संस्करण: 16  जुलाई-2012

बच्चों के फेसबुक पर

पालकों का नियंत्रण आवश्यक

? डॉ. महेश परिमल

                  दिल्ली के डॉ. समीर मल्होत्रा आजकल कुछ नया पढ़ रहे हैं। वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे जानना चाहते हैं कि आजकल के फेसबुकिया बच्चों को किस तरह से ठीक किया जाए। वे ऐसे बच्चों को मनोरोगी मानते हैं। उनके पास रोज कम से कम दो बच्चे ऐसे आते हैं, जो फेसबुक में डूब चुके थे और उसके माध्यम से उन्हें मानसिक यंत्रणाएँ सहनी पड़ी थी। कई बच्चे इस कारण डिप्रेशन का भी शिकार हो रहे हैं। ऐस तब से अधिक हुआ है, जब से यह तय किया गया है कि अब 13वर्ष के बच्चे भी फेसबुक पर अपना एकाउंट खोल सकते हैं। इसका पूरे विश्व में विरोध हो रहा है। इंटरनेट इस्तेमाल करने वाला भारत तीसरे नम्बर का देश है? इसलिए आज देखा यह जा रहा है कि हाईस्कूल में पढने वाले 64 प्रतिशत बच्चे आज फेसबुक का इस्तेमाल कर रहे हैं।

                 सोशल नेटवर्किंग साइट्स अब हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा बन गई हैं। हम कितना भी चाहें, अपने बच्चों को इससे अलग नहीं कर सकते। आजकल तो यह माना जा रहा है कि जो फेसबुक में नहीं है, वह पिछड़े वर्ग का है। या फिर आज की दुनिया का इंसान नहीं है। शायद समय आ गया है कि अब पालकों को अपने बच्चों के लिए फेसबुक एकाउंट खोलना पड़े। फिर उन्हीं बच्चों के फ्रेंड बनकर उनसे पालकों के बारे में राय ली जाए। इससे बच्चे अपने पालकों के बारे में कथित दोस्त को विस्तार से जानकारी देंगे। शायद दिल की बात कह दें। आज इंटरनेट को एक क्रांति के रूप में देखा जा रहा है। ये क्रांति ऐसी है, जिसमें बालक घर में ही अपने भाई-बहन, माता-पिता से बात नहीं करता, पर सात समुंदर पार अपने दोस्तों से बड़े ही चाव से बात करता है। अनजाने लोगों से रोज पूछताछ होती है, पर घर में ही अपनों से वह बात करने में कतराता है। माता-पिता की सेवा के लिए बच्चों के पास समय नहीं है, पर दूसरे अनजाने लोगों से बात करने में वह अपना काफी वक्त लगाता है। केवल अपने कमेंट पर लाइक देखने और कमेंट पढने के लिए वह इतना अधिक वक्त इंटरनेट के साथ गुजारता है कि उसे अपनी ही सुध नहीं रहती। यह किस प्रकार की सोशल नेटवर्किंग है, समझ में नहीं आता?

