संस्करण: 16 अगस्त-2010  

 

जातीय भावना को सरकार ने
वैध ठहरा दिया ?
 

अंजलि सिन्हा

       मेठी के पिछौरा गांव के जुनियर हाईस्कूल ने मिड डे मील पर उठी और पूरे सूबे में चर्चा का सबब बनी समस्या का ''समाधान'' निकाल लिया है। तय किया गया है कि दलित रसोइये की भी नियुक्ति होगी लेकिन वह रसोई के बाहर ही काम करेगी और अन्दर वाला काम यानिकि चूल्हे पर रसोई पकाने का काम सवर्ण रसोइया करेगी। आजाद, सम्प्रभुता सम्पन्न कहे जाने वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जिसके संविधान में जाति जेण्डरभेद की मनाही है वहां यह रास्ता ''शान्तिपूर्वक'' ढंग से निकाल लिया गया है। प्राइमरी या जूनियर स्कूल की कच्ची उम्र के बच्चों का दबाव इतना तगड़ा था या सवर्णों की दबंगई या कथित सहअस्तित्व की भावना जिसके कारण बच्चों की पढ़ाई का अब और नुकसान न हो यह कहते हुए समाधान पर सहमति बना ली गयी ।

            मालूम हो स्कूलों से छुआछूत की भावना खतम हो इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने रसोइये के पद पर नियुक्ति के लिए अप्रैल 2010 को शासनादेश निकाला था और दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था दी थी। और जगह जगह इसके विरोध की ख़बरें आयी थीं। कानपुर के सन्दलपुर ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय की ख़बर राष्ट्रीय सूर्खियां बनी थीं जिसमें विद्यालय के सवर्ण बच्चों ने दलित महिला के हाथ से बनाया मिड डे मिल खाने से इन्कार कर दिया था। मामले की जांच में उजागर हुआ था कि इस प्राथमिक विद्यालय में 135 बच्चे पंजीकृत हैं। इनमें 31 बच्चे दलित वर्ग के , 19 पिछड़े और 85 सामान्य वर्ग के है। बताया गया कि पिछले साल तक तो दो सवर्ण महिलाएं मीना और सुमन खाना बनाती थी लेकिन इस साल ग्रामपंचायत ने शान्ति नामक दलित महिला को इसके लिये चुना। ग्राम पंचायत का यह कदम सराहनीय माना जाना चाहिये था कि उन्होने एक बनन इसके माध्यम से तोड़वाने का प्रयास किया ताकि बच्चों के जेहन से कमसे कम यह उंचनीच खतम होगा। लेकिन स्पष्ट है कि लोगों के मन में वर्ण मानसिकता ने जितनी गहरी पकड़ जमायी है वह अपना असर दिखा गयी।

           तुतलाती जुबां में बच्चों ने 'फलां' के हाथ का बना खाना खाने से इन्कार कर दिया था। जाहिर था कि उन्हें पढ़ा कर, रटवा कर वहां भेजा गया था। अन्तत: बच्चों द्वारा मिड डे मील नहीं खाने से खड़े हुए वितण्डा को समाप्त करने के लिए प्रदेश सरकार ने 22 जुलाई को यह व्यवस्था समाप्त कर दी। इस कदम से आखिर किसकी जीत हुई ? संविधान द्वारा प्रदत्त मूल्यों की हार हुई और सदियों से कायम जातिवादी मानसिकता जीत गयी।

          ध्यान रहे कि यह अकेले उत्तर प्रदेश का ही मामला नहीं है। इधर बीच सूबा उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के कई अन्य हिस्सों के प्रायमरी स्कूलों से इसी किस्म की ख़बरें सुनने को मिल रही हैं। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जातिभेद की भावना से ग्रस्त नागरिक समाज के ऐसे व्यवहार एवम नौकरशाही में भी उसकी दिखनेवाली छाप को देखते हुए क्या किया जाना चाहिए ?

