संस्करण: 16  जुलाई-2012

बच्चों को बीमार बनाते स्कूल?

? डॉ. सुनील शर्मा

                  गोलू राजधानी के प्रतिष्ठित स्कूल में पहली कक्षा के छात्र हैं। गोलू की कक्षा सुबह की पारी में लगती है और प्रात: साढ़े सात बजे कक्षा प्रारम्भ हो जाती है। चूॅकि गोलू का घर अपने स्कूल से ज्यादा दूर नहीं हैं। फिर भी स्कूल बस सुबह सात बजे गोलू के घर के पास पहुॅच जाती है अत: गोलू को पॉच मिनिट पहले बस स्टाप पर आना पड़ता है। चूॅकि स्कूल पूरे सात घण्टे लगता है यानि ढाई बजे तक कक्षाएॅ चलती हैं,इसलिए गोलू को पूरा तैयार होकर स्कूल आना पड़ता है और तैयार होने में न्यूनतम एक घण्टे का समय लगता हैं। अर्थात गोल को छह बजे बिस्तर छोड़ना पड़ता है। अब गोलू की नींद पूरी हो या न हो उसे छह बजे बिस्तर छोड़ना ही होगा नही तो बस निकल जाएगी और स्कूल छूट जाएगा शायद यह उसके मम्मी पापा को भी अच्छा नहीं लगेगा। इस प्रकार सुबह छह बजे उठना भागते दौड़ते तैयार होना और दोपहर तीन बजे के बाद घर पहुॅचना गोलू की दिनचर्या बन गई है।वास्तव में छह साल के गोलू की दिनचर्या भी हैरान करने वाली है वह सुबह छह बजे बिस्तर छोड़ता है।सात बजे बस पकड़ता है। साढ़े सात बजे कक्षा में बैठ जाता है। ग्यारह बजे लंच ब्रेक में लंच लेता है।स्पोर्टस और डांस क्लास मैं बैठता है फिर ढाई बजे छुट्टी होने पर बस पकड़ तीन बजे घर आता है। फिर खाना खाकर कार्टून शो देखने के  बाद टयूशन जाने की तैयारी फिर और होमवर्क,टेस्ट की तैयारी प्रोजेक्ट की तैयारी,सब लगातार चलते रहने के बाद थकाहारा बच्चा रात के दस बजते ही सो जाता है।छह साल के बच्चे की दिनचर्या कितनी व्यस्त है?लेकिन उसकी इस व्यस्तम दिनचर्या में उसकी इच्छा का कोई स्थान नहीं है?शायद वह लंच भी अपनी इच्छा से नहीं ले सकता है। लेकिन अब यह दिनचर्या उसके स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही है।वह दिन भर थका सा रहता है। बस मिलाने की भागदौड़ में पाचन क्रियाएॅ भी प्रभावित हो रही है।अत: वह भूख में कमी भी महसूस करता है वह अपना लंच बाक्स भी पूरा खत्म नहीं कर पाता है।लेकिन वह बचा हुआ लंच बस में से ही फेंक देता है ताकि लंच पूरा खत्म न करने पर मॉ की डॉट से बच सके।यह काफी लम्बे समय से चल रहा है सो अब वह कमजोर होता जा रहा है उसमें चिड़चिड़ापन आता जा रहा है।कमजोरी और चिड़चिडाहट के साथ साथ अब वह पढ़ाई में भी पिछड़ने लगा हैं।अपने बच्चे में आ रहे इस परिवर्तन से उसके पालक भी हैरान है।

