संस्करण: 16 जून-2014

CLICK HERE TO DOWNLOAD HINDI FONT


यह अहंकार है

     पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के दो वरिष्ठ नेता ने जो कहा, उससे एक बार फिर स्पष्ट हो गया कि उनके कुछ नेताओं में अहंकार की बीमारी घर कर गई है। संसदीय मामलों के मंत्री एम वेंकैया नायडू ने कहा है कि लोगों ने इस पद के लिए किसी पार्टी को नहीं चुना है, इसके बावजूद यह विषय अब तक बंद नहीं हुआ है। कांग्रेस जनादेश की भावना को समझ पाने में सक्षम नहीं है। वेंकैया यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा मैं इस मुद्दे को बंद नहीं कर रहा हूं,अगर किसी पार्टी को 55सीटें मिली हैं तो इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए।   

? विवेकानंद


थरूरजी विचार जरूर कीजिये

        भारतीय राजनीति में जो थोड़े से युवा, सुदर्शन, कोमल और अभिजात्य व्यक्तित्व नजर आते हैं उनमें श्री शशि थरूर भी एक हैं जो पिछले दिनों यूपीए मंत्रिमण्डल में विभिन्न जिम्मेवारी के पद सम्हालते छोड़ते रहे हैं और अन्य व्यक्तिगत घटनाओं दुर्घटनाओं समेत आईपीएल व वायुयान के यात्रियों के वर्गीकरण में भी कैटिल क्लास जैसे जुमलों के लिए भी चर्चा में रह चुके हैं। ऐसे व्यक्ति का कभी कभी कुछ कुछ भावुक और काव्यात्मक हो जाना सहज सम्भव है। इसी भावभूमि में पिछले दिनों उन्होंने एनडीए सरकार के भाजपायी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में एक नये अवतार के दर्शन कर लिये और कांग्रेस के प्रवक्ता पद की कुर्सी से उनके समन्वित विकास के लिए राजनीतिक सहयोग के आवाहन से नई उम्मीदें बाँध लीं।

?

वीरेन्द्र जैन


शर्मशार करने वाली दो निंदनीय घटनाए

     पिछले सप्ताह दो ऐसी घटनाएं घटीं जिनसे हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को गंभीर चोट पहुंची है। दोनों घटनाएं बढ़ती हुई असहिष्णुता की प्रतीक हैं। इस तरह की पहली घटना पुणे में घटी, जहां एक पूरी तरह से निर्दोष नवयुवक की हत्या कर दी गई। इस युवक की हत्या सिर्फ इसलिए की गई क्योंकि वह मुसलमान था। हत्या एक अतिवादी हिन्दू संगठन के सदस्यों ने की थी। इस संगठन के सदस्य इसलिए आक्रोशित थे क्योंकि फेसबुक पर कुछ ऐसे चित्र डाले गए थे जिनसे शिवाजी का एवं शिवसेना के संस्थापक बालासाहब ठाकरे का अपमान होता है।

 ? एल.एस.हरदेनिया


एक विस्मृत

गुजराती प्रधानमंत्री

      चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी ने अनेक बार यह कहा कि वे वल्लभ भाई पटेल को भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे। और उन्होने पटेल की स्मृति में एक ''स्टेच्यू ऑफ यूनिटी'' बनाने का वादा भी किया जो ''स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी'' से भी विशाल एवं शानदार होगी। श्री मोदी ने यह कभी नही बताया कि वे सरदार पटेल की इतनी अधिक तारीफ क्यों करते है। मैं समझता हूँ कि वे ऐसा शायद इसलिये करते होंगे क्योंकि सरदार एक उत्कृष्ट प्रशासक थे,

? रामचन्द्र गुहा


कॉरपोरेट की जेब में मीडिया

             मीडिया और उसके वर्ग चरित्र पर बात शुरू करने से पहले मैं एक वाकिए का जिक्र करना चाहूंगा। बात उन दिनों की हैं जब पर्यावरण पर कार्पोरेट कंपनियों के बढ़ रहे दखल और मानवता पर उसके खतरे को लेकर संघर्ष करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता सुनीता नारायण के एनजीओ ने पहली बार यह बताया था कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शीतल पेयों में खतरनाक पेस्टीसाइड् का उपयोग होता है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक होता है। देश भर के अखबारों में यह खबर तो छपी लेकिन, 

 ?  हरेराम मिश्र


कानून-व्यवस्था और

अखिलेश की सीमाएें

           त्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भयावह होती कानून-व्यवस्था की स्थिति को संभालने के लिए एक झटके में 108आई.ए.एस.और आई.पी.एस.अधिकारियों का तबादला तथा कईयों को सजा के तौर पर प्रतीक्षारत कर दिया है। प्रशासनिक दक्षता बनाने के लिए इस तरह के स्थानान्तरण महत्त्वपूर्ण होते हैं और इसी के मार्फत योग्य अधिकारियों को उनके अनुकूल पदों पर लाया जाता है। अतीत में इससे भी बड़े पैमाने पर एकमुश्त स्थानान्तरण होते रहे हैं और कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि इस उलटफेर में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का हते-दस दिन में दो-तीन बार स्थानान्तरण कर दिया गया। 

