संस्करण: 16  जुलाई-2012

सरकार के खिलाफ

शब्दाडंबर और षडयंत्र..?

? विवेकानंद

                 कुछ समय पहले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि डालर के मुकाबले रुपए का गिरना स्वाभाविक नहीं बल्कि एक साजिश का हिस्सा है। आशय यह था कि सरकार विदेशों खासकर अमेरिकी कंपनियों को लाभ दिलाने के लिए जानबूझकर रुपए को रसातल में लिए जा रही है। पता नहीं मोदी के किन मुखबिरों ने ऐसी सूचना दी या संदेह व्यक्त किया, इनकी सत्यता कितनी प्रमाणिक है, क्योंकि इसके समर्थन में न तो उन्होंने कोई तथ्य दिया और न ही कोई उदाहरण है। लेकिन क्रिया की प्रतिक्रिया के सिध्दांत, जिसे मोदी से बेहतर कोई और नहीं जानता के, परिणामस्वरूप जो संदेह पैदा हुआ है उसमें न केवल तथ्य मौजूद हैं बल्कि अनेकों ऐसी घटनाएं हैं जो इस संदेह को पुख्ता करती हैं कि 8 साल से सत्ता के लिए छटपटा रही भारतीय जनता पार्टी सरकार को अस्थिर करने के लिए विदेशों से मिलकर साजिशों का जाल बुन रही है। इस अहसास को बला-ए-ताक पर रखकर कि इससे न केवल देश की बदनामी होगी बल्कि दुनिया में यह संदेश जाएगा कि हिंदुस्तान से जयचंदों की नस्ल अभी खत्म नहीं हुई है। मैं यह कतई नहीं कहता कि ऐसा ही है, बल्कि चाहता हूं कि यह संदेह, संदेह ही रहे, लेकिन जो घटनाएं हैं और तथ्य हैं, वे इस बात पर उसी तरह संदेह करने को मजबूर करते हैं, जैसे कि नरेंद्र मोदी को रुपया जानबूझकर गिराने का संदेह हुआ।

                 कहते हैं कई घटनाएं मिलकर एक परिणाम को जन्म देती हैं। ध्यान दीजिए...अब से दो साल पहले तक भाजपा विपक्ष में असहाय और लाचार अवस्था में दिखाई देती थी। लेकिन परमाणु बिल के पास होने और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की भारत यात्रा के बाद से लगातार परिदृश्य बदलते चले गए। अगस्त 2010 में एक शब्द 'मंशा' हटाने के बाद परमाणु बिल पास होता है, जिसकी अमेरिकी मीडिया में जमकर तारीफ होती है, और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जीत करार दी जाती है। लेकिन अमेरिकी कंपनियां इस बिल से कतई खुश नहीं हैं। अमेरिकी निजाम यह सब जानता है बावजूद इसके उसे हथियारों का बड़ा सौदा होने की उम्मीद है, इसी गरज से नवंबर 2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा भारत आते हैं। उन्हें बहुत कुछ भारत से मिलता है, लेकिन हथियारों का वह सौदा नहीं मिलता जिसका बड़े दिनों से अमेरिकी हथियार निर्माता कंपनियों को इंतजार होता है। भरभराती अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डूबते बैंकों के बीच अमेरिका के लिए यह बडा झटका होता है। इसके बाद जो शुरू हुआ उससे संदेह होता है कि यही वो वक्त था जबसे यूपीए सरकार के खिलाफ दुरभि संधियों और षडयंत्रों का साज-ओ-सामन एकत्रित होना शुरू हुआ था।

