संस्करण: 16 मई-2011

बुध्द जयंती पर विशेष
विपश्यना साधना का वैज्ञानिक पक्ष समझना सबके लिये लाभदायक होगा

? यू.एस.वावरे

                          आज से लगभग दो हजार पांच सौ वर्ष पूर्व, सिध्दार्थ गौतम का जन्म कपिलवस्तु के राजघराने में हुआ। राजपुत्र सिध्दार्थ गौतम ने उनत्तीस वर्ष की उम्र में घर छोड़ा और सन्यासी हुये। छह साल तक तपश्चर्या करके पैतीस वर्ष की उम्र में बुध्दत्व प्राप्त किया। उन्होंने अपने प्रयत्नों से चित्तशुध्दी का मार्ग (विपश्यना साधाना)खोज निकाला। विपश्यना साधाना में उन्होंने स्वयं मुक्त अवस्था प्राप्त कर ली और पैतालीस वर्षों तक रात दिन यह विद्या लोगों को करुण हृदय से सिखाते रहे जिससे अनेकों का मंगल हुआ।

 

              उन्होंने बार-बार लोगों को कहा ''बुध्द के प्रति यंत्रवत आदर व्यक्त करने से किसी भी व्यक्ति को कुछ भी लाभ नहीं होता। केवल विपश्यना साधाना का अभ्यास करने से ही चित्त शुध्द होता है और यही सबके लिये कल्याणकारी है। इसलिये हम इस बुध्द जयंती के अवसर पर विपश्यना साधाना का वैज्ञानिक पक्ष समझेंगे जिसके आधार पर सभी सम्प्रदायों के लोग इसे बेझिझक अपना सकेंगे।''

 

अध्यात्म का आधार-ऊर्जा

              

               बुध्द के उपदेशों के अंतर्गत दिर्घ निकाय में (दसुत्तर धार्म सुत्र में) यह बताया गया है कि ''सभी प्राणी आहार पर स्थित (निर्भर) है। आज के वैज्ञानिक युग में हम यह कह सकते है कि सभी प्राणी ऊर्जा पर ही कार्य करते है। विपश्यना साधाना में चित्त के संस्कारों की निर्जरा करते समय साधाक अपने शरीर के अणु अणु में संस्कारों को ऊर्जा की तरकों के रूप में (उदय-व्यय के रूप में ) अनुभव करता है। विपश्यना साधाना का गहराई से अभ्यास करने के बाद वरिष्ठ साधाक अपने शैक्षणिक योग्यता के आधार पर अपने अनुभव का विश्लेषण करके निम्न लिखित बातों की वैज्ञानिक पध्दति से समझ सकता है। ''

 

              1. चित्त पर संस्कारों के ऊर्जा का संग्रह कैसे होता है ?

 

              2. विपश्यना साधाना से चित्त पर संग्रहित संस्कारों की निर्जरा कैसे होती है

 

               चित्त पर संस्कारों के ऊर्जा का संग्रह

 

               जब हमारा मन शांत होता है तब ये चार बातें सामान्य होती है-(1) श्वास की गति (2) हृदय के धड़कनों की गति (3) शरीर के अणु अणु के कंपनों की गति और (4) आहार के ऊर्जा की खपत की दर। जैसे हि हमारा मन अशांत होता है और क्रोधा, घृणा, द्वेष, संदेह, निराशा इत्यादि प्रतिक्रिया करता है तो ये चार बातें सामान्य के ऊपर बढ़ जाती है। ऊर्जा की वास्तविक खपत की दर सामान्य खपत की दर से अधिाक होती है। ऊर्जा की इन दोनों खपत की अंतर की दर से आहार की ऊर्जा प्रतिक्षण चित्तपर संग्रहित होती है। चित्तपर संग्रहित होने वाली इस ऊर्जा को क्रोधा,घृणा,द्वेष, संदेह,निराशा के संस्कार कहते है। ऐसे अनेक संस्कार चित्तपर संग्रहित होते है। मृत्यु के समय इन संस्कारों में से किसी एक संस्कार की ऊर्जा हमारे चित्त को मृत शरीर से अलग करके बचे हुये सभी संस्कारों के साथ नये गर्भ में पहुंचाती है। इसके बाद अगले जीवन का जनम, जरा, रोग और मृत्यु का दु:ख भोगना पड़ता है। इस तरह भवचक्र अनंत काल तक चलता है। भवचक्र के दु:ख से छुटकारा पाने हेतू भगवान बुध्द ने विपश्यना साधाना खोज निकाली जिससे चित्तपर संग्रहित सभी संस्कारों की निर्जरा की जाती है। चित्तपर संस्कार बचेंगे नहीं तो पुनर्जन्म होगा ही नहीं।

