संस्करण: 16  जुलाई-2012

मनमोहन सिंह अंडर-एचीवर, 

ओबामा एचीवर ?

?     मोकर्रम खान

              पिछले दिनों इस खबर ने देश में बड़ा तहलका मचाया कि अमेरिका की टाइम मैग्जीन ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अंडरएचीवर यानि उम्मीद से कम सफल बताया है। वैसे भारतीय बाजार में देशी समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं की संख्या लाख का आंकड़ा छू रही है,इनमें से बहुत से पत्र पत्रिकायें एक से बढ़ कर एक सनसनीखेज समाचार छापते हैं किंतु हमारे देश में कुछ लोगों को इंपोर्टेड चीजों का आवश्यकता से अधिक चस्का लग चुका है जैसे देशी दवाओं के खरीदार ढूंढे नहीं मिलते लेकिन विदेशी दवाओं तथा परफ्यूम्स के लिये हजारों खर्च करने को कई लोग तैयार रहेंगे।  तो इस इंपोर्टेड समाचार को ले कर कुछ नेतागण तथा मीडिया हाउस ऐसे उछलने लगे मानों टाइम मैग्जीन एक पत्रिका न हो कर कोई टाइम बम हो जो मनमोहन सरकार को पल भर में हिरोशिमा या नागासाकी बना देगा। कुछ नेता तो इतने प्रसन्न हो गये कि मध्यावधि चुनावों के ही सपने देखने लगे। वैसे इतना अधिक प्रसन्न होने का कोई उचित कारण नहीं था क्योंकि भारत में सरकार का फैसला न तो कोई विदेशी या देशी मीडिया कर सकता है न ही कोई नेता ।यह फैसला केवल देश के मतदाता ही करते हैं। किसी भी मीडिया में कोई खबर उछल जाने से भारत की जनता को कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता।  मीडिया के अनुसार पिछले 08 सालों में देश में लगभग 15 लाख करोड़ के घोटाले उजागर हुये हैं, पिछले 03 सालों में पेट्रोल की कीमतों में 36 रुपये प्रति लीटर की वृध्दि हुई है, रुपया कमजोर हो रहा है जिस कारण डालर महंगा हो रहा है किंतु जनता ने इन समाचारों पर 02 दिनों से अधिक रुचि नहीं दिखाई,हार कर मीडिया ने स्वयं इन समाचारों से किनारा कर लिया। दुर्भाग्यवश कुछ नेताओं तथा मीडिया हाउसेज पर गुलाम मानसिकता इतनी ज्यादा हावी है कि वे विदेशी मीडिया में नौकरी कर रहे पत्रकारों को भारत जैसे विशालकाय देश का भाग्य विधाता मान लेते हैं,अपने दिमाग को कष्ट नहीं देते कि उस खबर का कुछ विश्लेषण कर सही निष्कर्ष पर पहुंच सकें। इस समय देश में पेड न्यूज यानि पैसे ले कर खबर छापना या चैनल पर दिखाना,की चर्चा जोरों पर है। यह चलन विदेशों में भी खूब है, केवल एक ही अंतर है, वह यह कि यहां भुगतान की गई राशि कम होती है, विदेशों में अधिक। राशि कम होने के कारण यहां जल्दी हो हल्ला होने लगता है।  इसे यूं भी समझा जा सकता है कि सस्ता ठर्रा पी कर लोग सार्वजनिक स्थानों पर अंड बंड हरकतें करने लगते हैं और बदनाम हो जाते हैं जबकि महंगी विदेशी शराब पी कर संभ्रांत लोग कमरों में बंद हो जाते हैं और वहीं ऐश करते हैं,थोड़े ज्यादा पैसे लगते हैं किंतु समाज में प्रतिष्ठा बची रहती हैं। विदेशों में पेड नहीं, स्पांसर्ड न्यूज होती हैं जिनमें लार्जर बिजनेस इंट्रेस्ट इनवाल्व होते हैं,अक्सर वहां की सरकारें भी इस खेल में शामिल होती हैं। इन स्पांसर्ड न्यूज की सहायता से कई बार छोटे तथा मझोले देशों में अफवाहें फैला कर लोगों को शासन के विरुध्द उद्वेलित कर तख्ता पलट भी करवा दिया जाता है। कुछ मुस्लिम देशों में अमेरिका का यह प्रयोग सफल रहा ।पहले मीडिया तथा इंटरनेट की सहायता से अफवाहें फैला कर लोगों में सत्ता के विरुध्द आक्रोश उत्पन्न किया गया फिर वहां के शासकों पर दबाव बनाया गया कि वे सत्ता के विरुध्द संघर्षरत लोगों पर किसी प्रकार का बल प्रयोग न करें बल्कि सत्ता छोड़ दें। जब उन्होंने सत्ता छोड़ दी तब अमेरिका की पसंद के व्यक्ति की ताजपोशी हुई।

