संस्करण: 16 अगस्त-2010   

चेहरों से भद्र, जुबान से अभद्र
कड़वे बोल हो गये कुछ नेताओं के शस्त्र

 

राजेंद्र जोशी

          भारत को महान 'यू' ही नहीं कहा जाता। हर क्षेत्र में भारत ने विश्व में अपना परचम फहराया है। कला, साहित्य, संस्कृति, शिक्षा, राजनीति, विज्ञान, आध्यात्म, खेल, आयुर्वेद, योग, उद्योग, व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में भारत की संतानों ने फतह पाई है। अपनी अग्रणी भूमिका के कारण ही भारत को विश्वगुरु का संबोधन हासिल हुआ है। संतों ऋषि-मुनियों और अनेक महान विशेषज्ञों ने अपने विचारों, ज्ञान और शोधकार्यों से संपूण्र्  विश्व में रोशनी फैलाई है। भारत की तुलना चन्द्रमा से भी की जा सकती है जो जग को अंधियारे में प्रकाश तो देता है साथ ही अपने कर्म और धर्म के नाते वह संपूर्ण सृष्टि को शीतलता भी प्रदान करता है। धरती का वह सहोदर भी है। लेकिन शीतलता का एहसास कराने वाले इस प्रकाश-दीप चन्द्रमा में लोग काले दाग का कलंक भी देखते हैं। भारत भी कुछ इसी तरह के अनर्गल दागों से परिभाषित किया जाने लगा है।

          भारत माता के शुभ्र आंचल पर यदि कोई दाग-धब्बे उभरते दिखाने लगे हैं तो वे है वर्तमान राजनीति में चल रही अनर्गल बयानबाजी के अनुशासनहीन और अमर्यादित आचरणों के मनगढ़ंत आरोप-प्रत्यारोप के और सत्ता की भूख मिटाने के लिए चलाए जा रहे षडयंत्रों और हथकंडों के। चंद्रमा के काले दाग के बारे में तो कई तरह की कहानियां हैं जो इन दागों की सकारात्मकता को भी उजागर करती हैं। जैसे एक बुढ़िया सूत कात रही है, पृथ्वी की छवि जिसमें बड़े-बड़े पहाड़ और जंगल की प्रतिच्छाया उसमें बताई जाती है तो कोई मानता है कि कुदरत ने अपने इस सुंदर सलोने और हृदय को सुकून देने वाले बालक चांद के गाल पर काजल का दिठौना लगा दिया है ताकि उसे किसी डायन की नज़र न लग जाय। इधर भारत को कलंकित करने वाले दागों की कहानियां नकारात्मकता का संदेश देती हैं।

         'महंगाई डायन' ने इस देश को जितना नहीं खाया है, उससे कहीं ज्यादा अनर्गल राजनीति इसकी गरिमा को कुतरती जा रही है। महंगाई क्या होती है ? वह क्यों बढ़ती है ? उससे देश की आर्थिक स्थिति पर कितना सकारात्मकता का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ? यह सब जानते हैं। अर्थशास्त्र और वाणिज्य पढ़ने वाला छोटी-सी छोटी क्लास का विद्यार्थी इस स्थिति से पूरी तरह अवगत है। राजनैतिक लोग भी महंगाई की हकीकत से पूरी तरह वाकिफ रहते हैं। राजनैतिक प्राप्ति के लिए आमजनों की भावनाओं को भड़का भड़का कर वातावरण को पूरी तरह कनफ्यूज़ करते रहते हैं ताकि उनकी राजनैतिक पार्टी ही आमजनों की हमदर्द दिखती रहे। अंदर से भले ही उतनी हमदर्दी नहीं होती जितनी की ऊपर से दिखाने की साजिशें की जाता है। यह सच है कि बढ़ती महंगाई का दुष्प्रभाव आम जनता पर पड़ रहा है, और उनका यह दर्द भी समझ में आता है कि ''सखी सैंया तो भौत ही कमात है, महंगाई डायन'' खात है।'' लेकिन महंगाई से डायन यदि कोई बड़ी डायन है तो वह है जनतांत्रिक मूल्यों को भीतर ही भीतर दीमक की तरह चाट जाने वाली राजनीति के भीतर की बयानबाजी के कड़वे बोल।

        सचमुच स्वस्थ्य राजनीति ही मज़बूत लोकतंत्र का आधार स्तम्भ है किंतु राजनेताओं के आचरण और व्यवहारों में इन दिनों जिस तरह के विकार आते जा रहे हैं उनसे उनकी सोच का खोखलापन सामने आ ही रहा है, साथ ही उनकी दक्षता और क्षमता पर भी प्रश्न उठने लगे हैं। भद्रता का आवरण ओढ़े जब किसी राजनेता की जुबान से अभद्रता के शब्द झरने लगते हैं तब राजनैतिक शुचिता की दुहाई देने वालों के दोहरे रंग सहज ही जनता के सामने आ जाते हैं। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप चलते रहना स्वाभाविक है किंतु बयानबाजियों में बौखलाहट झलकना और आपे से बाहर होकर दूसरे राजनैतिक दलों के नेताओं के व्यक्तिगत जीवन पर कटाक्ष कर एक तरह से उनकी मज़ाक बनाने जैसे कृत्य इन दिनों की राजनीति की लड़ाई के अस्त्र-शस्त्र होते जा रहे हैं। कौन किसका बाप है, कौन किसका दामाद है या किस राजनैतिक दल के नेता ने किस अपराधिक व्यक्ति के साथ अपनी बेटी ब्याह दी है। इस तरह के जुमले जनसभाओं और मीडिया में उछालकर कतिपय भद्र दिखने वाले सत्ता और संगठनों के उच्च पदों पर बैठे लोगों के भाषणों के इन दिनों विषय होते जा रहे हैं। ऐसे भाषणों के कारण यदि कहीं विरोध होने लगता है तो कतिपय बड़े-बड़े मलंग नेता 'साम, दाम, दंड और भेद' के माध्यम से अपने विरोध में उठ रहे स्वरों को कुचल देते हैं, यही उनकी राजनीति की सबसे बड़ी शक्ति होती है।

         देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था के कुशल और सफल संचालन के लिए एक स्वस्थ्य और खुली राजनीति की ज़रूरत है। किंतु सत्ता की भूख ने राजनैतिक पार्टियों को इतना अधिक नीचे तक ला दिया है कि नैतिकता और अमर्यादाओं की सीमा रेखाएं उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। जिस प्रजातांत्रिक प्रणाली में प्रत्येक नागरिक को सत्ता में भागीदारी का हक मिला है उसका राजनीति से ही गुजर तक मंजिल तक जाता है। उसी राजनीति की स्वस्थ्य परंपराओं को संरक्षित रखने और उसकी शुचिता और गरिमा को बढ़ाते रहने में प्रत्येक राजनैतिक दल की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए। यदि राजनैतिक दल और उनके नेता एक मजबूत जनतंत्र का प्राण कहे जाने वाली स्वस्थ्य राजनीति की परंपराओं को विघटित करते जायेंगे और अपनी फ़िजूल और औचित्यहीन बयानबाजियों से बाज नहीं आयेंगे तो भारतीय राजनीति का परिदृश्य सिर्फ और सिर्फ मज़ाक बनकर रह जायगा।

राजेंद्र जोशी