संस्करण: 16 अगस्त-2010

 

शिक्षा की अनिवार्यता पर प्रश्नचिन्ह

महेश बाग़ी

              ध्यप्रदेश में नौकरशाही बेलगाम और भ्रष्ट तो है ही, बेहद लापरवाह भी है। इसका ताज़ा उदाहरण है सर्वशिक्षा अभियान की विफलता। भारत सरकार ने गत वर्ष लोकसभा में बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम पारित किया था, जिसका राजपत्र में 27 अगस्त 2009 को प्रकाशन किया गया था। इस विधेयक के अनुसार देश के सभी राज्यों में 6 से 14 साल के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य है। विधेयक में यह प्रावधान किया गया था कि एक किलोमीटर के दायरे में जो भी शासकीय या अशासकीय स्कूल हैं, उनमें इन बच्चों को प्रवेश देना अनिवार्य है, यदि कोई अशासकीय स्कूल प्रवेश देने से मना करता है तो उसकी मान्यता रद्द कर एक लाख रुपए जुर्माना करने का प्रावधान भी विधेयक में किया गया है, अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि इन बच्चों से किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाए।

 

                देश की भावी पीढ़ी को शिक्षित करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा शिक्षा को अनिवार्य करने के इस कानून का स्वागत किया जाना चाहिए। केन्द्र इसके लिए राज्यों को धन भी उपलब्ध करवा रहा है। ऐसे में राज्य सरकारों का यह दायित्व है कि वे इसे गंभीरता से लें और अशिक्षा के कलंक को मिटाएं। इसे मध्यप्रदेश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि मध्यप्रदेश में सर्वशिक्षा अभियान शत प्रतिशत विफल रहा है। शिक्षा विभाग के आला अफसरान की नाकामी के चलते एक भी बच्चा इस अभियान से लाभान्वित नहीं हो सका है, उम्मीद थी कि अशासकीय स्कूलों में पांच लाख बच्चों को प्रवेश मिल जाएगा, किंतु इन स्कूलों में एक भी बच्चे को प्रवेश नहीं दिया गया है। ख़ास बात यह है कि शासन ने इसके लिए एक भी अधिकारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया है, निजी स्कूलों पर कार्रवाई की बात तो दूर की कौड़ी है।

 

                पहले सर्वशिक्षा अभियान की अवधि 31 जून तक तय की गई थी। इस दौर में स्कूली शिक्षा विभाग निज़ी स्कूलों में प्रवेश दिलाने में नाकाम रहा तो यह अवधि 31 जुलाई तक कर दी गई। इसके बाद भी अभियान परवान नहीं चढ़ सका। अधिकारी कागजी खानापूर्ति में लगे रहे और शासन ने इसकी समीक्षा करने की ज़रूरत तक महसूस नहीं की। नतीजतन सर्वशिक्षा अभियान पूरी तरह फ्लाप शो साबित हुआ। मध्यप्रदेश में प्रशासन की नाकामी का यह एकमात्र उदाहरण नहीं है। अधिकारियों की मनमानी के चलते अन्य क्षेत्रों में भी जनता को निराश होना पड़ रहा है। अब सूचना के अधिकार को ही लीजिए। पांच साल पहले यह अधिनियम देश भर में लागू कर दिया गया था। पिछले दिनों आई एक रिपोर्ट में बताया गया है कि मध्यप्रदेश में इस अधिनियम की सर्वाधिक दुर्गति हुई है। प्रशासनिक अधिकारी अपने कारनामों की जानकारी देने से कतरा रहे हैं, राज्य सूचना आयोग ऐसे अधिकारियों पर जुर्माना भी कर रहा है। इसके बावजूद अधिकारी सुधारने को तैयार नहीं हैं।

 

                इस स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार ने सिटीजन चार्टर अधिनियम पारित किया है, जिसमें अधिकारियों को एक निश्चित समय सीमा में आम जनता के काम पूरे करने होंगे। यदि ऐसा नहीं किया गया तो उन पर 200 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना किया जा सकेगा। इस कानून के लागू होने के बाद नौकरशाह सुधार जाएंगे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। राज्य सरकार का जन सुनवाई अभियान इसका जीता जागता उदाहरण है। इस अभियान के तहत शासन के हर विभाग में प्रति मंगलवार को लोगों की शिकायतें सुनी जा रही हैं। अब तक हुई जनसुनवाई में हजारों लोग रो-रोकर अपने साथ हुई बेइंसाफी बयान कर चुके हैं। शासन का जनसुनवाई अभियान कितना सफल रहा है, यह इसी से समझा जा सकता है कि इसमें आए आवेदनों में से अब तक एक प्रतिशत आवेदनों का भी निराकरण नहीं हो सका है। यदि यही हालत रही तो निकट भविष्य में लोग जनसुनवाई में जाना ही बंद कर देंगे।

 

            मध्यप्रदेश में नौकरशाही के बेलगाम होने के और भी कई मामले हैं। कई विधायकों ने शिकायत की है कि पुलिस आधीक्षक और कलेक्टर उनकी बात तक नहीं सुनते हैं। गृहराज्यमंत्री नारायण सिंह कुशवाह भी अधिकारियों के असहयोग का दुखड़ा सुना चुके हैं। इसके बाद भी सरकार कोई ठोस कक़दम नहीं उठा पाई हैं। प्रदेश के 48 विधायकों के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं हैं। ऐसे में अधिकारीगण हर विधायक को अपराधी की नज़र से देखते हुए उनकी बात को तवज्जों नहीं देते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि नौकरशाही की करतूतों पर अंकुश लगाने की बजाय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उसे ईमानदार, सद्चरित्र और विकासशील होने का प्रमाण् दे दिया हैं। जिस प्रदेश का मुखिया कामचोर और भ्रष्ट नौकरशाही की तरफदारी कर रहा है, उस प्रदेश का बेड़ा गर्क होने से कौन बचा सकता है ?
 

महेश बाग़ी