संस्करण: 16  जुलाई-2012

खौफज़दा समय में दम तोड़ती जिंदगी

 

? सुनील अमर

               म्मीदों का खत्म हो जाना जिंदगी को खत्म कर देता है। जब तक उम्मीद की एक भी किरण बाकी रहती है, आदमी जीने के हजार गलत-सही जुगत करता रहता है। यह कैसी बिडम्बना है कि जैसे-जैसे हम जिंदगी जीने के आसान रास्ते खोजते जा रहे हैं, वैसे-वैसे जिंदगी से निराश होने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है! नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रपट में बताया गया है देश में आत्महत्या करने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है और खासकर उत्तर प्रदेश में यह प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ रही है। यहाँ आत्महत्या करने वालों की संख्या में एक तिहाई की खतरनाक वृध्दि हुई है। आत्महंताओं में प्राय: प्रेम या कैरियर में असफल या फिर घर से प्रताड़ित नौजवान ही हुआ करते हैं लेकिन इधर के एक-दो दशक में यह देखने में आ रहा है कि परिपक्व कही जाने वाली 40 और 60 साल की उम्र के आगे वाली पीढ़ी भी इस खतरनाक रास्ते पर चल पड़ी है और साल दर साल इनकी संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। निश्चित रुप से इसके पीछे हमारी सामाजिक बुनावट (फैब्रिकेशन ऑफ सोसायटी) की कमी है जो एक असफल व्यक्ति को कोई विकल्प नहीं दे पा रही है।

                 जीवन जीना एक कला है। कला उच्च स्तरीय भी हो सकती है और बिल्कुल साधारण भी। ओशो कहते हैं कि ''सुख नहीं, आनन्द तलाशो। आनन्द, मानसिक अवस्था है, और सुख भौतिक। वे कहते हैं कि हम कहीं भी आनन्दित हो सकते हैं लेकिन हर जगह सुखी नहीं हो सकते।'' सुख की तलाश हमें प्राय: कुंठित करती है और कुंठा लगातार बनी रहे तो हताशा में बदलकर जीवन की प्रत्याशा को कम कर देती है। यह अपेक्षाऐं हैं जो पूरी न होने पर हमें निराश करती हैं। वैसे तो देश का प्रत्येक नागरिक देश की सम्पत्ति होता है और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी सरकार की होती है। इसीलिए किसी भी नागरिक को अपनी जान लेने का अधिकार नहीं है और यदि वह ऐसी कोई कोशिश करता पाया जाता है तो उसे कानून सजा देता है। बावजूद इसके, पढ़े-लिखे हों या अनपढ़, मूर्ख हों या विद्वान और अब तो बच्चे भी खुदकुशी करने लगे हैं और इससे हमारी सामाजिक जटिलता का अनुमान लगाया जा सकता है।

                 आत्महत्या का एक प्रमुख कारण परिवार और समाज का धन-केन्द्रित हो जाना है। धन केन्द्रित समाज में रहने वाला व्यक्ति अंतत: आत्म केन्द्रित हो जाता है। इसकी दु:खद परिणति यह होती है कि फिर वह न तो समाज की मदद कर पाता है और न समाज उसकी। ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की लालसा ने पुरुषों को मजबूर किया कि वे अपनी औरतों से भी नौकरी या व्यवसाय करायें। इस स्थिति ने संयुक्त परिवारों को खत्म कर दिया। एकल परिवार का सबसे बुरा असर छोटे बच्चों पर पड़ा क्योंकि कामकाजी मॉ-बाप की वजह से वे नितांत अकेले या नौकरों के रहमो-करम पर हो गये और प्राय: उनका शारीरिक-मानसिक शोषण हुआ। शिक्षा का व्यवसायीकरण कर उसे उद्यम में तब्दील कर देने का नतीजा यह हुआ कि तथाकथित अच्छे स्कूल शिक्षित नागरिक नहीं बल्कि एक 'प्रोडक्ट' निकालने लगे। यह भी हुआ कि परिस्थितियों की मॉग पर कलेजे पर पत्थर रखकर माँ-बाप ने अपने नौनिहालों को शुरु से ही छात्रावासों में रख दिया। नतीजतन, ऐसे बच्चे कुंठित और निष्ठुर हो गये।