? सुनील अमर


' वे कहते हैं, हम गन्दे हैं' :

भारत के स्कूलों में हाशियाकृत समुदायों के बच्चे

      ड़िसा के केवनझार जिले के आंगनवाडी केन्द्र में रोज की तरह अपने ढाई साल के बेटे परशुराम मुंडा को छोड़ते वक्त उसके पिता रिलु मुंडा ने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसकी किलकारियां जल्द ही कराहों में बदलेंगी क्योंकि आंगनबाड़ी की महिला कर्मचारी उस पर पतले चावल की (पेजा) हंडिया उलट देगी। वजह थी कि 'निम्न जाति' के समझे जानेवाले परशुराम ने केन्द्र में एक बर्तन में रखे उबले अंडों को अपने हाथ से छू दिया था।

?  सुभाष गाताड़े


शौचालय शौच के लिए या सुरक्षा के लिए

     त्तर प्रदेश के बदायूं जिले की दो बच्चियों के साथ बलात्कार और उनकी हत्या की घटना पूरे देश में ही नहीं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिन्ता का सबब बनी है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव बान की मून ने भी इस मसले की भर्त्सना की। विभिन्न संगठनों, समूहों की तरफ से आज भी इस मसले पर विरोधा प्रदर्शन जारी हैं। अपराधियों को सख्त से सख्त सज़ा देने की मांग के बाद अब शौचालयों की कमी या इस सुविधा के अभाव की बात भी उठ रही है क्योंकि वे दोनों बच्चियां शौच के लिए बाहर निकली थीं तभी अपराधियों ने उनका अपहरण कर लिया।

 

? अंजलि सिन्हा


सोशल मीडिया पर नियंत्रण के लिए

कब विकसित होगा कारगर तंत्र

        सोशल नेटवर्किंग साइटों पर कुछ नियंत्रण हो, यह बात बीते कुछ महीनों से बार-बार उठती रही है। नियंत्रण और नियमन की यह बात लाजिमी भी है। इन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जो विवाद का विषय बने। विवाद कई बार इतना ज्यादा बढ़ गया कि उसने सांप्रदायिक हिंसा का रुप ले लिया। मुजफरनगर की हिंसा इसकी एक छोटी सी मिसाल भर है। सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर पैदा हुए ऐसे ही एक विवाद ने हाल ही में एक मासूम बेगुनाह नौजवान की जान ले ली।         

? जाहिद खान


स्कूलों की कैंटीन से बीमारी का खतरा

      पने बच्चों की सेहत को लेकर चिंता करने वाले माता पिता यह जानकर हैरान हो सकते है कि स्कूलों की कैंटीन बच्चों को बीमार कर सकती है। इसका कारण कैंटीन में साफ सफाई का पर्याप्त प्रबंध नहीं होना और उसमें बिकने हानिकारक खाघ पदार्थ है। स्कूलों की कैंटीन में बच्चों को खाने पीने के लिए जो खाघ पेय पदार्थ उपलब्ध कराये जाते हैं उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने की कोई नियमित व्यवस्था नहीं है। जो कर्मचारी खाघ पेय पदार्थो को बनाते हैं वे स्वच्छता, शुधदता सम्बन्धी कितने नियमों का पालन करते हैं इसकी भी कोई गारंटी देने वाला नहीं हैं ।

? अमिताभ पाण्डेय


घातक है-रेडियोधर्मी प्रदूषण ?

        ज विकास की गति के लिहाज से उर्जा की मॉग लगातार बढ़ती जा रही है।उर्जा के तमाम स्त्रोतों जैसे जल,कोयला,तेल और सौर उर्जा या तो सिकुड़ते जा रहे या फिर पर्यावरणीय दृष्टि से घातक है। ऐसी स्थिति में उर्जा की आपूर्ति की सततता के लिए परमाणु उर्जा की ओर सबकी नजरें है। परमाणु उर्जा का उत्पादन रेडियोधर्मी पदार्थों से होता है। रेडियोधर्मी तत्व उर्जा के असीमित स्त्रोत होते हैं तथा इनसे प्रचुर मात्रा में उर्जा प्राप्त की जा सकती है।

? डॉ. सुनील शर्मा


फुटबाल के धंधे में बालश्रम

      10 साल की सांवरी, दुर्गंध मारते चमड़े के ढेर के पास बैठी हुई। झुका हुआ सिर, एक चीज पर जमी नीचीं नजरें। छोटे-छोटे हाथ और दर्द करती पतली सूजी उंगलियां। तेजी से चमड़े की फुटबाल की सिलाई करती उंगलियों से पकड़ी दो भारी सुइयां। सांवरी का पूरा दिन और थोड़ी रात अक्सर इसी काम में बीत जाती है। यही उसकी दिनचर्या है। इसमें न तो स्कूल जाने के लिए कोई जगह है, न ही साथियों के साथ खेलने-कूदने के लिए समय। गरीब है। यही कारण है कि 14 साल से कम उम्र में भी मजदूरी का दंश झेल रही है।

? नरेन्द्र देवांगन


  16 जून-2014

Designed by-PS Associates
Copyright 2007 PS Associates All Rights Reserved