संस्करण: 16फरवरी-2009

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क्या कल्याण का पाँसा मुलायम का कल्याण करेगा?

भारतीय लोकतंत्र अमरसिंह जैसे लोगों के लिए एक फुटबाल से अधिक नहीं है जिसे वे जनसेवा के लिए नहीं अपितु या तो वे शक्ति और सम्पन्नता हासिल करने के लिए इस्तेमाल करते या राष्ट्रपति जैसे प्रतिष्ठित पद के लिए अमिताभ बच्चन का नाम उछाल कर उसका मजाक बनाते रहते हैं। >वीरेंद्र जैन


मुठभेड़ होने पर
हत्या के मुकदमे !

सरकारें हमेशा झूठ बोलती हैं। जब यह साफ हो जाता है कि उन्होंने झूठ बोला है तब भी वे स्वाभाविक तौर पर उसने इन्कार करती हैं, असुविधाजनक सबूतों को वह खारिज करती हैं, जिससे उनका यही अर्थ होता है कि उनके पास भी ऐसे सबूत हैं जिन्हें सामने नहीं लाया जा सकता। >सुभाष गाताड़े


राम मंदिर का पुन: सहारा लेना
भाजपा का वैचारिक दिवालियापन

एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक दिवालियापन सामने आया है। 1992 में जब से बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ तब से लेकर आज तक जितने चुनाव हुए हैं, भारतीय जनता पार्टी ने मतदाताओं को आश्वासन दिया है कि सत्ता में आने पर वह राम मंदिर अवश्य बनाएगी। >एल.एस.हरदेनिया


पहले आत्म-कल्याण, फिर जनकल्याण
राजनीति में कहां का ईमान, कहां का स्वाभिमान !

भारत की राजनीति में दिनों-दिन जिस तरह की दृश्यावलियां बदलती जा रही हैं, उससे राजनैतिक शुचिता की परिभाषाऐं कलंकित हुए बिना नहीं रह सकती है। विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं में सत्ता की भूख की तड़फ इतनी ज्यादा उमड़ती जा रही है कि उन्हें न तो अपनी पैतृक या मातृ पार्टियों के उसूलों और आदर्शों >राजेंद्र जोशी


सुराज के सुहाने सपने

अपनी दूसरी पारी में शिवराज सिंह चौहान उत्साह से लबरेज़ हैं और कुछ कर दिखाना चाहते हैं, लेकिन हालात उनका साथ नहीं दे रहे हैं। वे करने कुछ जाते हैं और हो कुछ जाता है। पचमढ़ी में मंत्रियों की क्लास लगा कर उन्हें अनुशासन का पाठ पढ़ाने का दांव मुख्यमंत्री पर भारी पड़ गया है, जिससे एक बार फिर यह तथ्य रेखांकित हुआ है, सत्ता के वास्तविक सूत्र आज भी नौकरशाही के हाथ में है >महेश बाग़ी


खुले दिमाग से करे संस्कृति की रक्षा

भारतीय संस्कृति का हवाला देकर मंगलौर के पब में युवतियों पर हमला, पहली जनवरी को नव वर्ष उत्सव को रोकने बाधा पहुंचाना आदि क्रियाओं के जरिए हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात कर असहिष्णुता को बढ़ावा दे रहे हैं। संस्कृति की रक्षा करने का भला, यह क्या तरीका है। श्रीराम सेना, अभिनव भारत, शिवसेना आदि संगठन केवल हिंदुओं की सहिष्णुता को भड़का रहे हैं। >अंजनी कुमार झा


आर्थिक संकट बढ़ाते क्रेडिट कार्ड

जो क्रेडिट कार्ड तात्कालिक आर्थिक समस्या के हल के कारक हुआ करते थे वे आर्थिक मंदी के चलते उपभोक्ता के लिए बड़े आर्थिक संकट का कारण बन रहे हैं। प्रतिष्ठा व सम्मान का मजबूत आधार माने जाने वाले ये कार्ड अब उंची ब्याज दरों की वजह से सिर पर बोझ साबित हो रहें हैं। हमारे देश में करीब 2 करोड़ 80 लाख क्रेडिट कार्ड धारी हैं, और इन उपभोक्ताओं ने करीब 30 करोड़ उधार बैंकों में लिया हुआ है। >प्रमोद भार्गव


वैश्विक मंदी में प्रासांगिक है गांधीवाद

बाजार में आई मंदी दुनिया भर में बेरोजगारों की संख्या में बढ़ोत्तरी कर रही है।मंदी से उपजी बेरोजगारी ने अनेक समस्यायें पैदा कर दी है। बेकारी की वजह से उत्पन्न आर्थिक तंगी से लोगों में विद्रोह की भावना पैदा रही है जिसका परिणाम हिंसक ही होगा। फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी मंदी की वजह से बेरोजगारी की समस्या विकराल हो गई है। >डॉ. सुनील शर्मा


पुरोहित की मंशा हिन्दू राष्ट्र बनाने की थी
फंड जुटाने के लिए टाटा और महिन्द्रा पर थी नजर

हिन्दू राष्ट्र का सपना देख रहे, मालेगांव धमाके के संदिग्धों ने टाटा मोटर्स व महिन्द्रा मोटर्स से मदद लेने की योजना बनाई थी, ताकि वह अपने संगठन 'अभिनव भारत' को चला सके, जिसे आपदा प्रबंधन समूह के चोले में छिपा >माटिन हफीज़


भूमि अभिलेखों का कंप्यूटरीकरण

राष्ट्रीय भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (नेशनल लैंड रिकॉड्र्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम-एनएलआरएमपी) 2008 यूपीए सरकार के कार्यकाल के अहम फैसलों में से एक है। इसके जरिए भूमि रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण करके भारत में आधिकारिक स्तर पर ई-शासन की शुरुआत की गई है। तो क्या यह माना जाय कि यह कार्यक्रम भूमि से जुडे मामलों के लिए क्रांतिकारी पहल है। >मिथिलेश कुमार


महिला सशक्तिकरण का आर्थिक पहलू

भारत में महिलाओं की स्थिति मिली-जुली है। कुछ महिलाओं का अपनी स्थिति पर पूर्ण नियंत्रण है तो कुछ महिलाएं काफी हद तक अपने पति, पिता या भाइयों पर आश्रित हैं। बहुत सी स्त्रियां ऐसी भी हैं, जिन्हं विचार तक करने की स्वतंत्रता नहीं है। कई महिलाएँ ऐसी मिलेंगी जो अकेले ही घर-गृहस्थी की गाड़ी चलाती हैं। ज़रूरी नहीं है कि वे पति के द्वारा त्याग दी गई हों या विधवा हों >स्वाति शर्मा


क्या होता है रिसोर्ट का सच?

सोमवार से शुक्रवार तक भाग-दौड़, ऑफिस आना-जाना, शरीर को थका देने वाला काम, बॉस की डाँट, घर लौटो, तो बच्चों का शोर, पत्नी की फरमाइशें, फिर ऑफिस का काम, तनाव.. तनाव..और केवल तनाव..। आखिर क्या करें? क्यों न इस बार वीक-एंड में शहर से दूर किसी रिसोर्ट में जाकर फ्रेश हो लें? कई साथी तो जाते ही हैं। वहाँ न तो परिवार की झंझट होगी, न शोर होगा, न बॉस होंगे, न ही होगी, >डॉ. महेश परिमल


16फरवरी2009

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