qसंस्करण: 16 अगस्त-2010  

हिंसक होते अध्यापक

सुनील अमर

      प्र क़े अलीगढ़ जनपद के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय की प्राधानाध्यापिका ने कक्षा तीन में पढ़ने वाली एक बालिका की डन्डे से इतनी पिटाई कर दी कि अगले दिन उसकी मौत हो गई। उसका कुसूर यह बताया जा रहा है कि उसने कोई बाल-सुलभ शरारत कर दी थी। घटना बीते पाँच अगस्त की है। अभी पिछले महीने दिल्ली में एक निजी स्कूल के अध्यापक ने एक छात्र को इस तरह आतंकित कर दिया कि वह विद्यालय की तीसरी मंजिल से कूद पड़ा। आजकल प्राय: ही इस तरह की घटनाऐं प्रकाश में आने लगी हैं। इससे इस चिंताजनक तथ्य का पता चलता है कि हमारा समाज भी धीरे-धीरे उसी तरह तनावग्रस्त और असहिष्णु होता जा रहा है, जैसा कि हम आर्थिक रुप से विकसित पश्चिमी देशों के बारे में समाचार माध्यमों में प्राय: ही सुनते रहते हैं। स्थिति इतनी घातक हो गई है, अब तो बच्चे अपने स्कूल बैग में अभिभावकों के असलहे भी रखकर लाने लगे हैं। उप्र क़ी इस ताजा घटना के बाद तो शासन ने एक आदेश जारी कर कहा है कि जिस भी विद्यालय में इस तरह की घटना होगी, उसके प्रबांक व प्राधानाचार्य प्राधानाध्यापक को भी दोषी मानकर कार्यवाही की जायेगी तथा विद्यालय की मान्यता भी समाप्त की जा सकती है।

      कबीर ने लिखा है - 'गुरू कुम्हार शिश कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट। भीतर हाथ सहार दै, उपर मारै चोट। ' यह उपर की चोट तब कारगर होती थी, जब गुरु के हृदय में कुम्हार का भाव रहता था। अध्यापकों द्वारा छात्रों को पीटकर दंडित किये जाने की बहुत प्राचीन परम्परा रही है। शिक्षा शास्त्री, लोकप्रिय शिक्षण पद्धितियों के अन्तर्गत पुरस्कार और दंड पद्धति को आज भी शामिल किये हुए हैं, लेकिन यह दंड प्रतीकात्मक ही होता रहा है। दरअसल, आज समाज का समूचा स्वरूप ही बदल गया है और तदनुसार आचार-व्यवहार भी। कारण भले ही अलग हों, लेकिन आज प्रत्येक व्यक्ति तनाव में जी रहा है। आज तो परिवार से अधिक तनाव आदमी को समाज से ही मिल रहा है। इसी तनाव को व्यक्ति गाहे-बगाहे समाज को लौटाता रहता है। वरिष्ठ समाजवादी चिन्तक जयशंकर पाण्डेय कहते हैं-भारतीय संस्कृति में गुरु सदा ही अनुकरणीय तथा पूज्य रहा है, किन्तु शिक्षा के व्यवसायीकरण ने इसे गुरु के आसन से उतारकर महज़ कर्मचारी बना दिया है। अयापक आज अत्याधिक तनाव में है।

      शिक्षा व्यवस्था के चार महत्त्वपूर्ण घटक होते हैं- अध्यापक, छात्र और उसका परिवार, शैक्षिक संस्थान और समाज। आज विडम्बना यह है कि यह सभी अलग-अलग दिशा में सोच रहे हैं। इनके उद्देश्य भी भिन्न-भिन्न हैं। यही वजह है कि आज शैक्षणिक परिस्थितियाँ बहुत जटिल होती जा रही हैं। वास्तव में किसी भी शिक्षण संस्थान का उद्देश्य छात्र को वेतन केन्द्रित व्यक्ति बनाना नहीं बल्कि उसमें आधारभूत मूल्य विकसित करना होना चाहिए। ऐसा ही पहले होता भी था किन्तु शिक्षा के बाजारीकरण ने इन मूल्यों को ही सबसे पहले वस्त किया, क्योंकि इस तरह के गुणों के चलते व्यावसायिक लाभ कमाना संभव नहीं था।

      नन्हें बच्चों को जिम्मेदार, जागरुक और संवेदनशील इंसान बनाने का गुरुतर दायित्व जिन शिक्षकों पर है, आखिर वे क्यों इस कदर संवेदनशून्य होते जा रहे हैं ? दरअसल यह शिक्षा के व्यवसायीकरण का साइड इफेक्ट है। प्राय: देखने में आता है कि मध्यम वर्ग का एक व्यक्ति जिस लक-दक मार्का स्कूल में शिक्षक का कार्य करता है, उसी स्कूल में धनाभाव के कारण वह अपने बच्चे को नहीं पढ़ा पाता। उपर से ये निजी संस्थान इंसान को इंसान नहीं मानते। शिक्षकों व शिक्षणेत्तर कर्मचारियों पर प्रबंधन का जबर्दस्त मानसिक दबाव रहता है। इन सबसे उसके अन्दर एक प्रकार की स्थायी कुंठा उत्पन्न होती है, जो अंतत: बच्चों के उपर हिंसा के रुप मे फूटती है।