        अगर हम राजधानी दिल्ली के ही बाहरी इलाकों के सरकारी स्कूलों में अध्ययनरत गरीब जातियों, समुदायों के बच्चों से बात करके भी अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि अन्य स्थानों पर किस तरह की स्थिति होगी। मालूम हो कि इन स्कूलों में वर्ण समुदाय से आनेवाले शिक्षकशिक्षिकाओं का निम्न तबके से आनेवाले छात्रों के साथ सम्मानजनक व्यवहार कत्तई नहीं होता है और ऐसे बच्चों के साथ कार्यरत संस्थाओं का अनुभव यही होता है कि उन्हें बार बार अपनी जात याद दिलायी जाती है। दिल्ली के ही समयपुर बादली इलाके में गरीब बच्चों के लिए सांयकालीन कक्षा चलाने का भी अनुभव इसी किस्म का रहा है, जहां यह देखने में आता था कि ऐसे कमजोर बच्चों के साथ अयापक बुरी तरह पेश आते थे और उन्हें बिना कारण पीट देते थे।

         मालूम हो कि जाति आधारित यह विभाजन केवल दलित और सवर्णों के बीच नहीं है बल्कि एक ही जाति के भीतर की उपजातियों के बीच की खाई भी गहरी है। एक बार उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के एक गांव में महिलाओं के साथ एक कार्यशाला चल रही थी। यूं तो बात जेण्डर बराबरी की हो रही थी , औरत के हक की बात हो रही थी ओर समाज में होनेवाले अन्यायों के खिलाफ सहमति बनती सी दिख रही थी। कार्यशाला के तीसरे दिन जब आयोजकों ने महिलाओं को रात में खाने पर एक ही पात में बिठा दिया तो कुछ महिलायें अलग होकर लगभग झगड़ने के मूड़ में आ गयी। पता चला की उधर जातियों में चेरो और खैरवार जो दोनो कूर्मी या इसी तरह की किसी जाति की मानी जाती है वे एक पांत में एक दूसरे का छुंआ हुआ नहीं खाती है। हम दो लोग जो बतौर रिसोर्स पर्सन दिल्ली से गये थे उन्हें अपनी तीन दिन की चर्चा बेकार ही लगी हालांकि तीन दिन में क्या कुछ बदलता है लेकिन उम्मीद इसलिये बन गयी थी क्योंकि ये सभी प्रतिभागी किसी संस्था के कार्यकर्ता थी और वे गांव में समाजसुधार , स्त्रीउत्पीड़न आदि के खिलाफ काम करने के लिये नियुक्त की गयी थी और उन्हें तनख्वाह भी मिलती थी।

         दरअसल हर विद्यालय में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि खाना बनाने या पानी पिलाने आदि जैसे काम जो विशिष्ट समुदायों के लिए प्रतिबनित रहे हैं वह उन्हें ही सौंपे जाय। जुबानी तौर पर लोग यही कहते हैं कि वे भेदभाव नहीं करते लेकिन पता तो तभी चलता है जब बनाया गया खाँचा टूटता है। कमसे कम नयी पीढ़ी को इस जातिवादी मानसिकता से मुक्ति मिल सकती है। मामला अब सिर्फ समझाने का नहीं है बल्कि सरकारीगैरसरकारी दोनो स्तरों पर नियम बनाकर उन्हे दृढता से लागू कराने का भी है। यद्यपि जागरूकता अभियानों की अपनी भूमिका होती है लेकिन भेदभाव बरतनेवालों को सिर्फ जानकारी नहीं चाहिए कि ऐसा व्यवहार गलत है बल्कि उन्हें यह भी पता चलना चाहिए कि ऐसा करना अपराध है जिसके लिए उन्हें दण्डित भी किया जा सकता है। सोचने की जरूरत है कि अगर चन्द वर्चस्वशाली लोगों के दबाव में बराबरी ला सकनेवाले कानूनों का खारिज किया जाता रहेगा तो क्या भारत में लोकतंत्र का भविष्य सुरक्षित रह सकेगा।
 

अंजलि सिन्हा