संस्करण: 16  जुलाई-2012

भाजपा की बलिहारी-

इधर अडवाणी कर रहे मोदी का बचाव

उधर कोस रहे हैं केशुभाई !

?  राजेन्द्र जोशी

                जब-गजब है भारतीय जनता पार्टी की बलिहारी। पार्टी के भीतर एक दूसरे को निशाना बनाकर खूब तीर छोडे ज़ा रहे हैं। भाजपा शासित एक प्रदेश कर्नाटक में तो भाजपा के अंदरूनी कलह का हश्र सामने आ ही गया। पूर्व मुख्यमंत्री येदियूरप्पा के दबाव में आकर भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को झुकना पड़ा और मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को पद से हटाकर येदि के चहेते जगदीश शेट्टार को नया मुख्यमंत्री बनाने की घोषणाएं करना पड़ गई। इधर भाजपा शासित दूसरे प्रदेश गुजरात में कलह का एक ऐसा दौर शुरू हो चुका है जो थमने का नाम नहीं ले रहा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता केशुभाई पटेल और नरेन्द्र मोदी के बीच का घमासान किसी से छुपा नहीं है।

               केशुभाई और नरेन्द्र मोदी के बीच की खाई को पाटने में राष्ट्रीय नेतृत्व भी अभी तक तो असमर्थ ओर अक्षम सिध्द हो रहा है। जहां एक ओर भाजपा आलाकमान के कतिपय नेता और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ नरेन्द्र मोदी की काबलियत पर इतने ज्यादा प्रभावित है कि वे मोदी को देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने का सपना देखने लगे हैं। एक तरफ दुनिया के सामने नरेन्द्र मोदी की छवि एक साम्प्रदायिक नेता के रूप में फैल चुकी है। अमेरिका तो मोदी को अपने देश की यात्रा के लिए वीजा देने को तैयार नहीं है। इंग्लैंड की ओर से भी मोदी को वीजा देने में आनाकानी करने के समाचार छप चुके हैं। दूसरी तरफ इस तरह के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादित नेता को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने की वकालत की जा रही है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम की छपकर आने वाली किताब में गुजरात दंगे के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी के संदर्भ में जो बाते उजागर हुई है उसने भी तूल पकड़ लिया है।

                गुजरात दंगों के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलजी ने गुजरात के दंगाग्रस्त इलाकों का दौरा किया था। उस वक्त एक बड़े नरसंहार पर जिस तरह की अपने मन की भावना को उन्होंने प्रकट किया था,उसे देश अभी भूला नहीं है। डॉ.कलाम भी अपने उत्तरदायित्वों के प्रति जागरूक थे। उन्होंने भी गुजरात जाकर वहां के हालात देखे थे। सारी दुनिया की नज़र में गुजरात एक साम्प्रदायिक स्टेट के रूप में प्रचारित हुआ था। वर्तमान में भी गुजरात स्टेट अपने उस साम्प्रदायिकता के दाग छुड़ाने में नाकामयाब रहा है। डॉ.कलाम की 'टर्निंग पाइंट'पुस्तक पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण अडवाणी ने नरेन्द्र मोदी की तरफदारी करते हुए जिस तरह और जिन शब्दों में उनका बचाव किया है उससे यह सवाल उठ रहा है कि अडवानीजी द्वारा बचाव के नाम पर फेंका गया पैतरा किसी भावी राजनीति का संकेत तो नहीं है। अडवाणी कहते हैं कि 'मोदी को बदनाम करने की यह एक साजिश है। इस तरह की बदनामी किसी अन्य नेता की नहीं की गई।

                  श्री अडवाणी द्वारा मोदी की बदनामी करने का यह आरोप जाहिर है कि मीडिया पर लगाया गया है। शायद अडवाणीजी को यह तकलीफ हुई कि किसी अन्य नेता की इस तरह से बदनामी नहीं हुई है। उनके इस कथन पर यह सवाल उठाया जा सकता है कि क्या मोदी के अलावा किसी अन्य नेता पर साम्प्रदायिकता का इस तरह का आरोप लगा है क्या ? जब जब भी किसी संदर्भ में गुजरात दंगों का उल्लेख होगा, स्वाभाविक है कि दंगे के समय के राज्य-प्रमुख का नाम तो उछलेगा ही। कलाम साहब ने भी उनकी नज़रों के सामने जो कुछ हुआ उसका जिक्र ही तो किया है।

                 अडवाणी जी द्वारा नरेन्द्र मोदी के बचाव करने का यह मुद्दा ऐसे वक्त पर उठा है जब एन.डी.ए. के अगले प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी का नाम चर्चाओं में है। नरेन्द्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में उछल जाने से अडवाणी जी के उन सपनों का क्या होगा जिसे वे पिछले एक दशक से संजोये हुए है ?लगता है अडवाणी जी का मोदी के 'बचाव' का यह एक हथकंडा मात्र है। इस 'बचाव' के प्रचार के पीछे अडवाणी जी गुजरात की साम्प्रदायिकता के जख्म को हरा ही रखना चाहते हैं ताकि मोदी की साम्प्रदायिक छवि वैसी की वैसी ही बनी रहे और गुजरात के नेताओं में आडवाणी जी अग्रगण्य बने रहें। यदि मोदी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी में सफल हो जाते हैं तो गुजरात के नेताओं में आडवाणी का रंग तो फीका ही पड़ जायगा। उधर एन.डी.ए. के घटकों में भी मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर जुटता नहीं है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मोदी को पहले ही साम्प्रदायिक नेता का खिलाब दे चुके हैं।

                  इधर गुजरात के केशुभाई पटेल को मोदी फूटी आंख सुहा रहे हैं। केशुभाई का कहना है कि झूठ बोलने में मोदी को महारत हासिल है। राजनैतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में बोले गये मोदी के झूठों का उदाहरण देते हुए केशुभाई खुलेआम कहते हैं कि मोदी के राज में गुजरात में लोगों में भय व्याप्त है। तिकड़मों से,साजिशों से या षड़यंत्रों के जरिए भारतीय जनता पार्टी जिन जिन राज्यों में सत्ता में है,वहां के अंदरूनी हालात ठीक नहीं है। येदियूरप्पा और केशुभाई जैसे लोग प्राय:सभी प्रांतों में हैं जो भाजपा की सत्ताओं को आइना दिखाते-रहते हैं। राज्यों में भाजपा की अंदरूनी कलहों में राष्ट्रीय नेतृत्व भी बंटा हुआ नज़र आता है। राजस्थान में वसुंधरा के तेवरों ने भी राष्ट्रीय नेतृत्व की कड़ी परीक्षा ली है। राज्यों में भाजपा के भीतरी विवादों और सत्ता-संगठनों के बीच के द्वंद्व मीडिया के जरिए अक्सर ही सामने आते रहते हैं किंतु राष्ट्रीय नेतृत्व में नेताओं के बीच की खटास भी मीडिया से छुप नहीं पा रही है। राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के मुद्दों पर भी भाजपा के भीतर मतभिन्नता उजागर हो ही चुकी है। राज्यों के भीतर जहां-जहां भाजपा सत्ता में है वहां सत्ता-संगठन के बीच तलवारे खींची ही रहती है। हिमाचल प्रदेश का भाजपा कलह भी अब तो सतह पर आ चुका है। मुख्यमंत्री प्रेमकुमाल धूमल और श्री शांताकुमार के बीच का दंगल भी अब तो सर्वविदित है। झूठ फरेब और धोखा देने के मामलों में विख्यात भाजपा की अपनी एक अलग ही बलिहारी है।

? राजेन्द्र जोशी