संस्करण: 16  जुलाई-2012

आडवानी जी, मीडिया समेत

सभी के साथ अन्याय किया है मोदी ने

? एल.एस.हरदेनिया

                 भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की यह शिकायत है कि मीडिया ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ न्याय नहीं किया है। उनका यह भी दावा है कि इतिहास में जितना अन्याय मोदी के साथ हुआ है उतना किसी ओर राजनेता के साथ नहीं हुआ है। यह आरोप लगाने के पहले आडवाणी जी को कुछ होमवर्क कर लेना था। यदि वे ऐसा करते तो उन्हें यह पता चल जाता कि जितना अन्याय स्वयं मोदी ने मीडिया के साथ किया है शायद उतना किसी और राजनीतिज्ञ ने भारत के प्रजातांत्रिक इतिहास  नहीं किया होगा।

                 मोदी उन मुख्यमंत्रियों में से हैं जिन्होंने पत्रकारों पर देशद्रोह का मुकदमा चलवाया। मोदी ने ऐसा शायद इसलिए किया क्योंकि वे समझते हैं कि उनका विरोध करना या उनके विरूध्द लिखना देशद्रोह है। शायद आडवाणी को ज्ञात होगा कि मोदी ने टाइम्स आफ इंडिया के अहमदाबाद संस्करण के संपादक भरत देसाई के विरूध्द देशद्रोह का मामला बनवाया था। इसी तरह राहुल सिंह,जो एक चैनल के लिये काम करता था,उसके विरूध्द भी देशद्रोह का मामला चलवाया था। कम्यूनिल्जम काम्बेट की संपादक तीस्ता सीतलवाड के विरूध्द एक नहीं अनेक मुकदमे चलवाये-सिर्फ इसलिए कि तीस्ता ने साम्प्रदायिक आग में झुलसे लोगों की मदद की। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि जो समाचार पत्र मोदी की प्रशंसा करते हैं उनको वे छप्पर फाड़ के देते हैं और जो उनकी आलोचना करते है उन्हें दंडित करते हैं। यह सर्वविदित है कि उन्हांने ''संदेश''और ''गुजरात समाचार''जैसे अखबारों,जो झूठी खबरें छाप कर साम्प्रदायिक हिंसा भड़का रहे थे की प्रशंसा की और उनकी तारीफ करते हुये पत्र भी लिखे। यही रवैया टीवी चैनलों के प्रति भीहै। मोदी को अपनर आलोचना कतई पसंद नहीं है इसलिए शायद अभी तक उन्होंने एक भी औपचारिक पत्रकार वार्ता आयोजित नहीं की। उनका असहिष्णु स्वभाव उस समय खुलकर सामने आया था जब उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार करन थापर के कार्यक्रम ''डेविल्स एडवोकेट'' का बहिष्कार कर दिया था। उन्हें थापर का यह प्रश्न पसंद नहीं आया था कि क्या आप सन् 2002 के दंगों के लिए खेद प्रगट करना चाहेंगे। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे यह सिध्द किया जा सकता है कि मीडिया ने नहीं, स्वयं मोदी ने मीडिया के साथ अन्याय किया। 

                  मीडिया के अलावा मोदी ने किसका अपमान नहीं किया है। दंगों के लिए अभी तक उन्होंने एक बार भी अपना उत्तरदायित्व स्वीकार करना तो दूर, दंगों के लिए और दंगा पीड़ितों के प्रति क्षमा भाव दिखलाते हुए एक शब्द भी नहीं कहा है। उल्टे मोदी ने दंगा पीड़ितों का सदा ही मजाक उड़ाया और उनके बारे में अशोभनीय टिप्पणियां की हैं। जैसे दंगा पीड़ितों के लिए बनाये गये कैम्पों को बच्चा पैदा करने वाला केन्द्र बताया था। इसके साथ ही वे हमेशा मुस्लिमों का ''हम पाँच हमारे पचास''कहकर मखौल उड़ाया करते हैं। उपर्युक्त दोनों टिप्पणियों ने मुसलमानों के जले पर नमक का काम किया।