                  बच्चों को प्रोडक्ट बना देने का नतीजा यह हुआ कि वे अनायास ही हर समय एक गलाकाट प्रतियोगिता के माहौल में जीने लगे। उनके उठने-बैठने, सोने-जागने, लिखने-पढ़ने तथा पहनने-ओढ़ने आदि को प्रतियोगी बनाकर हर हाल में सर्वश्रेष्ठ बने रहने का गुरुमंत्र दिया गया और वे अतिमहत्त्वाकांक्षी बन गये! उनके लिए यह कल्पना ही जानलेवा बन गयी कि उनकी इच्छाऐं पूरी नहीं हो सकतीं। गत वर्ष दिल्ली में कक्षा दो में पढ़ने वाले आठ वर्षीय एक बालक ने माँ द्वारा खेलने से मना किये जाने पर फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। देश के कई शहरों से बच्चों द्वारा आत्महत्या कर लेने की कई घटनायें प्रकाश में आई हैं। ज्यादा चिंतनीय यह है कि ये बच्चे दस साल से भी कम उम्र के थे। एक ऐसी उम्र, जिसमें माना जाता है कि बच्चा खाने और खेलने के अलावा कुछ जानता ही नहीं, और इसी उम्र में ही जिन्दगी के खिलाफ इतना बड़ा फैसला! आत्महत्याओं पर हुए मनोवैज्ञानिक और समाज शास्त्रीय अध्ययन बताते हैं कि जिन्दगी जीने के सारे रास्तों के बंद हो जाने का विश्वास ही किसी व्यक्ति को खुदकुशी के मुकाम तक ले जाता है। लेकिन इस तरह का विश्वास किसी छह साल, आठ साल के बच्चे में आने लगे, जिसे अभी यही नहीं पता कि जिन्दगी क्या है और जिन्दगी जीने के तरीके और रास्ते क्या होते हैं तो किसी भी देश-समाज के लिए इससे ज्यादा चिंतनीय बात और क्या हो सकती है?

                   जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की फेलो, पत्रकार और समाजशास्त्री सुश्री शीबा फ़हमी कहती हैं कि इस उम्र के बच्चों में 'सेल्फ रेस्पेक्ट' यानी आत्म-आदर की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा होती है। होता यह है कि कई बार माँ-बाप अपने बच्चों को सबके सामने विशेषकर उनके दोस्तों के सामने बुरी तरह झिड़क, डॉट या मार देते हैं, इससे बच्चा आहत हो जाता है और बाद में उसके ऐसे ही दोस्त उसको चिढ़ाने या मजाक बनाने लगते हैं तो खिसियाहट के फलस्वरुप बच्चे में आत्मघाती सोच बनने लगती है और आगे की कोई ऐसी ही झिड़क या डाँट बच्चे को जीने-मरने के मुकाम पर ला खड़ा कर देती है। शीबा कहती हैं कि हममें यानी समाज में एक बच्चे की 'इन्डिविजुअल्टी'(वैयक्तिता) स्वीकारने की आदत ही नहीं है। हम यह मानते ही नहीं कि बच्चे का भी कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व है। हम अपने बड़े होने, माँ-बाप होने के घमंड में ही चूर रहते हैं। जब तक औलाद मुॅंह बंद कर देने लायक कमाई न करने लगे, हम उसकी हैसियत ही नहीं समझते।

                उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बीते माह एक सेवानिवृत्त जज ने जीवन से निराश होकर चौथे माले से कूदकर अपनी जान दे दी। इसी शहर में बीते कुछ वर्षों में कई आई.ए.एस./पी.सी.एस. अधिकारी आत्महत्या कर चुके हैं और लगभग दो साल पहले तो जैसे छात्र/छात्राओं द्वारा जान देने की घटनाओं की बाढ़ ही आ गई थी। सवाल यह उठता है कि बुध्दि और विवेक में उत्कृष्ट माने जाने वाले न्यायाधीश और प्रशासनिक अधिकारी अगर खुदकुशी पर आमादा होने लगे तो क्या यह माना जाय कि हमारा पूरा समाज ही विषाक्त हो चुका है? और इसका उपाय क्या हो सकता है?

                  योग, नेचुरोपैथी और मेडिटेशन की विशेषज्ञ डॉ. गरिमा तिवारी (जयपुर) कहती हैं कि समाज में बेहिसाब तनाव बढ़ा है और लोगों की सहनशक्ति अक्सर जबाव देने लगी है। वे कहती हैं कि इनके मूल में कारण यह हैं कि या तो व्यक्ति अपनी क्षमता से खुद का अधिक मूल्याँकन करता है या फिर कम। जब व्यक्ति अपना मूल्याँकन अपनी क्षमता से ज्यादा करने लगता है तो वह अपने लिए अव्यवहारिक लक्ष्य बनाने लगता है जो समय रहते पूरा नहीं कर पाता। दूसरी स्थिति में व्यक्ति हमेशा अपने आपको दीन-हीन समझने लगता है और इस स्थिति में उसको छोटे-छोटे लक्ष्य भी असाधय दिखने लगते है। डॉ. गरिमा कहती हैं कि मेडिटेशन एवम नेचुरोपैथी के जरिए तनाव को आसानी से दूर किया जा सकता है। नेचुरोपैथी से जहाँ व्यक्ति को शिरोधारा, मसाज, मृदा चिकित्सा के द्वारा तनाव से उत्पन्न शारीरिक लक्षणो से लाभ मिलने लगता है वही मेडिटेशन व्यक्ति को मानसिक तौर पर सु.ढ़ करता है। अलग अलग व्यक्ति की जरूरत और अवस्था के अनुसार अलग अलग मेडिटेशन कोर्सेस तैयार किए जाते हैं जिनका नियमित अभ्यास कर तनाव को अलविदा कहा जा सकता है।

? सुनील अमर