                (2)      टाइम मैग्जीन द्वारा मनमोहन सिंह की सी0आर0 में एडवर्स एंट्री किये जाने के क्या कारण हैं, यह जानने के लिये हमें थोड़ा सा पीछे जाना होगा, लगभग 2 वर्ष। अप्रैल 2010में इसी टाइम मैग्जीन में मनमोहन सिंह को इतना महिमामंडित किया गया था कि उन्हें विश्व के 100 प्रभावशाली व्यक्तियों में शामिल कर 19वां स्थान दिया गया। यह भी कहा गया कि वे भारत को महाशक्ति बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं तथा वैश्विक विकास के लिये भारत एक अहम इंजन बन चुका है ।अब 2 साल बाद अचानक मनमोहन सिंह को असफल घोषित कैसे कर दिया गया।  यह भी बड़ी दिलचस्प कहानी है ।अप्रैल 2010में मनमोहन सिंह की तारीफों के पुल बांधे गये। उसके ठीक 06माह बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा बगैर किसी निमंत्रण के भारत पधारे किंतु पहले राजधानी दिल्ली जा कर राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री से मिलने की औपचारिकता नहीं निभाई,सीधे अपने टारगेट का रुख किया और मुंबई में लैंड किया।  लगभग 250 अमेरिकी उद्योगपतियों की फौज भी साथ थी। ओबामा ने पहले सलाह के रूप में अप्रत्यक्ष आदेश दिया कि भारत अपने बाजार खोले फिर 450अरब की डील की और वापस लौट गये। इस 450अरब की डील की लागत आगे चल कर स्वयमेव 1000अरब हो जायेगी।इस भारी भरकम डील से बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे भारत के खजाने को भले ही जबरदस्त चोट पहुंची किंतु अमेरिका में 50 हजार लोगों को नौकरियां मिल गईं।  इससे बराक ओबामा की गिरती हुई लोकप्रियता को काफी सहारा मिल गया वर्ना अमेरिका में बढ़ रही बेरोजगारी के कारण उनकी लोकप्रियता का ग्राफ निरंतर गिरता ही जा रहा था।  यह तो हुई 02 वर्ष पहले की बात लेकिन 450 अरब कब तक रखे रहेंगे, हजम हो गये, 02 साल का समय कोई छोटा होता है क्घ्या।  अब कुछ और, और नया चाहिये। अमेरिका चाहता है कि भारत सरकार सब्सिडी देना बंद कर दे ताकि चीजें और मंहगी हो जायें तथा अपने घरेलू व्यापार में सीधे विदेशी निवेश की अनुमति दे दे ताकि अमेरिकी कंपनियां भारत में प्रवेश कर सकें और खुल कर मनमानी कर सकें। परंतु अमेरिका की ये इच्छायें पूरी नहीं हो पा रहीहैं क्योंकि मनमोहन सिंह इस लोकतांत्रिक देश के प्रधान मंत्री हैं। उन्हें सम्राट की शक्तियां प्राप्त नहीं हैं जो सीधे एक आदेश पारित कर अमेरिकी कंपनियों को खुली लूट की छूट दे सकें। एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) बिल संसद में लंबित है क्योंकि कई राजनीतिक दल इसके पक्ष में नहीं हैं और बगैर आम सहमति के इस बिल का पास होना संभव नहीं है। अमेरिका खीज रहा है कि मनमोहन सरकार यह बिल पास क्यों नहीं करा पा रही है, क्यों दूसरे दलों पर पर्याप्त दबाव नहीं बना पा रही है। उसी खीज का परिणाम है, टाइम मैग्जीन का यह ताजा अंक।दो साल पहले इसी मैग्जीन ने मनमोहन सिंह के पसीने से गुलाब की खुश्बू आने की बात कही थी, अब उनके तन से दुर्गंध आने का आरोप लगा कर उनका मजाक उड़ा रहे हैं ।दो साल पहले मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत को पूरे विश्व के विकास के लिये अहम एंजिन बता चुके थे,अब भारत में जितनी भी नकारात्मक घटनायें हो रही हैं,सभी का जिम्मेदार मनमोहन सिंह को बताया जा रहा है ।सारा खेल बाजारवाद का है ।अमेरिका भारत को अपना आर्थिक गुलाम बनाना चाहता है ।वह चाहता है कि भारत के बाजारों में केवल अमेरिकी कंपनियों का सिक्का चले और धीरे धीरे पूरे भारतीय बाजार पर अमेरिकी कब्जा हो जाय, भारत का खजाना खाली हो जाय, सारा धन अमेरिका स्थानांतरित हो जाय फिर भारत अमेरिका की आर्थिक गुलामी स्वीकार कर ले और अपनी हर छोटी बड़ी आवश्यकताओं के लिये उसका मुंह ताकता रहे।