     प्राचीनकाल से ही अध्यापन एक वृत्ति रही है, लेकिन अब इस भूमंडलीकरण के युग में यह व्यवसाय हो गयी है। पहले माता-पिता अपने अबोध बच्चे को गुरु की शरण मे दे देते थे। वह उसे रचता था। उसका मन-प्राण बनाता था। ऐसा वह इसलिए करता था कि उसके भीतर प्रकृति प्रदत्त 'टीचिंग एप्टीटयूड ' यानी अध्यापन कौशल होता था। आज सिर्फ नौकरी समझकर लोग अध्यापन के क्षेत्र में आ रहे हैं। इस क्षेत्र में आने वाले का कोई अध्यापन कौशल परीक्षण हो ही नहीं रहा है। छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए अध्यापक के अन्दर खास तौर पर इमोशनल इंटेलीजेंस यानी सांवेगिक बुद्विमत्ता अति आवश्यक होती है, लेकिन आजकल तो सारा जोर अंग्रेजी की लूएंसी यानी धाराप्रवाहिता पर है। यही असली योग्यता हो गयी है। यह देखने में आ रहा है कि छात्रों पर हिंसा उन विद्यालयों में ज्यादा हो रही है, जहाँ टारगेट-ओरियेन्टेड शिक्षा दी जा रही है। इससे हो यह रहा है कि इन शिक्षण संस्थाओं से योग्य नागरिक और छात्र नहीं, बल्कि प्रोडक्ट निकल रहे हैं। वे समाज को वही कुछ दे रहे हैं जो उन्हें अपने शिक्षकों से मिला है। गुरु-शिष्य संबंध में कबीर से ज्यादा किसी ने नहीं लिखा। 600 साल पहले पैदा हुए कबीर ने जितना सटीक लिखा है, उसे पढ़कर तो लगता है कि कबीर का युग भी ऐसा ही था क्या ! ' गुरुआ तो सस्ता भया, पैसा केर पचास। राम-नाम को बेचकर, करै शिष्य की आस। कबीर आगे कहते हैं-कबीर पूरे गुरु बिना पूरा शिष्य न होय। गुरु लोभी शिष्य लालची, दूनी दाँझन (तपन) होय।' आज स्थिति यह है कि सारी योग्यता धरी रह जाती है, और अपात्र और असामाजिक तत्व जुगाड़ लगाकर अध्यापन के क्षेत्र में आ जाते हैं। व्यावसायी प्रवृत्ति ऐसी हो गयी है कि योग्यता अधिक और वेतन कम ! इस अपमान से तनाव उत्पन्न होता है, जो अंतत: दुव्यवहार में बदल जाता है और इसका असर सिर्फ कार्य-स्थल ही नहीं, घर परिवार पर भी पड़ता है। निजी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक प्राय: ही कोई साइड जॉब करते देखे जाते हैं। कई बार तो यह साइड जॉब शिक्षणेत्तर भी होता है।

       समाज के धन केन्द्रित हो जाने के कारण आज सब कुछ पैसे से मापने और पैसे से हासिल करने की मानसिकता होती जा रही है। इसे सामाजिक पतन की पराकाष्ठा ही कहा जाना चाहिए कि उक्त प्रकार की तालीम हासिल कर आज जो नयी पीढ़ी समाज में है, निकट संबंधियों के मरने पर भी उसकी ऑंख में दिखावे के ही सही, ऑंसू नहीं आ पाते और उसे रोने के लिए किराये पर आदमी लाने पड़ते हैं। इस व्यवस्था ने रोने को भी धंधा बना दिया है ! बच्चे किसी भी देश के कर्णाधार होते हैं, और गुरु उनका निर्माण करने वाले। इस अति पवित्र तथा प्रणम्य संबंध में आ रही गिरावट और हिंसा निश्चित ही चिंतनीय है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि शिक्षा क्षेत्र को सिर्फ सरकार के भरोसे छोड़ देना चाहिए क्योंकि यह सिर्फ सरकार के बस का है ही नही, लेकिन इस पर सरकार का सख्त नियंत्रण होना ही चाहिए। सरकार दुकानों और मकानों का मानक अगर मुस्तैदी से तय करा सकती है तो शिक्षण् संस्थानों और शिक्षकों का मानक स्थापित करना तो किसी भी व्यवस्था का प्राण तत्व होता है। एक शिक्षक का कार्य निश्चित ही बहुत चैलेन्जिंग और गंभीर होता है, और अनुशासन के बगैर यह संभव नहीं लेकिन अनुशासन की यह चोट अंतर यानी हृदय में सहारा देकर ही करनी होगी। बिना सहारा दिये चोट करने से कच्चा घड़ा निश्चित
ही टूट जाएगा।
 

सुनील अमर