संस्करण: 16  जुलाई-2012

क्या हिन्दुत्व आतंक के खिलाफ संघर्ष

अंधी गली में पहुंचा है?

? सुभाष गाताड़े

                दिल्ली की उच्च अदालत के पास, बम्बई, बंगलौर में बम विस्फोट हुए हैं। ऐसे बम धमाकों के चन्द घण्टों के अन्दर टीवी चैनलों ने यह समाचार दिखाना शुरू किया कि इण्डियन मुजाहिदीन,जैश ए मोहम्मद या हरकतुल-जिहाद इस्लाम ने बम विस्फोटों की जिम्मेदारी लेते हुए ई मेल भेजे हैं या एसएमएस भेजे हैं। इन कथित संगठनों के नाम हमेशा ही मुस्लिम होते हैं। अब एक ईमेल को किसी भी शरारती व्यक्ति द्वारा भेजा जा सकता है,मगर टी वी चैनलों पर इन्हें दिखा कर और अगले दिन अख़बारों में प्रकाशित करके,कोशिश यही रहती है कि देश के सभी मुसलमानों को आतंकी और बम फेंकने वाले कहा जाए ...क्या मीडिया को चाहिए कि वह जानबूझकर/गैरजानकारी में बांटो और राज करो की इस नीति का हिस्सा बने ?

                (न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) मार्कण्डेय काटजू, प्रेस कौन्सिल आफ इण्डिया के चेअरमैन, मीडियाकर्मियों के साथ बातचीत के दौरान 10 अक्तूबर 2011)

                इस किस्म की ख़बरें पहले ही टुकड़ों टुकड़ों में आ रही थीं, मगर अब दबी जुबान से यही कहा जाने लगा है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार ने अपनी पहली पारी में हिन्दुत्व आतंक के खिलाफ जो कदम उठाए थे और संघ से जुड़े आतंकी नेटवर्क का खुलासा किया था, वह सिलसिला अब अंधी गली में पहुंच रहा है।

                  हाल के समयों में कुछ मामले के अहम अभियुक्तों को मिली जमानत - क्योंकि कथित तौर पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी की उनके खिलाफ तयशुदा समय में आरोपपत्र न कर पाने की विफलता -का मामला सूर्खियों में ही था कि अब मीडिया के एक हिस्से से यह शरारतीपूर्ण ख़बर आयी है कि हिन्दुत्व आतंक का एक मास्टरमाइंड लेटनन्ट कर्नल पुरोहित ने दरअसल सेना के जासूसी विभाग (मिलिटरी इंटिलिजेन्स)जिससे वह सम्बधित था उसे अपने कार्यकलापों की जानकारी दी थी। गनीमत है कि मिलिटरी इंटिलिजेन्स की तरफ से जारी एक आधिकारिक बयान में इस बात को खारिज किया गया है, मगर इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि एक अहम अख़बार ने हिन्दुत्व के इस आतंकी की 'सफाई' छापी थी और उसे इस्लामिक आतंकियों के खिलाफ सक्रिय बताया था, उस वजह से तमाम लोगों को दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक है। प्रश्न है कि क्या यह सब प्रशासकीय लापरवाहियों का ही मामला है या प्रशासन, गुप्तचर विभाग आदि में प्रविष्ट साम्प्रदायिक तत्वों की अतिसक्रियता का परिणाम है,जो किसी भी सूरत में बहुसंख्यकवादी दहशतगर्दी पर परदा डाले रखना चाहते हैं।

                 पिछले दिनों मुंबई की विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी की अदालत ने 2008 मालेगांव बम धमाके के मामले में गिरफ्तार संघ से जुड़े आतंकी लोकेश शर्मा को जमानत दी क्योंकि कथित तौर पर जांच एजेंसी उसके खिलाफ 90 दिनों के अन्दर चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी थी। याद रहे कि जांच एजेंसी ने लोकेश को इस साल की शुरूआत में पंचकुला अदालत से गिरफ्तार किया था जहां वह समझौता एक्स्प्रेस बम धमाके के मामले में न्यायिक हिरासत में था। हमें नहीं भूलना चाहिए कि लोकेश शर्मा,जो हिन्दुत्व आतंक का एक मास्टरमाइंड राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक सुनिल जोशी का करीबी सहयोगी था, उस पर यह आरोप है कि समझौता एक्स्प्रेस में उसी ने बम रखवाया। लोकेश शर्मा को जून के प्रथम सप्ताह में मिली जमानत के महज पांच दिन पहले हैद्राबाद की अदालत ने भरत रतेश्वर को,जो मक्का मस्जिद बम धमाके का आरोपी था,उसे इस आधार पर जमानत दी कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी उसके खिलाफ आरोपपत्र पेश नहीं कर सकी।

                हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकेश शर्मा या भरत को मिली जमानत को अपवाद नहीं कहा जा सकता, इसके पहले मालेगांव बम धमाके में गिरफ्तार -शाम साहू,शिव नारायण कलासांगरा और अजय राहिरकर को - अदालतें जमानत दे चुकी हैं। कानून के कुछ जानकारों का तो यहां तक मानना है कि अगर सत्वर कदम नहीं उठाए गए तो यह मुमकिन है कि इन केसों में गिरफ्तार अन्य कई लोग जमानत पर छूट सकते हैं। वैसे राष्ट्रीय जांच एजेंसी इस काम को किस लापरवाही से चला रही है, यह बात इन्द्रेश कुमार के उदाहरण से जाहिर होती है।

                 बहुत कम लोग आज इस बात को मानेंगे कि एक समय था - बमुश्किल चन्द माह पहले - जब ख़बरें आ रही थीं कि भारत में बहुसंख्यकवादी राजनीति के सबसे आपराधिक एवं हत्यारे चरण में -जिसे आम बोलचाल की भाषा में हिन्दुत्व आतंक कहा जाता है -अपनी कथित संलिप्तता के चलते उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों के कई सारे कार्यकर्ता जो आतंकी कार्रवाइयों में अपनी भूमिका के चलते इन दिनों सलाखों के पीछे हैं उन्होंने जांच एजेंसियों के साथ यह बात साझा की थी कि इन कार्रवाइयों के विभिन्न चरणों में उन्होंने कथित तौर पर इन्द्रेश कुमार से सम्पर्क रखा था या  उन्हें उसी के जरिए निर्देश मिले थे या इन आतंकी कारनामों के लिए धन जुटाने का काम कथित तौर पर उन्होंने ही किया था।

                 अलग अलग अख़बारों एवं मीडिया चैनलों में उन दिनों प्रकाशित रिपोर्टों में इस बात का संकेत मिल सकता है कि किस किस्म का भविष्य इन्द्रेश कुमार का इन्तजार कर रहा था। ''मस्जिद ब्लास्ट हीट ऑन आर एस एस टॉप मैन'' अर्थात मस्जिद धमाकों की आंच संघ के वरिष्ठ नेता की ओर (मेल टुडे, 23 दिसम्बर 2010), 'सी बी आई ग्रिल्स इन्द्रेश एण्ड काल्स हिज ब्लफ' अर्थात सीबीआई द्वारा इन्द्रेश कुमार से पूछताछ और उसके दावे खारिज (मेल टुडे, 24 दिसम्बर 2010), 'इन्द्रेश कुमार के पूछताछ से संघ की धडकन तेज' ( भास्कर, 24 दिसम्बर 2010) आदि। विगत साल अपनी एक रिपोर्ट में 'सियासत' ने इन्द्रेश कुमार को 'आतंकी हमलों का सरगना' कहा था। (10 फरवरी, 2011 www.siasat.com) उसने लिखा था। अब यह सब बीत चुका है !

                आज न ही जांच एजेंसियां इन्द्रेश कुमार से आगे पूछताछ करना चाह रही हैं और न ही केन्द्र में सत्तासीन पार्टी जांच को अपनी तार्किक परिणति तक ले जाना चाहती है भले ही बुरारी में आयोजित अपने अधिवेशन (2010)में कांग्रेस पार्टी ने यह राजनीतिक प्रस्ताव पारित किया हो कि वह 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कथित आतंकी रिश्तों की पूरी जांच करवाएगी।'

                  एक तरफ हिन्दुत्व आतंक के आरोपियों की एक के बाद एक जमानत और दूसरी तरफ इनसे जुड़े अतिवादी तत्वों की आतंकी तैयारियों की आहट दोनों साथ सुनाई दे रही है। उडुपी जिले से पिछले दिनों ख़बर थी (द हिन्दू, 10 मई 2012, एक्स्प्लोसिव्ज सिजड नियर ब्रह्मावर) कि 'पुलिस ने गणेश प्रसाद नामक व्यक्ति से, जो शिरियार ग्राम का रहनेवाला है उसके कार से 16 जिलेटिन स्टिक्स, छह विस्फोटक और एक किलोग्राम गनपावडर बरामद किया। जब येथाडी नामक स्थान पर पुलिस ने उसे गिरतार किया तब वह बिना परमिटवाली गाड़ी में इन विस्फोटकों को ले जा रहा था, जिसकी कुल कीमत 75,000 रूपए बतायी गयी है। ' एक अन्य वेबसाइट में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक 'गिरतार आतंकी गणेश प्रसाद एक हिन्दुत्ववादी संगठन का कार्यकर्ता' है।

                  हिन्दुत्व आतंक के अधिकतर मामलों में यही देखा जाता है, प्यादे पकड़े जाते हैं, मगर असली मास्टरमाइंड, योजना बनानेवालों को कोई छू नहीं पाता। उडुपी जिले के इस घटनाक्रम के बारे में इस बात की पड़ताल करना समीचीन होगा कि कौन हैं वे लोग जिन्होंने गणेश प्रसाद को इतने सारे विस्फोटकों,बम बनाने की सामग्री के साथ भेजा था। क्या किसी लम्बे संघर्ष की तैयारी चल रही है ताकि जब माहौल शान्त हो जाए तो उसी किस्म की आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जाए जिसके लिए हिन्दुत्व के आतंकी चर्चित रहे हैं।