                  लेकिन यह स्थिति अकेले गोलू की नहीं है वरन सुबह की पारी में पढ़ने वाले नब्बे फीसदी बच्चों की है।सुबह की पारी का स्कूल मिलाने की आपाधापी में बच्चे अपनी नींद पूरी नहीं होने से कई प्रकार की बीमारियों का शिकार हो रहें है। अपने शिक्षकों की डॉट की वजह से बच्चे पेशाब और शौच जैसी प्राकृतिक क्रियाओं को भी रोके रहने मजबूर रहते हैं। जिनका प्रभाव उनके मानसिक और शारीरिक विकास पर पड़ रहा है। सुबह की पारी में छोटे बच्चों की कक्षाएॅ अक्सर निजी स्कूलों में संचालित होती है। पालक चाहते हैं कि इन स्कूलों में उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल रही है अत:स्कूलों के नियम और समय पर कोई टीका टिप्पणी नहीं करते है।बस स्कूल के मुताबिक बच्चे को तैयार करने में ही भलाई समझते है।अगर कोई इस बात पर बहस छेड़ता है तो स्कूल संचालक पालकों पर ही देर रात तक बच्चों को टी.वी.देखने की छूट का आरोप मढ़ देते है। छोटे बच्चों की कक्षाएॅ प्रात:की पारी में लगें इसका कोई वैज्ञानिक या प्रशासकीयकारण हो ऐसा नहीं है बल्कि स्कूलों की पारी और समय के निर्धारण में निजी स्कूल सिर्फ अपना नफा नुकसान ही देखते है।निजी स्कूल कम संसाधनो में अधिकतम लाभ कमाने में जुगत में स्कूल दो दो पारियों में लगाते है। चूॅकि छोटी कक्षाओं के छात्रों को कम समय में ही छोड़ा जा सकता है अत: अक्सर इन कक्षाओं को सुबह लगा लिया जाता है और बारह के पहले छोड़ दिया जाता है ताकि सुबह की पारी के बच्चों को घर छोड़ने वाली बस दोपहर की पारी के बच्चों को स्कूल लाने का काम करती है।जिन स्कूलों के पास जगह र्प्याप्त होती है वो सारी कक्षाएॅ एक ही पारी में लगाते हैं जिससे एक ही बार बस का उपयोग कर बच्चों को ढोया जा सकता है।लेकिन इस खामियाजा छोटी क्लास के बच्चों को भुगतना पड़ता है और उन्हें भी यंत्रवत सात से आठ घण्टे स्कूल में गुजारने मजबूर होना पड़ता है।और स्कूल संचालक इसे अपने स्कूल में होने वाली विभिन्न प्रकार की कक्षाओं के कारण जरूरी बताते हैं जिनमें से अधिकतर गैरजरूरी होती हैं या फिर इनके लिए सप्ताह में एक दिन की कक्षा ही र्प्याप्त हो सकती है। अनेक स्कूलों में एक ही विषय के दो दो कालखण्ड रख दिए जाते हैं ताकि बच्चा कैसे भी उलझा रहे।

                  वास्तव पढ़ाई के नाम पर यह क्रूरता है। बच्चं का बचपन छीनने और उन्हें बीमारी करने की साजिश है। दुख: बात है कि सरकारी तंत्र भी इससे बेखबर हैं।हम शिक्षा के अधिकार के प्रावधानों की चर्चा रोज सुनते है सरकार ने भी अपने स्कूलों को एक ही पारी में लगाने की तैयारी की है और अधिकांश स्कूलों मे सुबह दस बजे के बाद ही छोटे बच्चों की कक्षाएॅ लगती है। जो कि छोटे बच्चों की कक्षाओं के लिए आदर्श समय होता है। तो फिर प्राइवेट विद्यालयों को इसके लिए राजी क्यों नहीं किया जाता है कि वो भी छोटे बच्चों की कक्षाएॅ दस बजे के बाद ही लगाए?आखिरकार उन्हें बच्चों को बीमार करने की छूट क्यों दी जा रही है? बेहतर ये है कि प्राइवेट विद्यालयों को सिर्फ उतनी ही कक्षाएॅसंचालित करने की अनुमति दी जाए जो एक ही पारी में बेहतर ढंग से संचालित कर सके। प्राथमिक कक्षाओं की समयावधि अधिकतम चार घण्टे की रखना अनिवार्य होनी चाहिए। वास्तव में पूरी नींद शारीरिक स्वास्थ्य और मस्तिष्क के विकास लिए जरूरी है और बच्चों स्वाभाविक अधिकार भी है।  

? डॉ. सुनील शर्मा