संस्करण: 16  जुलाई-2012

सुप्रीम कोर्ट की कृपा से

गुजरात में शान्ति भी होगी और इंसाफ भी

? शेष नारायण सिंह

               जिन लोगों ने मार्च 2002 में  वली गुजराती की दरगाह को जमींदोज करके सड़क बनावा दी थी ,कानून की मुनादी उनके दरवाजों पर फिर बज रही है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया है कि अब सरकार को एक लिस्ट तैयार करनी पड़ेगी जिसमें उन सारी दरगाहों और पूजा स्थलों का नाम होगा जिन्हें  नफरत के  सौदागरों ने तबाह कर दिया था । सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि इस लिस्ट में उन सारी मस्जिदों,दरगाहों और अन्य पूजास्थलों का उल्लेख होगा जिनके लिए प्रभावित लोगों ने राज्य सरकार से मुआवजा माँगा है ।इसके पहले गुजरात हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि सरकार उनसभी दरगाहों की मरम्मत करवाए जो 2002के नरसंहार के दौरान नष्ट कर दी गयी थीं । राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करके प्रार्थना की थी कि सरकारी खजाने का इस्तेमाल धार्मिक स्थलों की मरम्मत के लिए नहीं किया  जाना चाहिए । उनकी दलील थी कि  हाई कोर्ट ने इस तरह का आदेश देकर गलती की है । सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से कठिन सवाल किये और पूछा कि राज्य सरकार बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा के बादलोगों के घर बनाने के लिए सरकारी पैसा दे सकती है तो सार्वजनिक महत्व के धार्मिक स्थलों के लिए क्यों नहीं ।माननीय न्यायाधीशों ने कहा कि इस मसले परबाद में विचार किया जाएगा। लेकिन सरकार को आदेश दिया कि उन दरगाहों और पूजास्थलों की लिस्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की जाए जो 2002के साम्प्रदायिक दंगों के दौरान जमींदोज कर दिए गए थे और जिन्हें नुकसान पंहुचाया गया था। ऐसी ही दरगाहों में वली गुजराती की मजार भी थी। 28 फरवरी 2002 के दिन अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर के दफ्तर के सामने चार सौ वर्षों से मौजूद उनकी मजार को जमींदोज करके सड़क बना दी गयी थी ।अब उसका कहीं कोई निशान नहीं है ।

               वली गुजराती को वली दकनी भी कहते हैं क्योंकि वे मूलरूप से हैदराबाद के थे। अहमदाबाद  बहुत जाते थे । वे उर्दू गजल के आदि पुरुष माने जाते हैं । सन 1700 में वे दिल्ली आये थे । उसके पहले गजल की भाषा फारसी थी लेकिन उनकी उर्दू गजलों से उस दौर के दिल्ली के शायर इतने प्रभावित हुए कि उन लोगों ने भी रेखता में गजल कहना शुरू कर दिया । उस जमाने में उर्दू को रेखता नाम से जाना  जाता था। उसके बाद ही उर्दू को जौक ,सौदा और मीर नसीब हुए और उर्दू गजल की  भारत में बुनियाद पड़ी। उनकी 473 गजलें उर्दू साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं । फरवरी 2002 तक अहमदाबाद में मौजूद उनकी मजार भी एक ऐतिहासिक धरोहर थी लेकिन नफरत के कारोबारियों ने उसे ढहा दिया । सुप्रीम कोर्ट का नया आदेश वली गुजराती के साथ ही गुजरात के अन्य कई इलाकों में  लोगों की आस्था को तबाह करने के उद्देश्य से ढहाई गयी दरगाहों और अन्य पूजा स्थलों का हिसाब किताब देने के लिए मजबूर कर देगा। अब तक राज्य सरकार मानने को तैयार नहीं है कि  2002 में मुसलमानों के आस्था के केन्द्रों को निशाना बना कर तबाह किया गया था । इस आदेश का महत्व यह है कि अब राज्य सरकार को देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने सच्चाई को स्वीकार करना पड़ेगा । यह भी संभव है कि राज्य सरकार पूरी जानकारी दने से बचने की कोशिश करे लेकिन वह उसके लिए संभव नहीं होगा क्योंकि बहुत सारी एजेंसियों ने सर्वे कराया है और सब को मालूम है कि नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते 2002में जो तबाही हुई थी उसमें आस्था के किन केन्द्रों को नष्ट किया गया था।