                आजकल के बच्चे बिना फेसबुक के स्वयं को अधूरा समझते हैं। 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चे फेसबुक पर अपना खाता नहीं खोल सकते। पर सर्वेक्षण कहता है कि करीब 75लाख बच्चों ने अपनी झूठी जन्म तारीख लिखकर फेसबुक पर अपना खाता खोल लिया है। इसमें 50लाख बच्चों की उम्र दस वर्ष से भी कम है। भारत में मेकेफी-सिनोवट नामक एजेंसी ने 9 से 12 वर्ष की उम्र के बच्चों का सर्वेक्षण किया, तो पता चला कि इनमें से करीब 64 प्रतिशत बच्चों का फेसबुक पर खाता है। इसी कारण अब यह नियम लागू हो गया है कि 13 वर्ष के बच्चे भी फेसबुक पर अपना एकाउंट खोल सकते हैं। इसके दुष्परिणाम बहुत ही जल्द सामने आएंगे,यह तय है। फेसबुक का अधिक इस्तेमाल बच्चे को अंतर्मुखी बना देता है। वह घर से बाहर निकलकर दूसरों से बात करने में कतराता है। दूसरों से बात करने की क्षमता में लगातार कमी आती है। भारत में फेसबुक के 5 करोड़ ग्राहक हैं।  विश्व में फेसबुक का तीसरे नम्बर का मार्केट भारत में है। अन्य देशों में जब सोशल नेटवर्किंग की शुरुआत हुई, तब उस पर गंभीर चिंतन हुआ। उसके फायदे-नुकसान पर व्यापक चर्चा की गई। इसके बाद उससे बचने की उपायों पर भी काम हुआ। हमारे देश में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। माइक्रोसाप्ट के ही एक सर्वे में बताया गया है कि भारत में जो बच्चे फेसबुक का उपयोग करते हैं, उसमें से 53 प्रतिशत आनलाइन अत्याचार के शिकार होते हैं। नहीं भी होते हैं, तो वे धमकियों से बच नहीं पाते। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 8 से 17 वर्ष के बीच के 53 प्रतिशत फेसबुक के माध्यम से सताए गए। जिस तरह से बच्चे स्कूल या घर पर ही यौन प्रताडना के भी शिकार होते हैं,ठीक उसी तरह इंटरनेट पर भी मानसिक रूप से प्रताड़ित हो सकते हैं। हाल ही में बेंगलोर में आईआईएम की एक छात्रा ने अपने ब्वायफ्रेंड को धोखा दे दिया,इस सदमे से छात्र ने खुदकुशी कर ली। आज कई बच्चे फेसबुक पर जिस तरह से दिन भर बैठे रहते हैं, उससे लगता है कि वे एक तरह का व्यसन ही कर रहे हैं। इतना ही नहीं किसी मित्र ने उस पर गलत टिप्पणी कर दी या उसे अपने सूची से हटा दिया, तो बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं।

                   टीनएजर नम्रता दिन में दो-तीन बार फेसबुक पर बैठकर अपने मित्रों का हालचाल लेती रहती है। उसे लगता है कि यदि मैं अपने मित्रों की खैर-खबर न रखूं, तो दुनिया में क्या हो रहा है, यह मैं कैसे जान सकती हूं। जबकि दुनिया में क्या हो रहा है, इसके लिए टीवी-अखबार हैं। पर ये साधन उन्हें पर्याप्त नहीं लगते। आज उन्हें राष्ट्रपति चुनाव से अधिक दिलचस्पी पिकनिक में कब कहां जाना है, इसमें है। यही नहीं, शहर में कोई अनहोनी हो गई हो, तो उससे अधिक यह जानना आवश्यक है कि स्कूल के किस लड़के से किस लड़की का अफेयर चल रहा है, किनके बीच हाल में ब्रेकअप हुआ है। कौन डेटिंग पर जा रहा है आदि जानकारी जुटाना अतिआवश्यक हो गया है। एक लड़की ने एक लड़के को फेसबुक पर अपनी तस्वीर भेजी। लड़के ने तस्वीर देखकर कमेंट लिखा- जानता हूं अच्छी लग रही हो, वैसे सच कहूं तो एडोब एक अच्छा साफ्टवेयर है, जो नहीं हैं उनको भी खूबसूरत बना देता है। सोचो उस लड़की पर क्या बीती होगी? इसी तरह आजकल तस्वीरें भेजने का प्रचलन अधिक हो गया है। कई लोग अपनी मूल तस्वीर नहीं लगाते। कुछ भोली लड़कियाँ यदि मूल तस्वीर फेसबुक पर लगा देती हें, तो उसका इस तरह से दुरुपयोग होता है कि वे चाहकर भी अपने दोस्तों के बीच मुंह दिखाने लायक नहीं रह पातीं। किसी को बदनाम करने का आजकल मुख्य साधन फेसबुक ही हो गया है। फेसबुक पर केवल लड़के ही अपनी उम्र कम नहीं बताते, पर कुछ अधेड़ भी अपनी उम्र कम बताकर कमसिन लड़कियों से बात करते रहते हैं, मौका मिलने पर वे उसे एक निश्चित स्थान पर बुलाने में कामयाब हो जाते हैं, उसके बाद जो कुछ होता है, वह अवर्णनीय है। इसलिए होना तो यह चाहिए कि यदि लड़की पर कोई अधिक ही दिलचस्पी लेने लगा है, तो ऐसे लोगों से सावधान हो जाना चाहिए। संभव हो तो सिक्योरिटी सेटिंग का इस्तेमाल कर तंग करने वाले या दिलचस्पी दिखाने वाले को सूची से अलग कर दिया जाए। कई लोगों को यह पता ही नहीं होता कि जिन्हें हम पसंद नहीं करते, उन्हें अपनी मित्र सूची से कैसे हटाएं?