                (3) टाइम मैग्जीन के अनुसार मनमोहन सिंह उम्मीद से कम सफल प्रधान मंत्री हैं तथा भारत को चाहिये नई शुरुआत। संभवत मनमोहन सिंह को कंपलसरी रिटायरमेंट देने का इशारा किया जा रहा है। यह तो हुई कवर पेज की बात। अंदर जो लेख लिखा है, उसका शीर्षक है मैन इन शैडो, इस लेख में प्रश्घ्न उठाया गया है कि क्घ्या मनमोहन सिंह प्रधान मंत्री के तौर पर अपने काम में खरे उतरे हैं। सवाल यह उठता है कि टाइम वाले किस काम की बात कर रहे हैं जिसमें वे प्रधान मंत्री को खरा उतरने की बात कह रहे हैं। इस प्रश्न का उत्तर भी उसी लेख में है।  भारत जिन समस्याओं से निरंतर जूझता आ रहा है जैसे विदेश प्रायोजित आतंकवाद, सीमा पार से घुस पैठ, पड़ोसी देशों द्वारा हमारी भूमि पर अतिक्रमण, नशीली दवाओं की तस्करी आदि, उनका उल्लेख इस लेख में कहीं नहीं हैं। इसमें चिंता जताई गई है केवल अमेरिकी कंपनियों के हित साधान में आ रही बाधाओं पर।  टाइम मैग्जीन का आरोप या चिंता है कि भारत सरकार आर्थिक सुधारों को आगे नहीं बढ़ा पा रही है, सरकारी सब्सिडी समाप्त नहीं कर रही है, इस पर भारी भरकम रकम खर्च कर रही है।  उक्त अमेरिकी मैग्जीन जिन कार्यों को आर्थिक सुधार कह रही है, वे अमेरिकी कंपनियों की आर्थिक स्थितियों में सुधार लाने में अवश्य सहायक होंगे किंतु भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में जहां दो वक्त की रोटी की तलाश में भटकने वाले निर्धन भी रहते हैं, यदि यह तथाकथित आर्थिक सुधार एक दम से लागू कर दिये जायेंगे तो चारों ओर त्राहि त्राहि मच जायगी।  यदि खाद पर से सब्सिडी हटा दी जायगी तो किसान के लिये खाद खरीद पाना कठिन हो जायगा, फिर खेती कैसे करेगा। गैस सिलेंडर पर से सब्सिडी हटा दी जाय तो 1000 रुपये का सिलेंडर खरीदना जनता के एक बहुत बड़े वर्ग के लिये असंभव हो जायगा।  कई उद्योग धंधे जो केवल सरकारी सहायता टैक्स छूट  आदि के बल पर चल रहे हैं, बंद हो जायेंगे, इससे बेरोजगारी और बढ़ेगी।  जब लोग भूखे मरने की स्थिति में आ जायेंगे तो अपराध की दुनिया का रुख करेंगे।  क्या अमेरिकी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिये सरकार अपनी जनता का गला घोंट दे और यदि न घोट सके तो अंडर एचीवर कहलाये। अमेरिका ने वियतनाम, ईराक, अफगानिस्तान जैसे देशों में क्या क्या और कैसे कैसे एचीवमेंट किये हैं और उनके कितने भयंकर परिणाम सामने आये हैं, पूरे विश्व को मालूम है।

                   इस पूरे एपीसोड में सबसे अफसोसनाक बात यह है कि विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रहित में मनमोहन सिंह का साथ नहीं दिया बल्कि टाइम मैग्जीन के उसी लेख को हथियार बना कर उनकी खिल्ली उड़ाई जबकि होना यह था कि भले ही घर के अंदर 5 भाइयों में पारस्परिक मनमुटाव हो किंतु जब कोई बाहरी व्यक्ति आक्रमण करे तो परिवारकुल की मर्यादा की रक्षा के लिये सभी को संगठित हो कर मुकाबला करना चाहिये क्योंकि यदि परिवार ही नहीं रहेगा तो हम कैसे बचेंगे।

? मोकर्रम खान