                मुझे संदेह है कि भारत से सीधे टकराव लेने की बजाए अमेरिका, सत्ता के लिए लालायित विपक्ष और पैसों से बिकने वाले लोगों को खरीदना शुरू कर देता है। भाजपा नेता जो हमेशा भारत सरकारों पर अमेरिकी पिछलग्गू और उससे दबने का आरोप लगाते रहते थे, अचानक अमेरिका का गुणगान करने लगते हैं। नवंबर 2010 में अरुण जेटली कहते हैं भाजपा कभी अमेरिका विरोधी मुहिम का हिस्सा नहीं रही है। भाजपा ने तो शीतयुध्द के जमाने में भी अमेरिका का विरोध नहीं किया था। यह बयान शीतयुध्द के उस घृणितकार्य की प्रशंसा थी,जिसमें अमेरिका ने मुस्लिम विरोधी हिंसा में द्वितीय विश्वयुध्द की यहुदीविरोधी घृणा को भी पीछे छोड़ दिया था। चीन,जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को फूटी आंख नहीं सुहाता, भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी वहां जनवरी 2011 में 5 दिन की सद्भावना यात्रा पर निकल जाते हैं। भाजपा नेता अर्थिक विकास और विदेश नीति पर महत्वपूर्ण अमेरिकी सांसदों से मुलाकात करके अपना का नजरिया बताती है और अरुण जेटली जून 2011 में अमेरिका जाते हैं, जहां अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में उनकी शान में कसीदे पढ़े जाते हैं। और फिर अचानक चीन और अमेरिका दोनों एक साथ सितंबर 2011 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को विकासपुरुष करार देते हैं। वो अमेरिका जिसको मोदी का अपनी धरती पर पैर रखना भी गंवारा नहीं है, वहीं उनका महिमा मंडन करने लगता है। ओबामा की भारत यात्रा और गडकरी की चीन यात्र से लेकर दोनों मुल्कों द्वारा मोदी की प्रशंसा तक जो हो रहा है क्या उससे यह संदेह नहीं किया जा सकता कि भाजपा नेताओं ने दोनों मुल्कों की मुराद पूरी करने की एवज में मोदी और भाजपा के महिमा मंडन का सौदा किया हो सकता है? और बात केवल यहीं नहीं रुकती,क्योंकि यह तो एक पार्टी या एक व्यक्ति का समर्थन है। आम आदमी इसे खारिज भी कर सकता है, इसलिए तैयारी है चौतरफे हमले की। सबसे बड़ा मुद्दा है भ्रष्टाचार है, चूंकि भाजपा शासित रायों में भी भ्रष्टाचार है, यदि भाजपा भ्रष्टाचार के खिलाफ झंडा बुलंद करती है तो जनता उसे नकार देगी। इसलिए ऐसा प्रयास क्यों न हो की कोई जनता के बीच का ही ऐसा आदमी, जिसकी आम लोगों में व्यापक अपील हो, ईमानदार चेहरा हो, उसे बरगला कर सरकार के विरोध खासतौर पर कांग्रेस के विरोध में उतार दिया जाए? और यही हुआ। जून 2011 में अचानक एक सख्श प्रकट होता है और चंद रोज में दुनियाभर में छा जाता है। मीडिया उसे छोटा गांधी करार देता है। इस महंगाई के दौर में जहां आदमी को खाने के लाले पड़ रहे हैं अन्ना हजारे लोकपाल को लेकर लाखों रुपए खर्च करके आंदोलन चलाते हैं और ऐसी शर्तें रखते हैं, जो किसी भी सरकार के लिए पूरी करना नामुमकिन हैं। शब्दाडंबरों से एक ऐसी तस्वीर बनाई जाती है मानो पूरा देश वही कहता हो जो केवल चार लोग चिल्ला रहे हैं। कमाल देखिए जो भी इस हकीकत को खोलने का प्रयास करता है उसे खलनायक घोषित कर दिया जाता है। दिखाने के लिए यह धन चंदे से एकत्रित किया जा रहा है,लेकिन वास्तव में यह धन अमेरिकी संस्थान दे रहे हैं। टीम अन्ना के सदस्य मनीष सिसोदिया की संस्था कबीर को दो लाख डालर का दान फोर्ड फाउंडेशन नाम की अमेरिकी संस्था ने दिया है। यह बात अकेला मैं नहीं कह रहा है कभी अरविंद केजरीवाल के साथ काम करने वाले लोग भी कह चुके हैं। अमेरिका की कुख्यात संस्था सीआईए अमेरिकी हितों की रक्षा के लिये विदेशों में काम करती है। मुख्य रूप से सीआईए किसी भी देश की सरकार को अमेरिका का पक्षधर बनाये रखने का कार्य करती है और जो सरकारें ऐसा नहीं करतीं, वहां की सरकार को अस्थिर करने का षडयंत्र भी रचती है। लोगों को याद होगा कि जब भारत में अन्ना हजारे अनशन पर बैठे थे, उस समय ब्राजील, चीन, फ्रांस आदि में भी इसी तरह के आंदोलन चल रहे थे। क्योंकि यही देश हैं, जिन्होंने यूरोप और अमेरिका की आर्थिक शक्ति को चुनौती दे रखी है। इसलिए आशंका है कि सीआईए की मदद से यह आंदोलन चल रहे थे। यह संस्था संबंधित देशों के मंत्रियों से लेकर सांसद, सामाजसेवी, अधिकारी और विपक्षी दलों को अप्रत्यक्ष तरीके से मदद पहुचाती है, ताकी वक्त पर अमेरिकी हितों की रक्षा हो सके। यदि वास्तव में अमेरिका का अन्ना के आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं था तो उसने अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत के अंदरूनी मामलों पर बयानबाजी क्यों की?