                 आडवाणी जी को स्मरण रखना चाहिए कि सन् 2002 में हुये दंगों के कारण और बाद में उनके द्वारा अपनाये गये रवैये के कारण पूरे देश को उस समय अपमान का घूँट पीना पड़ा जब अमरीका ने मोदी को वीजा देने से इंकार कर दिया। क्या वीजा के इंकार संबंधी खबर छापकर मीडिया ने मोदी का अपमान किया है? आखिर दुनिया के किसी भी प्रजातांत्रिक देश के नेता का ऐसा अपमान किसी और देश ने नहीं किया होगा जितना मोदी का हुआ। क्या हमारे देश के किसी राज्य के मुख्यमंत्री का अपमान देश का अपमान नहीं है? ऐसा क्यों हुआ क्या उस पर स्वयं मोदी और आडवाणी को चिंतन की आवश्यकता नहीं है?

                  मोदी द्वारा किये अन्यायों की सूची बहुत लंबी है, और उनके द्वारा किये गये अन्याय इतने गंभीर हैं कि कोई भी मीडिया यदि उन्हें उजागर करने से कतराती है, तो ऐसा करने से मीडिया की ही ही  बदनामी होगी। गोधरा में 56 अभागे लोग मोदी की लापरवाही से मारे गये। यदि मोदी की पुलिस चौकन्नी और मुस्तैद रहती तो मेरी राय में गोधरा कांड नहीं होता। बताया गया है कि जिस समय एस-6कोच में आग लगायी गई थी उस समय सैकड़ों की संख्या में स्टेशन पर पुलिस मौजूद थी पर उसने मौन दर्शक की भूमिका निभाई। कोच में लगी आग से 56लोग मारे गये। उसके बाद जो हुआ वह शायद इसके पहले कभी नहीं हुआ होगा। किसी भी धर्म में मृत्यु के बाद जल्दी से जल्दी शव का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान से किया जाता है। अंतिम संस्कार में देरी से शव सड़ भी सकता है परंतु मोदी ने ऐसा नहीं होने दिया। 56 शवों के सहारे उन्होंने अत्यधिक घिनौनी राजनीति की। शवों को उनके रिश्तेदारों को सौंपने के स्थान पर उन्हें अहमदाबाद ले जाने का फैसला किया गया। जिस जगह से ये शव गुजरे उन्हें देखकर लोगों का आक्रोशित होना स्वाभाविक था। चूँकि उस समय तक प्रचारित हो चुका था कि कोच में मुसलमानों ने आग लगाई है इसलिए आक्रोश मुसलमानों के विरूध्द हो गया। उसके बाद जो हुआ वह अब इतिहास का हिस्सा है। वीभत्स दृश्य की इस खबर को छापकर या प्रसारित कर मीडिया ने मोदी के विरूध्द अन्याय किया है? यदि इसके बावजूद आडवाणी मानते हैं कि मीडिया ने मोदी के साथ अन्याय किया है तो उनकी ''नादानी'' पर दया ही की जा सकती है।