                 पालक फेसबुक का इस्तेमाल करने वाले बच्चों को यह अवश्य बताएं कि आपका रिजल्ट खराब आया है, तो आपके ये फेसबुक के साथी उसे ठीक करने नहीं आएंगे। आप पर कोई मुसीबत आई है, तो ये साथी सबसे पीछे होंगे, किसी काम के नहीं हैं ये साथी, काम आएंगे घर के ही सदस्य। जिन्हें अब तक आप अनदेखा करते रहे हैं। अनजानों से बात करना सहज है, पर अपनों से बात करना मुश्किल है। ऐसा तब महसूस होता है, जब हम अपनों पर विश्वास नहीं करना सीख जाते हैं। हमें वे प्यारे लगने लगते हैं, जो हमसे दूर हैं, सात समुंदर पार हैं, हजारों किलोमीटर दूर हैं। ऐसे लोग थोड़ी सी खुशी तो दे सकते हैं, पर इसमें स्थायित्व नहीं होता। स्थायी खुशी हमें हमारे पालकों से, भाई-बहनों और रिश्तेदारों से ही मिलेगी। जिस तरह से अभी 13 वर्ष के बच्चों को फेसबुक पर अपना एकाउंट खोलने की अनुमति मिल गई है, उसका पूरे विश्व में विरोध हो रहा है। ये विरोधी यह कह रहे हैं कि 8 वर्ष के बच्चे की उम्र तो खेलने-खाने की होती है। उसे अपने मित्रों के बीच खेलना-कूदना चाहिए। उनसे हिलमिलकर बात करना चाहिए। यदि ये लोग फेसबुक पर अपने मित्रों से बातचीत करते हुए बैठे रहेंगे, तो घर में ही बंद होकर रह जाएंगे। प्रकृति का साथ छूट जाएगा। दूसरों से बात करने में संकोच का अनुभव करेंगे। बहुत ही जल्द वह समय भी आएगा, जब फेसबुक पर बैठा हमारा बच्चा क्या कर रहा है, उसकी हरकतें कैसी हैं, इसकी पूरी जानकारी पालकों को उनके मोबाइल फोन पर मिलती रहेगी। यही नहीं पालक अपने मोबाइल से बच्चे के फेसबुक को नियंत्रित भी कर सकेंगे। ये तो जब होगा, तब होगा, पर यदि इस दिशा में पालक ही सचेत हो जाएं, तो बच्चों पर नियंत्रण रखा जा सकता है। बच्चे को यह अवश्य समझाया जाए कि फेसबुक के रिश्ते कभी गहरे नहीं हो सकते। हमेशा खून के रिश्ते ही काम आएंगे। फेसबुक से भले ही ज्ञान मिलता हो, पर बुध्दि भ्रष्ट करने में यह किसी से कम नहीं है।


? डॉ. महेश परिमल