संस्करण: 16 मई-2011

उपजाऊ धारती, बेहाल किसान
और भ्रष्ट तंत्र
 

? डॉ. महेश परिमल

               बचपन से सुनता आ रहा हूँ,भारत एक कृषि प्रधान देश है! पर देश पर हावी लालफीताशाही ने इसे बरबादी के उस कगार पर पहुँचा दिया है,जहाँ से वापसी संभव नहीं। हर साल की तरह इस बार भी हमारी शस्य-श्यामला धरती ने गेहूँ के रूप में सोना उगला है। इसे हम धरती माता का आभार ही मानें,क्योंकि उसकी रक्षा के लिए हम ऐसा कुछ भी नहीं कर रहे हैं,जिसे उपलब्धि कहा जाए। इसके बाद भी धरती माँ ने हमें पेट भरने के लिए गेहूँ के रूप में सोना दिया। पर अच्छी फसल के बावजूद किसान इस लालफीताशाही के आगे बेबस है। गेहँ तो उसने सरकार को बेच दिया,पर सरकार अभी तक उसका भुगतान नहीं कर पा रही है। कई स्थानों पर अभी तक गेहूँ को सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं हो पाई है। लगता है इस बार भी देश में लाखों टन अनाज फिर सड़ जाएगा। मध्यप्रदेश की हालत भी कम नहीं है। यहाँ अभी भी हजारों टन गेदँ खुले में पड़ा है। मंडियों में अव्यवस्था के चलते किसानों को सही दाम नहीं मिल रहा है। किसान बेहाल है। सरकार को इतनी फुरसत नहीं है कि इस ओर ध्यान दे। आखिर कौन समझेगा इन धारतीपुत्रों की परेशानी?

 

                पिछले साल जब हजारों टन अनाज सड़ गया था,तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को लताड़ लगाई थी अगर अनाज को सुरक्षित नहीं रख सकते,तो उसे गरीबों में मुफ्त में बाँट दो। कोर्ट के इस रवैये से केंद्र सरकार इतनी अधिक नाखुश हुई कि उसने कोर्ट से ही कह दिया कि वह अपने सुझाव अपने तक ही सीमित रखे। आज पंजाब, हरियाणा,मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में कमोबेस यही हालत है कि पिछले साल का ही अनाज इतना अधिक है कि इस साल के अनाज को रखने की जगह ही नहीं बची। अनाज का विपुल उत्पादन होने के बाद भी न तो किसानों को अनाज का सही दाम मिल रहा है और न ही नागरिकों को सस्ता अनाज मिल रहा है। अनाज के बारे में केंद्र सरकार की स्पष्ट नीति न होने के कारण आज अनाज सड़कों पर बिखरा है। मौसम न जाने कब बदल जाए,इससे लाखों टन अनाज बरबाद हो सकता है। सरकार भले ही यह कहती रहे कि आवश्यकता पडने पर अनाज को खाली स्कूलों में रखा जा सकता है। पर स्कूलों की हालत कितनी अच्छी है,यह किसी से छिपा नहीं है। इसलिए सरकार की यह घोषणा बेमानी साबित होती है।

 

               आज देश की अनाज मंडिया अव्यवस्था की शिकार हैं। वहाँ किसानों के लिए न तो आवश्यक सुविधाएँ हैं और न ही किसी प्रकार की छूट। अपनी फसल का पूरा मुआवजा तक समय पर नहीं मिल रहा है,इससे अधिक बदतर स्थिति और क्या हो सकती है। न चाहते हुए भी किसानों को साहूकार से कर्ज लेना पड़ रहा है। वह भी ऊँची ब्याजदरों में। आखिर क्या कर रही है सरकार?इसी अवस्था में जीते हुए किसान लाचारी में यदि आत्महत्या करने लगे,तो चारों तरफ हाहाकार मच जाता है। आखिर किसान क्यों न करें आत्महत्या?

 

               पंजाब-हरियाणा से जानकारी है कि वहाँ मौसम का मिजाज अक्सर बदलता रहता है। इन दिनों शिमला में बारिश हो रही है। ऐसे में वहाँ की धरती ने जो सोना उगला है,उसका क्या होगा। इस बार वहाँ अपेक्षा से कम उत्पादन हुआ है। पंजाब में पिछले वर्ष 93 लाख 52 हजार टन गेहूँ का उत्पादन हुआ था। इसके मुकाबले इस वर्ष 64 लाख 55 हजार टन गेहूँ का उत्पादन हुआ है। कमोबेश यही स्थिति मध्यप्रदेश और हरियाणा की है। यहाँ के किसानों को इस बात की चिंता नहीं है कि इस बार उत्पादन कम हुआ। उनकी चिंता यह है कि सरकार ने उनसे जितना अनाज माँगा था,उतना उनके पास तैयार तो है,पर सरकार अब उसे लेना नहीं चाहती। इसका कारण यह है कि सरकार के पास पिछले साल का ही लाखों टन अनाज रखा है,जब तक वह अनाज बाहर नहीं निकलता,तब तक नए अनाज को वहाँ नहीं रखा जा सकता। अब नए अनाज को रखा कहाँ जाए? पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा था कि जब देश में लाखों लोग भूख से मर रहे हैं,दूसरी तरफ हजारों टन अनाज सड़ रहा है,तो क्यों न इसे मुफ्त में ही बाँट दिया जाए। इस वर्ष अनाज को सुरक्षित रखने को ऐसा कोई उपाय तो सामने नहीं आया,जिससे किसानों की मेहनत को सुरक्षित रखा जाए। इतना अनाज बरबाद हो जाता है,लेकिन हमारे सरकारी अधिकारियों और न ही नेताओं को जरा भी दुख होता है। क्या सचमुच इनकी संवेदनाएँ पूरी तरह से मर गई हैं?सरकारी गोदामों की हालत यह है कि उसमें पिछले साल का ही अनाज भरा है। जब तक उसे खाली न किया जाए,तब तक नया अनाज उसमें भरा नहीं जा सकता। पंजाब,हरियाणा,उत्तर प्रदेश,मध्यप्रदेश आदि राज्यों में आज भी अनाज खुले में पड़ा है। ऐसे में प्रति का मिजाज बिगड़ गया,तो गई भैंस पानी में। अनाज सड़ेगा,वह तो अलग बात है,उससे जो दुर्गंधा फैलेगी,फिर जो बीमारी फैलेगी,उसका क्या?क्या नई फसल आने के पहले पुरानी फसल का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। क्या हमारे नेता अधिकारी इतने भी दूरंदेशी नहीं है कि अनाज सड़े,उसके पहले ही वह सही हाथों तक पहुँच जाए। हमारे पास अनाज का विपुल भंडार है,उसके बाद भी देश में भुखमरी है। जब देश में गोदाम नहीं है,तो फिर गोदाम बनाना ही एकमात्र विकल्प है। शर्म आती है कि हम उस देश में रहते हैं,जहाँ अनाज तो खूब पैदा होता है,पर लोग भूख से भी तड़पते हुए अपनी जान दे देते हैं। यह सब सरकारी अव्यवस्था के कारण है।


? डॉ. महेश परिमल