनगर के नाम से जानी जाती है।

 

              गठन के समय से ही गुजरात में राजनीतिक अस्थिरता रही है। वहां के मुख्यमंत्री जल्दी-जल्दी बदलते रहे हैं। इससे जितनी कड़ाई और कुशलता से गुजरात का शासन संचालित होना था वैसा नहीं हो सका। ढीले-ढाले प्रशासन के अनेक नुकसान होते हैं। ऐसे प्रशासन में शरारती तत्वों के हौसले बुलंदी पर रहते हैं। इसी के चलते गुजरात में सन् 1969 में वीभत्स साम्प्रदायिक दंगे हुए। ये दंगे इतने गंभीर थे और इनमें इतना खून-खराबा हुआ कि सीमांत गांधी खान अब्दुल गफार खान पाकिस्तान से चलकर गुजरात की स्थिति का जायजा लेने आए। सीमांत गांधी इस बात से चिंतित थे कि जिस प्रदेश में महात्मा गांधी पैदा हुए और जिस प्रदेश में महात्मा ने साबरमती नदी के किनारे अपना आश्रम स्थापित किया था,उस प्रदेश में इतने खतरनाक साम्प्रदायिक दंगे हुए। लगता है कि कहीं न कहीं हिन्दू-मुसलमानों के बीच राजनैतिक व सामाजिक स्तर पर मनमुटाव था जो धीमे जहर की तरह गुजराती हिन्दुओं और मुसलमानों पर असर करता गया। गुजरात के सेक्युलर तत्व इस गिरावट के मूकदर्शक बने रहे। जहां सेक्युलर तत्वों ने इस मामले में तटस्थता का रवैया अपनाया वहीं साम्प्रदायिक तत्वों ने इसका पूरा लाभ उठाया। इस बीच जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन प्रारंभ हो गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़ी अन्य संस्थाओं ने इस आंदोलन पर लगभग कब्जा कर लिया। गुजरात में स्थानीय स्तर पर नवनिर्माण आंदोलन प्रारंभ हुआ। दुर्भाग्य से इस आंदोलन के दौरान गुजरात में अनेक साम्प्रदायिक घटनाएं हुईं। धीरे-धीरे गुजरात में इस हद तक साम्प्रदायिक धुर्वीकरण हो गया कि वहां चुनाव जीतकर,भाजपा सत्ता में आ गई। भाजपा ने इस धुर्वीकरण को और गंभीर मोड़ दिया और हिन्दुओं के मन में यह धारणा ठूंस-ठूंस कर भर दी कि मुसलमान,हिन्दुओं के सबसे बड़े दुश्मन हैं। समय के साथ यह धारणा इतनी गहरी हो गई कि ऐसा महसूस होने लगा कि गुजरात में भाजपा को सत्ता से हटाना बहुत कठिन है। भाजपा के केशूभाई पटेल मुख्यमंत्री बने परंतु उनके शासनकाल में भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ गिरना प्रारंभ हो गया और ऐसा लगने लगा कि भाजपा के हाथों से सत्ता खिसक सकती है। केशूभाई को एक ढीला-ढाला मुख्यमंत्री समझा जाने लगा। भाजपा की स्थिति में सुधार लाने के इरादे से नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया गया। नरेन्द्र मोदी ने पद संभालते ही ऐसा करिश्मा किया कि उसके बाद से गुजरात की सत्ता पर लगतार भाजपा का कब्जा बना हुआ है।

 