                  मगर आतंक फैलाने का यही एकमात्रा तरीका नहीं है, अपने 'दुश्मनों' के प्रार्थनास्थल को अपवित्रा करके भी इसे अंजाम दिया जा सकता है। वैसे आंधा्र प्रदेश की राजधानी में पनपे साम्प्रदायिक तनाव के इस मामले के एक पहलू पर अधिाक बात नहीं हो सकी है कि मदनापेट मन्दिर अपवित्रीकरण की जिस घटना ने तनाव को जनम दिया था, उसके पीछे हिन्दू अतिवादियों के हाथ होने के पुलिस पास मजबूत प्रमाण हैं। अग्रणी अंग्रेजी अख़बार (Saffron extremists desecrated temple to trigger riots: Cops, टाईम्स आफ इण्डिया, 14 अप्रैल 2012) की रिपोर्ट के मुताबिक 'केसरियां अतिवादियों ने मन्दिर को अपवित्र करके दंगे को भड़काने' की कोशिश की। रिपोर्ट के मुताबिक शहर की पुलिस हिन्दू समुदाय से सम्बध्द उन चार युवकों की तलाश कर रही है जिन्होंने मदनापेट के हनुमान मन्दिर की दीवार पर निषिध्द सामग्री फेंक कर माहौल को बिगाड़ा था। यह चारों युवक कूर्मागुड़ा इलाके के ही रहनेवाले हैं। बाद में इन चारों युवकों को गिरफ्तार भी किया गया। जांच में मुब्तिला एक अधिकारी ने सम्वाददाता को यह भी बताया कि अब असली चुनौती उन षडयंत्रकर्ताओं तक पहुंचने की है जिन्होंने इस काम को अंजाम दिलवाया।

                   अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब भाजपाशासित कर्नाटक के बिजापुर जिले के सिन्दगी तहसील पर नए साल के अवसर पर पाकिस्तानी झण्डा फहराने एवं साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ाने के आरोप में चन्द हिन्दू आतंकवादी गिरफ्तार हो चुके हैं। दरअसल 1 जनवरी की सुबह जब लोग घरों से निकले तब यह ख़बर कानोंकान पहुंच चूकी थी कि तहसील कार्यालय पर पाकिस्तानी झण्डा फहराया गया है। इसके पहले कि लोग घटना की बारीकियों पर गौर करते, देखते ही देखते हिन्दुत्ववादी संगठनों के कार्यकर्ता सड़कों पर थे और पूरे इलाके में तनाव की स्थिति बनी थी। दो दिन के अन्दर ही पूरी घटना से परदा उठ गया। पुलिस ने असली आतंकियों को हिरासत में लिया और उन्हें मीडिया के सामने पेश किया। मुंह पर काला टोप डाले इन आतंकियों के चेहरे से नकाब हटा तो मीडिया वाले कुछ देर के लिए भौचक से रह गए। इसमें वही लोग शामिल थे,जो विरोध प्रदर्शनों की अगुआई कर रहे थे। श्रीराम सेना से सम्बध्द कहे जानेवाले अनिलकुमार सोलनकर,अरूण बाघमोरे की अगुआईवाले इस आतंकी मोडयूल के चार अन्य सदस्यों को मीडिया के सामने पेश करते हुए पुलिस अधीक्षक डी सी राजप्पा ने उपपुलिस अधीक्षक एस पी मुत्थुराज के नेतृत्व में बनी पुलिस इन्स्पेक्टर सिध्देश्वर,चिदम्बर और बाबागौड़ा पाटील की जांच टीम से भी पत्रकारों को मिलाया।

                  आतंकवाद फिर चाहे उसे राज्य की दमनात्मक मशीनरी अंजाम दे या गैरराज्य कारकों की तरफ से अंजाम दिया जाए, चाहे बहुसंख्यक समुदाय के लोग अंजाम दें या अल्पसंख्यक समुदाय के लोग, यह समझने की जरूरत है कि सभी मामलों में मासूमो का ही खून बहता है। विडम्बना यही कही जा सकती है कि इक्कीसवीं सदी में ऐसे संगठन,जमातें आज भी मौजूद हैं जो आज भी ऐसी ही नापाक हिंसा को अख्तियार किए हुए हैं,किसी का नाम अभिनव भारत है श्रीराम सेना है तो किसी का नाम अल कायदा, लश्कर ए तोइबा है।

                   क्या यूपीए के कर्णधार इस बात पर गौर करेंगे कि वह हिन्दुत्व आतंक के प्रति नरम रवैया अख्तियार कर इस मुल्क में सेक्युलर डेमोक्रेसी की जड़े कमजोर कर रहे हैं ?

   ? सुभाष गाताड़े