               नफरत और तबाही के उस दौर में अहमदाबाद की 55 ,आनंद की 53 , भरूच की 10, भावनगर की 2 , दाहोद की 15 गाँधी नगर की 4, पंचमहल जिले की 19,  खेडा जिले की 14 , मेहसाना की 18, साबरकांठा की 13 ,वड़ोदरा की 22 , सूरत की 3 और राजकोट की 3 दरगाहों और मस्जिदों को बर्बाद किया  गया था। इस अन्याय का कहीं कोई  हल नहीं निकला है जबकि सद्भावना यात्रा कर रहे नरेंद्र मोदी ने शान्ति स्थापित करने की अपनी कोशिश को बार बार दोहराया है। यह अलग बात है कि वे शान्ति की वकालत तो करते हैं लेकिन यह संकेत भी साफ दे देते  हैं कि अगर शान्ति चाहिए तो इंसाफ की बात न की जाए ।

                इस बीच  में 2002 के नरसंहार के दौरान मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने की कोशिश भी तेज हो गयी  है । बीजेपी के एक वर्ग में यह माना जाने लगा है कि 2014 या उसके पहले  जब भी लोकसभा  के चुनाव होंगें , बीजेपी को ही सत्ताा मिलेगी और उसके बाद नरेंद्र मोदी की ताजपोशी कर दी  जायेगी। सत्ताा की राजनीति करने वाले किसी भी व्यक्ति का यह जायज सपना है लेकिन इसमें कुछ बाधाएं भी हैं । सबसे बड़ी बाधा तो यह  है कि बीजेपी के हाथ सत्ता आने की संभावना ही बहुत कम है ।जनता के बीच कांग्रेस से नाराजगी तो है लेकिन जनता बीजेपी से भी कम नाराज नहीं है । कर्नाटक में जिस तरह से बी एस येदुरप्पा के सामने बीजेपी आला कमान लाचार  है, वह किसी से छुपा नहीं  है।  मध्य प्रदेश से भी खबर आई है कि वहां भी भ्रष्टाचार की बुलंदियां तय की जा रही हैं ।किन्हीं सूर्यवंशी को सडकों के  ठेके मनमानी के आधार पर दे दिए गए हैं  जिसके राज्य सरकार को करीब 5 हजार करोड़ रूपये का नुकसान हुआ है ।इसका मतलब यह हुआ कि भ्रष्टाचार की बहुत सारी कहानियों के बीच से गुजर रही कांग्रेस को बीजेपी वाले भ्रष्टाचार की पिच पर चुनौती नहीं दे सकते । दोनों ही बड़ी पार्टियां अपने बड़े नेताओं के भ्रष्टाचार से परेशान हैं ।इसके अलावागुजरात में ही बीजेपी की पूरी तरह से धुनाई हो रही है क्योंकि नरेंद्र मोदी के अलावाबीजेपी का गुजरात का कोई भी  नेता उनके पक्ष में नहीं है लेकिन बताते हैं कि मोदी ने कुछ पी आर एजेंसियों को अपनी छवि दुरुस्त करने के काम पर लगा रखा है जिन्होंने दिल्ली के कुछ नामी पत्रकारों की कृपा से ऐसा माहौल बना रखा है  कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के  गंभीर उम्मीदवार  हैं । बीजेपी आलाकमान में भी कुछ ऐसे लोग हैं जो एल के आडवाणी को काटने के लिए नरेंद्र मोदी के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं । हालांकि यह भी सबको मालूम है कि दिल्ली में मोदी ने  नाम को उछालने वाले खुद को भी प्रधानमंत्री पद  के लिए नरन्द्र मोदी से ज्यादा काबिल मानते हैं।