                 षडयंत्रों के इस दौर का एक और संदेह जो पुख्ता है उस पर शायद विचार ही नहीं किया गया है। और वह है अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया और बाबा रामदेव के बीच दूरी का रहस्य? हकीकत में खुद बाबा भी इस रहस्य से परिचित नहीं होंगे। दरअसल संदेह यह है कि बाबा रामदेव ने जिस कालेधन को वापस लाने के लिए अभियान चला रखा है,वह अमेरिका के हित में नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि कई देशी कंपनियों और नेताओं का पैसा अमेरिकी कंपनियों में लगा है। इसलिए अमेरिका नहीं चाहता कि बाबा के आंदोलन को हवा मिले। यही कारण है कि अन्ना के लोकपाल आंदोलन से पहले से चला आ रहा बाबा रामदेव का आंदोलन सुर्खियों से उतर चुका है। अन्ना हजारे इन सब चीजों से बाकिफ नहीं हैं, इसलिए वे बाबा के आंदोलन को भी अपने साथ लेकर चलना चाहते हैं, बाबा भी अन्ना की मदद करना चाहते हैं, दोनों को एक दूसरे की जरूरत महसूस भी हो रही है, लेकिन अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया को यह पसंद नहीं है...क्यों? क्या अमेरिका में सबसे अधिक कालाधन जमा है इसलिए? स्विट्जरलैंड सरकार के संघीय वित्त विभाग के अनुसार पता चलता है कि भ्रष्ट संपत्ति छिपाने के लिए 800 कंपनियों की आड़ ली गई है। इसमें सर्वाधिक 102 मामले अमेरिका में पाए गए, जबकि स्विट्जरलैंड में यह संख्या सात रही। भारत में भी इस प्रकार के सात मामले पाए गए। इस मामले में अमेरिका के बाद ब्रिटिश वर्जिन आईलैंड में 91, पनामा में 50, लीसटेंसटाइन में 28 तथा बहामास 20 शीर्ष पांच देशों में शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार इसमें से 76 कंपनियों के बैंक खाते स्विट्जरलैंड में, जबकि 107 अमेरिका में थे। इसलिए अमेरिका नहीं चाहता कि कालेधन के खिलाफ कोई मुहिम कारगर हो। लेकिन बाबा रामदेव के चूंकि अपने हित हैं और सरकार के खिलाफ उनकीर् ईष्या और चिढ़ के चलते वे अपने आंदोलन को चलाए जा रहे हैं। बहरहाल तमाम झंझावतों और आलोचनाओं और जनता के गुस्से के बावजूद सरकार ने लोकपाल आंदोलन को सफल नहीं होने दिया। लिहाजा अमेरिका ने दूसरा रास्ता अख्तियार किया है। अमेरिका और उसके मित्र देशों की कंपनियां भारत से पैसा निकाल रहे हैं और निवेश रोक रहे हैं, ताकि अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचे। अमेरिकी संस्थाएं और मीडिया भी भारत सरकार पर सवाल उठा रही हैं। हाल ही में अमेरिका स्थिति रेटिंग कंपनियों ने शेयर बाजार, एसबीआई और देश की निवेश रेटिंग घटा दी है। इतने से जी नहीं भरा तो टाइम मैगजीन ने मनमोहन सिंह को कमजोर और कम सफल नेता करार दिया। यह वही मैगजीन है जो एक वक्त मनमोहन का गुणगान करते नहीं थकती थी, लेकिन तब बात और थी, मनमोहन ने अपनी सरकार दांव पर लगाकर अमेरिका के साथ परमाणु करार किया था। अब समय बदल गया है, अब अमेरिका को अपनी कंपनियों के लिए लाभ चाहिए जो भारत सरकार अपने देश को दांव पर लगाकर नहीं दे सकती, इसलिए विपक्ष और बिकाऊ लोगों के संयुक्त प्रयास से सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया जा रहा है। यह संदेह कितना खरा है और कितना पूर्वाग्रह है एक न एक दिन जरूर सामने आएगा। मैं दुआ करूंगा यह मेरा पूर्वाग्रह साबित हो।

? विवेकानंद