संस्करण: 16  जुलाई-2012

हिग्स बोसॉन की खोज :

तार्किकता के नए आयाम

? राहुल शर्मा

                ब्रम्हांड के बनने के विषय में शुरू से ही कई अवधारणायें प्रचलित रही हैं जिनमें तार्किक व अतार्किक दोनों प्रकार की धारायें शामिल हैं। भौतिकी व अन्तरिक्ष विज्ञान की तमाम खोजों व शोधों ने यह स्थापनायें दीं कि ब्रम्हाण्ड किसी दैवीय शक्ति द्वारा प्रतिपादित एवं महज कुछ ही दिनों के सृजन का परिणाम नहीं बल्कि इसके उदय व विस्तारण के पीछे प्रकृति के सुव्यवस्थित नियम व पदार्थ के अपने जाने व अनजाने गुणधर्मों की भूमिका है। ब्रम्हांड के अस्तित्वमान होने की सबसे तार्किक व सुव्यवस्थित व्याख्या देने वाले सिध्दान्त को ''बिग-बैंग थ्योरी''के नाम से जाना जाता है। जिसमें यह अनुमान लगाने के तार्किक प्रयासों का जिक्र है कि जब ब्रम्हांड की शुरूआत हुई तब क्या-क्या घटा था। यह सिध्दान्त इस विचार को तार्किकता देता है कि ब्रम्हाण्ड के होने की भी एक शुरूआत थी। इस सिध्दान्त के अनुसार लगभग 13.7अरब वर्ष पहले हमारा ब्रम्हाण्ड एक वैशिस्ट के तौर पर अस्तित्व में आया था लेकिन यह वैशिष्ट क्या है, इसका क्या कारण है इस विषय में कई प्रकार के विचार, संकल्पनाएँ व सिध्दान्त प्रचलन में आए। इनमें से एक व्यापक अवधारणा है ब्लेक होल की जो एक ऐसा बिंदु है कि जहाँ ब्रम्हाण्ड का सर्वाधिक गुरूत्वाकर्षण दबाव होता है। बिग-बैंग सिध्दान्त पर चर्चा हो और इस दौरान ईश्वरीय अस्तित्व को प्रश्नवाचक दृष्टि से न देखा जाए यह असम्भव होता है। यही कारण है कि इंग्लैण्ड के विश्वविख्यात भौतिकशास्त्री स्टीफन हाकिंग ने अपनी किताब ''द ग्रेंड डिजाईन''में इन्हीं मसलों पर तार्किक व वैज्ञानिक चिंतन के साथ ब्रम्हाण्ड के निर्माण के मूल में ईश्वरीय शक्ति की भूमिका होने से पूर्णत: इन्कार कर दिया।

                   ब्रम्हाण्ड की शुरूआत व इसमें पदार्थ की भूमिका व उसकी प्रकृति का पता लगाने के तमाम प्रयासों में सर्वाधिक चर्चा हिग्स बोसोन अथवा ''गॉड पार्टीकल'' की है। हाल ही में अमेरिकी शोध संस्था सर्न (यूरोपियन सेन्टर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च) द्वारा दुनिया के तमाम देशों की सहायता से जिनमें भारत की भी महती भूमिका है, ब्रम्हांड में व्याप्त उस कण को खोज लिये जाने का दावा किया है जो कि ब्रम्हाण्ड के द्रव्यमान को निर्धारित करता है।     दरअसल इसके पीछे की अवधारणा कहती है कि अपनी शुरूआत में ब्रम्हांड बहुत ही गर्म व घनीभूत अवस्था में था जिसने तीव्रता से विस्तारित होना शुरू किया परिणामस्वरूप ब्रम्हाण्ड ठंडा होने लगा एवं अभी भी यह अपने को विस्तारण की अवस्था से अलगा नहीं सका है। इसके ठंडा होने पर उर्जा विभिन्न उपअणु के कणों में तब्दील हुई जिनमें प्रोटोन, न्यूट्रान तथा इलेक्ट्रान शामिल हैं। यह पदार्थ के स्थायी कण हैं जो कई हजार साल तक अस्तित्वमान रहते हैं। लेकिन इनके साथ-साथ पदार्थ में अस्थायी कण भी होते हैं जो इन स्थायी कणों को द्रव्यमान अथवा भार प्रदान करते हैं एवं कुछ समय पश्चात् अपना रूप बदल लेते हैं। इन्हें ही पकड़ पाना सर्वाधिक चुनौती भरा काम था। इन्हीं कणों की श्रृंखला के बारहवें कण को हिग्स बोसोन कहा गया है। यह कण अत्यधिक सूक्ष्म व अति ऊर्जावान होते हैं। इनसे यह समझा जाना संभव हो सकता है कि बिगबैंग के तुरन्त बाद ही द्रव्यमान कैसे अस्तित्व में आया।

