संस्करण: 16  जुलाई-2012

स्वास्थ और चिकित्सा

शिक्षा के क्षेत्र में सुधार जरूरी

? जाहिद खान

                 मारे देश में मौजूद स्वास्थ सुविधाओं को लेकर अक्सर चिंता जतलाई जाती रही है। सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी देश की एक बड़ी आबादी स्वास्थ सुविधाओं से वंचित है। खासकर,ग्रामीण इलाके। जहां बुनियादी ढांचे से लेकर डॉक्टर,नर्स सभी की कमी है। ये हालात तब हैं,जब सरकार बरसों से पूरे देश में स्वास्थ व परिवार कल्याण कार्यक्रम चला रही है। सरकार हर साल इस कार्यक्रम के लिए करोड़ो रूपए का बजट आवंटित करती है। लेकिन फिर भी तस्वीर है कि बदलने का नाम नहीं ले रही। इसके कारणों में यदि जाएं तो चिकित्सक,नर्सों और सार्वजनिक पेशेवरों की कमी,सर्वव्यापी स्वास्थ कवरेज देने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। यह बात अब खुद, हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने एक वक्तव्य में स्वीकारी है।

                 पुडुचेरी के जवाहरलाल इंस्टीटयूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजूकेशन रिसर्च के दीक्षांत समारोह में प्रधानमंत्री ने न सिर्फ देश में मौजूद स्वास्थ सुविधाओं पर असंतोश जतलाया, बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर भी अपनी चिंता जाहिर की। यानी,प्रधानमंत्री ने उस बुनियादी बात की तरफ अपना इशारा किया है, जिसमें सुधार होना सबसे पहले जरूरी है। देश में कुकरमुत्तों की तरह जगह-जगह उग आए, निजी मेडिकल कॉलेजों में शिक्षा के स्तर पर सवाल उठते रहे हैं। एक भरोसेमंद नियामक तंत्र के अभाव में ये कॉलेज, अपनी मनमानियां करते रहते हैं। यहां तक कि कई कॉलेजों में तो चिकित्सा शिक्षा के तय मानदंडों के हिसाब से पढ़ाई भी नहीं होती। यह स्थितियां बदलें, इसके लिए प्रधानमंत्री का कहना था कि देश में चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता के लिए जल्द ही एक भरोसेमंद नियामक तंत्र और सांस्थनिक तंत्र बने। जो चिकित्सा शिक्षा के पाठयक्रम पर गंभीरता से गौर करने के अलावा,भविष्य के डॉक्टरों के लिए इस तरह का प्रशिक्षण कार्यक्रम बनाएं, जिसमें वे स्वास्थ को संपूर्णता के साथ देखें। खासकर, उन्हें सभी स्तरों पर कम्युनिटी मेडिसन में भी प्रशिक्षण दिया जाए।

                  दरअसल, हमारी शिक्षा व्यवस्था ही कुछ ऐसी है, कि इसमें सिर्फ विद्यार्थियों को यांत्रिक शिक्षा और डिग्रियां देने पर ही पूरा जोर है। जबकि चिकित्सा शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो उन्हें तकनीकी तौर पर सक्षम करने के अलावा उन्हें सामाजिक तौर पर संवेदनशील, नैतिक तौर पर सही और स्वास्थ सेवा देने के लिए हर दम, हर जगह तैयार रहने वाला स्वास्थ पेशेवर बनाए। जाहिर है जब इस तरह की शिक्षा होगी, तो ये डॉक्टर किसी भी परिस्थिति में और कहीं भी अपनी सेवाएं मुस्तैदी से दे सकेंगे। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थकर्मियों और मुकम्मल स्वास्थ ढांचे की कमी एक बड़ी समस्या है। देश की 73 फीसद आबादी गांवों में रहती है। यहां उपलब्ध स्वास्थ सुविधाओं को यदि देखें, तो ये शहरों के मुकाबले 15 फीसद भी नहीं हैं। केन्द्रीय मंत्रालय के आंकड़ो के मुताबिक, देश में 2083 लोगों पर एक डॉक्टर और प्रति 6 हजार लोगों पर एक सहायक नर्स उपलब्ध होना चाहिए। लेकिन वास्तविक स्थिति कुछ और है, शहरों में जहां 662 की आबादी के बरअक्स 1 डॉक्टर, तो वहीं ग्रामीण इलाकों में 8333 की आबादी के बरअक्स 1 डॉक्टर है।

                   ग्रामीण इलाकों में लोगों को ज्यादा से ज्यादा चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने के लिए यूपीए सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन की शुरूआत की। योजना का मकसद देश के दूर-दराज के देहाती इलाकों में गरीब परिवारों तक विश्वसनीय और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ सुविधाएं मुहैया कराना था। योजना का बजट करोड़ों रुपए है, लेकिन डॉक्टरों की कमी के चलते ये महत्वाकांक्षी परियोजना भी परवान नहीं चढ़ पा रही है। आज भी देश में अधिकांश प्राथमिक स्वास्थ केन्द्र और सामुदायिक स्वास्थ केन्द्र बिना डॉक्टरों के चल रहे हैं। डॉक्टर हैं भी, तो जरूरत से कम। जो डॉक्टर मजबूरी में गांव में जाना मंजूर कर लेते हैं, वे ज्यादातर समय अस्पतालों में नदारद रहते हैं या आस-पास के किसी शहर में अलग से निजी तौर पर प्रेक्टिस षुरू कर देतें हैं। लिहाजा, ग्रामीण लोगों को माकूल चिकित्सा सुविधाएं मुहैया नहीं हो पातीं। जाहिर है, इस चुनौती से मिल-जुलकर ही निपटा जा सकता है। प्रधानमंत्री का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को मिलकर रणनीति बनानी होगी। स्वास्थ संबंधी प्रभावी देखभाल के लिए एक बहुस्तरीय कार्यबल बने और एक टीम के तौर पर सब साथ मिलकर काम करें। तभी जाकर स्थितियां बदलेंगी।

                प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में एक बात और महत्वपूर्ण कही, ग्रामीण इलाकों में चलने वाली सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन योजना अगले पांच साल तक और जारी रहेगी। देश के गांवों में जब तक स्वास्थ संबंधी ढांचा दुरुस्त नहीं हो जाता, सरकार इस योजना से अपने पांव पीछे नहीं खींचेगी। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन की कामयाबी को देखकर, सरकार का इरादा शहरों में भी इस तरह की योजना का विस्तार करना है। यानी, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ मिशन की तर्ज पर राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ मिशन योजना। योजना पूरी तरह से शहरी जनता की स्वास्थ संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई जाएगी। कुल मिलाकर स्वास्थ और चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार, मौजूदा समय की महती आवश्यकता है। अच्छी बात यह है, सरकार का भी इरादा, इस क्षेत्र में कुछ नया करने का है। अब देखना यह है, सरकार की नेक नीयत कब अमल में बदलती है।


? जाहिद खान