संस्करण: 16 मई-2011

सुप्रीम कोर्ट के इंसाफ के बाद
मुल्क मजबूत होगा


 

? शेष नारायण सिंह

               बाबरी मस्जिद की जमीन के मालिकाना हक के बारे में 30 सितम्बर 2010 के इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले के बाद संघी बिरादरी के लोग बहुत खुश हुए थे। उन्हें उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली थी। वे बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के आपराधिक मुकदमे को भी उसी फैसले में लपेट कर पेश करने की कोशिश कर रहे थे। जब गृहमंत्री ने कहा कि आपराधिक मुकदमा और अयोध्या की जमीन के मालिकाना हक का मुकदमा अलग अलग विषय हैं तो आर एस एस वाले लाल पीले होने लगे और उसकी राजनीतिक शाखा के लोग गुस्से में आ गए और उल जलूल बयान देने लगे। आर एस एस के संगठनों के लोग हर उस लेखक के लिए गालियाँ बकने लगे जो फैसले पर किसी तरह का सवाल उठा रहा था। आर एस एस वालों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के उन तीनों जजों को भारत रत्न देने की बात करना शुरू कर दिया । लेकिन सच्चाई यह है कि उन तीनों जजों के एक फैसले ने भारत के आम मुसलमान को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया । इस फैसले के बाद इंसाफ पसंद लोगों में चारों तरफ निराशा का माहौल था और लगता था कि आम आदमी को कहीं से भी न्याय की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। सबसे अजीब बात यह थी कि उस फैसले को कानून की कसौटी पर कसने की कोई कोशिश ही नहीं की जा रही थी । शान्ति की बात को फोकस में रख कर सारी चर्चा की जा रही थी। इस बात पर कहीं चर्चा नहीं की जा रही थी कि आस्था को नापने का कोई वैज्ञानिक तरीका है क्या?या ज्यूरिसप्रूडेंस की बारीकियां अगर आस्था के आधार पर तय की जायेगीं तो हमारे संविधान का क्या होगा?यह सवाल भी उठाये जाने चाहिए थे कि उस फैसले के बाद संविधान के धर्म निरपेक्ष चरित्र का क्या होता । यह फैसला कोई मामूली फैसला नहीं था । यह एक हाई कोर्ट का फैसला था जिसको बाकी अदालतों में नजीर के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता था । खतरा यह था कि उसके बाद निचली अदालतों से इस तरह के फैसले थोक में आने लगते ।

               संतोष की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के उस फैसले को खारिज कर दिया है और उसे अजीब कहा है । सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उल जलूल फैसले पर कड़ा एतराज जताया और ताज्जुब व्यक्त किया । सुप्रीम कोर्ट ने भारत के संविधान की लाज रख ली वरना हाई कोर्ट का फैसला तो पूरी तरह से मधयकालीन न्यायपध्दति का उदाहरण था। उसमें कानून कहीं नहीं था, बस आस्था के मुद्दे को केन्द्र में रख कर एक पंचायती फैसला कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट का 9मई 2011का फैसला देश में न्याय बहाल करने की दिशा में बहुत दूर तलक जाएगा । इस फैसले में यह सन्देश है कि इंसाफ हमेशा कानून की सही व्याख्या कर के ही किया जा सकता है ,आस्था को केंद्र में रख कर नहीं । बाबरी मस्जिद के मामले से अब लोग ऊब चुके हैं लेकिन यह ठीक बात नहीं है । अगर ऐसा हुआ तो देश को तोड़ने की कोशिश कर रही ताकतें कुछ भी कहर बरपा कर सकती हैं । अब उम्मीद की जानी चाहिये कि बाबरी मस्जिद की जमीन के बारे में सुप्रीम कोर्ट सारे तथ्यों पर गौर करके एक सही फैसला करेगी । सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आर एस एस और उसके मातहत संगठनों में हडकंप है । बीजेपी के प्रवक्ता गण कहने लगे हैं कि मुसलमानों को दरियादिली दिखानी चाहिए और उन्हें सारी जमीन राम मंदिर के लिए दे देनी चाहिए । अगर यह मान भी लिया जाए कि मुसलमानों में आम राय बनती है कि सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा जीतने के बाद जमीन राममंदिर के लिए दे दी जाए तो वे आर एस एस वालों को तो कभी नहीं देगें । जिस आर एस एस ने बाबरी मस्जिद का विरोध करते हुए पूरे देश के मुसलमानों और 98प्रतिशत हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पंहुचाया है। लेकिन अभी इन बातों का वकघ्त बिलकुल नहीं है । अभी तो देश की एकता के रास्ते में आर एस एस और 30 सितम्बर के फैसलें ने जो रुकावटें पैदा की थीं उसे दुरुस्त करने का वक्त है । खुशी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को फटकार करके पहला कदम उठा लिया है ।

? शेष नारायण सिंह