                   द्रव्यमान दरअसल पदार्थ का मूलभूत गुणधर्म होता है जो उसके भार को दर्शाता है। यही ब्रम्हांड की शुरूआत के लिये जिम्मेवार माना जाता है। यह शुरुआत कैसे हुई होगी इसका पता लगाने के लिए एक प्रयोगात्मक प्रक्रिया जिसे लार्ज हैड्रोन कोलाइडर (एल.एच.सी.) कहा जाता है को तकरीबन 4 साल पहले जेनेवा में स्थापित किया गया था। तबसे तमाम वैज्ञानिक जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय भी शामिल थे के द्वारा लगातार तकनीकी प्रयासों से बिग बैंग की घटना को कृत्रिम तौर पर उपजाया गया। यह घटना जमीन से 175 मीटर नीचे बनाई गई 27 किलोमीटर लंबी सुरंग रूपी प्रयोगशाला में प्रोटोन बीम्स की आपसी टक्कर से कराई गई थी। इस प्रयोग से यह पता लगाने के प्रयास किए गए कि ब्रम्हाण्ड की शुरुआत पर यहाँ-वहाँ बिखरे कणों को कैसे द्रव्यमान मिला जिससे कि वे परमाणु व अणु बन कर पदार्थ के रूप में संगठित हो सके तथा पदार्थ को असंख्य आकार व आकृतियाँ दे सके। यही द्रव्यमान है जो गुरुत्व के साथ मिलकर पदार्थ को भार प्रदान कराता है। हालांकि अभी इस सन्दर्भ में बहुत काम होना बाकी है क्योंकि जो कण मिले हैं वे हिग्स बोसॉन ही हैं ऐसा सर्न व उससे जुड़े वैज्ञानिकों का शत प्रतिशत दावा भी नहीं लेकिन ये कण हिग्स बोसॉन हो सकते हैं ऐसा कहा गया है। क्योंकि इसके पहले के 11 कण ढूंढे जा चुके हैं। हिंग्स बोसॉन अभी तक सैध्दांतिक कण ही था जिसे व्यवहारिक तौर पर देख लिया गया है। इन कणों को ईश्वरीय कण आम व्यक्तियों के लिहाज से कहा जा रहा है। यह नाम नोबल पुरस्कार प्राप्त भौतिकशास्त्री लियोन लैडरमेन ने दिया था लेकिन भौतिकशास्त्री इस नाम को स्वयं के लिए नहीं स्वीकारते हैं। ख्यातिलब्ध भौतिकशास्त्री स्टीफन हॉकिंग ने इन कणों की खोज को ब्रम्हाण्ड के उदय की तार्किक व वैज्ञानिक अवधारणा को बल देने वाला बताया है व इस हेतु पीटर हिग्स को नोबल पुरस्कार का हकदार बताया है।

                 फ्रांस के जाने माने वैज्ञानिक लुई पाश्चर ने कहा था कि ''उनके लिए जो कि अपना जीवन विज्ञान को समर्पित करते हैं इससे ज्यादा प्रसन्नता की बात क्या होगी कि उनकी खोजों में इजाफा हो लेकिन उनकी खुशी का प्याला तब छलकता है जब उनके अधययनों के परिणामों का व्यवहारिक उपयोग होता है''। जैसे ही जेनेवा में हिग्स बोसॉन को खोज लिये जाने की घोषणा हुई हमारे मुल्क में तमाम टी वी चैनलों ने घोर अवैज्ञानिकता का प्रदर्शन करते हुए चिल्लाना प्रारम्भ कर दिया कि ईश्वर के अस्तित्व की वैज्ञानिक पुष्टि हो गई है। उन्होंने इस महान खोज को शीर्षासन की अवस्था में ला पटका जो तार्किकता को लकवाग्रस्त करने के कृत्य के तौर पर लिया जाना चाहिये। निश्चित ही इस खोज की प्रासंगिकता सिर्फ संचार व चिकित्सा तकनीक को और भी बेहतर कर देने से साबित नहीं होगी बल्कि इसका महत्व इस वैज्ञानिक सोच को उभारने व नई स्थापनाएँ देने में साबित होना चाहिए जिसमें ब्रम्हाण्ड किसी सर्वशक्तिमान की इच्छा का परिणामम नहीं बल्कि प्रकृति के अपने सुनियोजित व स्वनियंत्रित व्यवस्था का परिणाम सिध्द होता है।

? राहुल शर्मा