 

विपश्यना साधाना से चित्त के संस्कारों की निर्जरा

 

               पहली बार यह साधाना अनुभवी आचार्य के मार्गदर्शन में सिखना आवश्यक है। विपश्यना साधाना में शील का पालन करना, श्वास पर मन एकाग्र करके उसे शांत करना, शरीर के अणु-अणु  के कंपनों को संवेदना के रूप में जानना इत्यादि सिखाया जाता है।

 

               संवेदनाएं ऊर्जा के खपत के कारण निर्माण होती है

 

               ऊर्जा पर कार्य करने वाले यंत्र को चालू करने से उसको ऊर्जा मिलती है। समय के साथ यंत्र में ऊर्जा की खपत होती है और यंत्र में और यंत्र के अलग-अलग हिस्सों में हलन-चलन निर्माण होती है और ये हलन-चलन समय के साथ बदलते रहती है। ऐसे ही शरीर में आहार के ऊर्जा की खपत होती है। इससे शरीर के अणु अणु में कंपन, अंग-अंग में और सम्पूर्ण शरीर में हलन-चलन, इत्यादि हरकतें होती रहती है। विपश्यना साधाना में चित्त के संस्कारों की ऊर्जा शरीर के अणु अणु में अतिरिक्त कंपन दबाव, दुखाव,भारीपन, गरमी, इत्यादि बदलते रहने वाली हरकतें निर्माण करती है।

 

               यंत्र में होने वाली हरकतें हम खुली आंखों से देख सकते है। ऐसे ही शरीर में होने वाली हरकतें हम अपने नर्वज सिस्टम के सेन्सूरी न्युरान के मदद से मन द्वारा संवेदना के रूप में अनुभव कर सकते है।

 

               शरीर के अंदर निर्माण होने वाली संवेदनाएं सुखद या दुखद होती है जिस पर मन अपने पुराने स्वभाव के अनुसार राग या द्वेष की प्रतिक्रिया करता है। मन को संवेदनाओ पर प्रतिक्रिया करने से रोकने के लिये भगवान बुध्द ने संवेदना संबंधित एक और सच्चाई जानने को सिखाया है। यह सच्चाई है संवेदनाओं का समय पर निर्भर अस्तित्व याने अनित्यता। इसके अंतर्गत साधाक यह अनुभव करता है कि संवेदना समय के साथ निर्माण होती है (उदय होता है) कुछ समय तक उसका अस्तित्व रहता है और अंत में उसका अस्तित्व समापत होता है(व्यय होता है) कह कहलाता है संवेदनाओं का अनित्य स्वभाव। साधाक यह भी समझने लगता है कि जो संवेदनाएं अनित्य है वह अनंतकाल तक टिक नहीं सकती और वह ''मै'' या ''मेरी'' हो नहीं सकती। इसके आधाार पर साधाक सुखद या दुखद संवेदनाओं पर प्रतिक्रिया करना बंद करता है।

 