                दूरसंचार में आई क्रान्ति के चलते सच्चाई को कवर कर पाना अब पी आर एजेंसियों के लिए बहुत मुश्किल  है । कोई भी पी आर एजेंसी कुछ पत्रकारों को भरोसे में ले सकती है लेकिन सच्चाई पर पर्दा डालना बहुत बहुत मुश्किल है । इस बीच सुप्रीम कोर्ट में भी गुजरात के 2002 के पीड़ितों के लिए न्याय की गुहार के चलते समय समय पर मीडिया में कुछ न कुछ छपता ही रहता है ।

                 अपनी तरफ से नरेंद्र मोदी भी गंभीर कोशिश कर रहे हैं । लेकिन 2002 का नरसंहार और उस दौर में हुआ अन्याय उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है । वे राज्य में शान्ति की स्थापना की पूरी कोशिश कर रहे हैं लेकिन शान्ति की स्थापना की उनकी कोशिश में यह भी शामिल है कि जो लोग राज्य में  शान्ति चाहते हैं  वे इंसाफ के पैरवीकार न बनें। एडिटर्स गिल्ड की 3 मई 2002 की रिपोर्ट में लिखा है कि मोदी ने दूरदर्शन पर दिए गए अपने भाषण में यह साफ संकेत दे दिया था कि जो लोग शान्ति चाहते हैं उन्हें  इंसाफ के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिये। उन्होंने 28 फरवरी 2002 की रात दूरदर्शन के अहमदाबाद केंद्र से जो प्रसारण किया था वह उनकी भावी योजनाओं को सार्वजनिक कर देता है । यह अलग बात है कि उस दिन लोगों की समझ में वह बात  उतनी साफ नहीं हुई थी जितनी आज दस साल बात समझ में आती है । नरेंद्र मोदी ने दूरदर्शन के अहमदाबाद केंद्र से प्रसारित हुए 28 फरवरी 2002 के अपने  सन्देश में कहा था कि  मैं लोगों को यह भरोसा दिलाना चाहता हूँ कि गुजरात इस तरह की घटनाओं ( गोधरा में ट्रेन में लगी आग ) को बर्दाश्त नहीं करेगा ।अपराधियों को उनके अपराध की पूरी सजा मिलेगी। यही नहीं , हम ऐसा उदाहरण सेट कर देगें कि कोई भी अपने सपने में भी इस तरह के गंभीर अपराध को कर सकने के बारे में नहीं सोच सकेगा।  गुजरात में उनके इस बयान के बाद क्या हुआ, वह दुनिया जानती है । लेकिन यह पक्का है कि नरेंद्र मोदी अपनी बुनियादी सोच से कभी भी विचलित नहीं हुए और आज भी जब वे देश के सबसे बड़े पद  के लिए अपनी दावेदारी की बात कर रहे हैं तो भी वे देश की चौथाई आबादी के लिए उसी भाषा का इस्तेमाल  कर रहे हैं जो उनकी राजनीति की  बुनियाद  है । गुजरात के नरसंहार के बाद ही जब संपादकों की एक टीम नरेंद्र मोदी से उनेक सचिवालय के कमरे में मिली थी तो वली गुजराती के मजार की तबाही के बारे में उन्होंने कोई संतोष जनक उत्तर नहीं दिया था ।

                    एक बार फिर  सुप्रीम कोर्ट में चल रही गुजरात के पीड़ितों की न्याय की गुहार पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने नोटिस लिया है और उम्मीद की जा रही है कि वली गुजराती जैसे महात्मा के हवाले से एक बार फिर इंसाफ के पक्ष में माहौल बनेगा और नरेंद्र मोदी की वह अपील कि अगर शान्ति चाहते हो तो इंसाफ की बात करना बंद कर दो कहीं दफन हो जायेगी।

? शेष नारायण सिंह