               इस दरम्यान ऐसी घटनाएं हुईं जिनसे हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की दूरियां बढती ही गईं और उनके आपसी रिश्ते घोर दुश्मनी के हो गए। इस बढ़ते धुर्वीकरण के बीच गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एक स्लीपर कोच को आग लगा दी गई जिसमें 56हिन्दू जलकर मर गए। तथ्य कुछ भी हों परंतु मेरी मान्यता है कि गोधरा या तो शासन की मिलीभगत से हुआ या शासन की लापरवाही का परिणाम था। कहा जाता है कि मुसलमानों ने बोगी पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगाई। जब वे इतना वीभत्स काम कर रहे थे उस समय पुलिस कहां थी?पुलिस को चाहिए था कि इन उपद्रवी तत्वों को सख्त कार्यवाही करके तितर-बितर कर देती। क्यों पुलिस ने उनपर लाठियां नहीं बरसाईं?अश्रुगैस नहीं छोड़ी?और गोलियां नहीं चलाईं?क्या उस दिन भी पुलिस को आदेश था कि वह सिर्फ तमाशबीन बनी रहे?जैसे इस अग्निकांड के बाद हुए दंगों के दौरान पुलिस को निर्देश था कि हिन्दुओं को अपना आक्रोश दिखाने दो,वैसे ही क्या उस दिन मुसलमानों को अपना गुस्सा निकालने देने का निर्देश था?उसके बाद 56 लाशों का पूरा उपयोग किया गया,उन्हें पूरे राज्य में प्रदर्शित किया गया। नतीजा वही हुआ जिसकी संघ परिवार ने उम्मीद की होगी-गुजरात में हिन्दुओं का आक्रोश सारी सीमाएं पार कर गया और अगले तीन दिनों तक गुजरात में हत्या,आगजनी और तोड़फोड़ का अनवरत सिलसिला चलता रहा। हजारों की संख्या मुसलमान मारे गए और गुजरात का समाज धर्म के आधार पर दो भागों में बंट गया। लगभग वैसे ही जैसे सन् 1947 में देश के विभाजन के समय बंटा था। दंगों के बाद गुजरात में मुसलमानों के साथ दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा व्यवहार किया जाने लगा,जो आज भी जारी है। गुजरात के हिन्दुओं के एक बड़े हिस्से की तो यह इच्छा है कि मुसलमानों को पूरी तरह से गुजरात से खदेड़ दिया जाए। ऐसे वातावरण में मोदी को चुनाव में शिकस्त देना एक कठिन कार्य है।

 

                इसी पृष्ठभूमि में गुजरात के निर्माण के 50 वर्ष पूरे हुए और गुजरात की स्वर्ण जंयती उत्सव मनाया गया। करोड़ों रूपये खर्च कर गुजरात की प्रगति का गुणगान करने वाले बड़े-बड़े विज्ञापन देश के लगभग सभी प्रमुख समाचारपत्रों में प्रकाशित हुए।

 

              इन विज्ञापनों में गुजरात को विकास और प्रगति के आदर्श के रूप में पेश किया गया। एक को छोड़कर सभी विज्ञापनों में अकेले नरेन्द्र मोदी दिखाई देते हैं। एकाधा विज्ञापन में वहां की राज्यपाल को भी दिखाया गया है। विज्ञापनों का शीर्षक है ''स्वर्णिम गुजरात''। विज्ञापनों में कहा गया है कि ''हम उत्सव मना रहे हैं,भव्य भूतकाल का,वैभवपूर्ण वर्तमान का और भविष्य के उजाले का। हम उत्सव मना रहे हैं गौरवशाली परंपराओं का,सामंजस्य का,मेलजोल का,प्रगति का,शांति का।''

 

               परंतु क्या यह आज के गुजरात की वास्तविकता है?क्या वहां समन्वय है,क्या वहां मेलजोल है,क्या वहां वास्तविक शांति है?कम से कम मुसलमानों के लिए तो यह श्मशान की शांति है। जहां तक सामंजस्य और मेलजोल का सवाल है,अल्पसंख्यकों को तो यह सपने में भी उपलब्ध नहीं हैं। इस तरह विज्ञापनों में किए गए सारे दावे खोखले हैं। मोदी के गुजरात में मुसलमानों की स्थिति लगभग वैसी है जैसी हिटलर के जर्मनी में यहूदियों की थी। ''


? एल.एस.हरदेनिया