              विपश्यना साधाना में प्रतिक्रिया करना बंद करने से आहार के ऊर्जा की वास्तविक खपत की दर सामान्य खपत की दर से बराबर हो जाती है। इन दोनों खपत की दरों में अंतर (difference) शुन्य होने से आहार के ऊर्जा की चित्त पर संग्रहित होने की क्रिया बंद पड़ती है। यह स्थिति सामान्य न होकर मृत्यु के समय की स्थिति से मेल खाती है। इसलिये जैसे मृत्यु के समय चित्त का संस्कार चित्त से बाहर आता है वैसे साधना में भी वह बाहर आता है। इस संस्कार की ऊर्जा साधाक उदय-व्यय के तरंगों के रूप में शरीर पर अनुभव करता है। बाद में इस संस्कार की ऊर्जा, शरीर पर दबाव, दुखाव, भारीपण, गरमी, इत्यादि संवेदना में परिवर्तित होकर उसकी निर्जरा होती है।

 

               जैसे-जैसे साधाक अभ्यास करता है वैसे-वैसे अधिक से अधिक संस्कारों की निर्जरा होती है। अंत में सभी संस्कारों की निर्जरा हो जाती है और साधाक निर्वाण का साक्षात्कार करता है, जो मुक्ति का सुचक है।

 

               संवेदना के अनित्य स्वभाव को अनुभव करते हुये समता में रहना ही ''प्रज्ञा'' है। निरंतर प्रज्ञा में रहना याने ''स्थितप्रज्ञ'' होना है।

 

सारांश

 

               संक्षेप में हम यह कह सकते है कि आहार की ऊर्जा का बहुत सा हिस्सा शरीर को स्वस्थ रखने में और शरीर द्वारा भौतिक कार्य करने में खर्च होता है। साथ ही साथ आहार की ऊर्जा का कुछ हिस्सा मन के प्रतिक्रिया करने वाले स्वभाव के कारण लगातार चित्त पर संस्कारों के रूप में संग्रहित होता है। संस्कारों की यह ऊर्जा हमारा भवचक्र चलाती है और हमें जनम, जरा रोग और मृत्यु के दु:ख में फंसाकर रखती है। भगवान बुध्द द्वारा खोजी गयी विपश्यना साधाना के अनुसार ऊर्जा की खपत के कारण निर्माण होने वाली और समय के साथ बदलते रहने वाली संवेदनाओं को प्रतिक्रिया न करते हुये समता भाव से जानते रहने से नये संस्कार बनने की क्रिया बंद पड़ती है और चित्त पर संग्रहित पुराने संस्कारों की निर्जरा होती है। सभी संस्कारों की निर्जरा होने पर निर्वाण का साक्षात्कार होता है। यह मुक्ति का सुचक है।

 

               निष्कर्ष- विज्ञान और टेक्नॉलॉजी का क्षेत्र ऊर्जा का क्षेत्र है। इसी तरह शरीर और चित्त का क्षेत्र भी ऊर्जा का ही क्षेत्र है। सभी इंजिनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक और टेक्निकल क्षेत्र में काम करने वाले लोग अपनी शैक्षणिक योग्यता के कारण ऊर्जा के विषय में बहुत कुछ जानते है और समझते भी है। यहां दी गयी ऊर्जा पर आधाारित विपश्यना साधाना की जानकारी पुरी तरह वैज्ञानिक है। आशा है कि सभी पढ़े-लिखे लोग इसे समझेंगे और विपश्यना साधाना का व्यवहारिक पक्ष सिखने की प्रेरणा प्राप्त करेंगे।

 

               भगवान बुध्द के अनुसार भवचक्र के हजार जनमों से एक ही बार ऐसा अवसर आता है जब किसी को विपश्यना साधाना प्राप्त होती है और वह भवचक्र से मुक्त हो सकता है। भगवान बुध्द ने यह भी कहा है, ''व्यक्ति का अचुक मुक्ति देने वाले विद्या से वंचित रहना उसकी अधयात्मिक मृत्यु है।'' हर समझदार व्यक्ति विपश्यना साधाना का लाभ अवश्य ले।

 

नोट - विपश्यना साधाना के दस दिवसीय नि:शुल्क शिविर  सर्वत्र लगते है। कृपया देखे- www.vri.dhamma.org सबका मंगल हो।


 


? यू.एस.वावरे