                क्या यह अपने आप में बड़ी खबर नहीं है कि दंगों में जिन पुलिस अधिकारियों के विरूध्द लापरवाही या दंगाईयों का साथ देने का आरोप लगा था,उन्हें मोदी ने पुरस्कृत किया और उन पुलिसकर्मियों को दंडित करने और परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जिन्होंने अपने संवैधानिक और कानूनी कर्तव्यों को निभाया,दंगाईयों पर नियंत्रण पाया और दंगा पीडितों की मदद की। यदि मीडिया ने इस महत्वपूर्ण खबर को छापा तो मैं नहीं समझता कि मीडिया ने मोदी के विरूध्द अन्याय किया। मोदी ने अनेक ऐसे कृत्य किये हैं जिन्हें मजबूर होकर मीडिया को छापना पड़ा। इस तरह के कृत्यों में वह बैठक भी शामिल है जो गोधारा की घटना के बाद मोदी ने अपने सरकारी निवास स्थान पर आयोजित की थी और जिस बैठक में अधिकारियों से यह कहा गया था कि वे अगले 72 घंटों तक हिन्दुओं को अपना आक्रोश प्रगट करने दें और जो कुछ होगा उसके वे मौन दर्शक बने रहें। यही कारण है कि तीन दिन तक दंगाई नंगा नाच करते रहे और पुलिस ने वह सब कुछ होने दिया जो शायद हमारे देश में पहले कभी नहीं हुआ। बाद मे संजीव भट्ट ने भी दावा किया कि ऐसी बैठक हुई थी। इस ''धृष्टता'' के लिए मोदी ने संजीव भट्ट को दंडित किया। क्या इतनी सनसनीखेज खबर छापकर मीडिया ने मोदी के विरूध्द अन्याय किया? क्या सरकारी अधिकारी-कर्मचारी को यह सलाह देना कि वे अपना कर्तव्य न करें, संविधान का उल्लंघन नहीं है? क्या ऐसी खबर छापकर मीडिया ने मोदी के साथ अन्याय किया?

                 फिर मोदी के विरूध्द ''अन्यायपूर्ण'' खबरे छापने का अवसर भाजपा एक वर्ग ही देता है। जैसे गुजरात के एक मंत्री हरेन  पंडया की हत्या हुई तो उनके ही पिता ने आरोप लगाया कि उनके बेटे की हत्या में मोदी का हाथ है। मोदी के विरूध्द ''अन्यायपूर्ण'' खबरे छापने का अवसर मीडिया को उस समय एक बार फिर मिला जब केशू भाई पटेल सहित भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने यह आरोप लगाया कि मोदी तानाशाह हैं। उन्होंने कहा कि यदि मोदी अपना तानाशाहीपूर्ण रवैया नहीं सुधारते हैं तो उन्हें पार्टी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा।

                मोदी के विरूध्द ''अन्यायपूर्ण खबरें'' छापने का एक और अवसर मीडिया को उस समय मिला जब मोदी के हठवादी रवैये के कारण भाजपा अध्यक्ष नितिन गड़करी को संजय जोशी का अपमान करना पड़ा। मीडिया को मोदी के विरूध्द ''अन्यायपूर्ण''खबरें छापने का मौका उस समय पुन:मिला जब मोदी के विरूध्द ढेर सारे पोस्टर दिल्ली, अहमदाबाद आदि स्थानों पर चिपकाये गये। परंतु आडवाणी यह भूल गये कि मोदी को संभावित प्रधानमंत्री का सपना मीडिया ने ही दिखाया। इस बात में कोई शक नहीं कि मीडिया ने मोदी के विरूध्द उस समय फिर अन्याय किया जब उसने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की टिप्पणी प्रकाशित और प्रसारित की कि सेक्यूलर व्यक्ति ही भारत का प्रधानमंत्री हो सकता है। आडवाणी इस बात को भी न भूलें कि मीडिया देश के कुछ उद्योगपतियों के बयान छापे जब उन्होंने मोदी को प्रधानमंत्री के पद के लिये उपयुक्त माना। कुल मिलाकर मीडिया ने खुद होकर न तो मोदी के पक्ष में और न विरोधा में कुछ छापा है। उसने वही छापा या प्रसारित किया जो कहा गया- मोदी के समर्थकों द्वारा या उनके आलोचकों द्वारा। फिर आडवाणी जी को यह तो ज्ञात ही होगा कि अपनी छवि संवारने के लिए मोदी ने एक विदेशी कंपनी को ठेका दिया है। इसके बावजूद यदि मोदी के खिलाफ खबरें छपती हैं तो इसके लिए मोदी जिम्मेदार हैं न कि मीडिया।

? एल.एस.हरदेनिया