संस्करण: 16 अगस्त-2010

आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को
दूर करने में गंभीर भूलें हो रही हैं
 




 

एलएसहरदेनिया

 

                       दि प्रशासन एवं पुलिस ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ की तरह मध्यप्रदेश भी नक्सलियों का गढ़ बन जाएगा। इस आशंका व संदेह के संकेत भोपाल में आयोजित एक जनसुनवाई के दौरान मिले।

        जनसुनवाई का आयोजन प्रदेश में ''अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 एवं नियम 2008'' के क्रियान्वयन की प्रगति का लेखाजोखा लेने के लिए किया गया था। सुनवाई में अपनी समस्याएं रखने के लिए प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में आदिवासी आए थे

        सभी की शिकायत थी कि इस कानून पर ईमानदारी से अमल तो दूर रहा, पहले से ही उन्हें प्राप्त अधिकारों को उनसे छीनने के लिए तरह-तरह के जुल्म किए जा रहे हैं। इसी तारतम्य में सर्वाधिक सनसनीखेज और दिल दहलाने वाली गाथा, कटनी जिले से आए आदिवासियों से सुनने को मिली। उन्होंने बताया कि हमें अपनी जमीन से बेदखल करने के लिए यह आरोप लगाकर गिरतार कर लिया गया कि हम नक्सली हैं। गिरफ्तार करने के पहले हमें कपड़े पहनने तक का मौका नहीं दिया गया। हममें से कुछ केवल चड्डी पहने हुए पुलिस के साथ गए। गिरफ्तार करने के बाद हमें अज्ञात स्थान पर ले जाया गया। गिरफ्तारी भी देर रात हुई। गिरफ्तारी की सूचना उनके परिवारजनों को कई दिनों तक नहीं दी गई।

                 गिरफ्तार किए गए एक युवक ने बताया कि जब काफी दिनों तक हमें मुक्त नहीं किया गया तब पीड़ित परिवारों की महिलाओं ने यह घोषणा करते हुए आंदोलन प्रारंभ कर दिया कि आंदोलन तब तक समाप्त नहीं होगा जब तक सभी लापता पुरूष घर वापस नहीं आ जाते। कुछ दिनों बाद हमें रिहा किया गया। इस दौरान हमारे खेतों में वृक्षारोपण कर दिया गया ताकि हम अपनी जमीन पर खेती न कर पाएं। कटनी जिले के ाीमाखेड़ा के इन युवकों का आरोप था कि यह कार्यवाही कुछ दबंगों के इशारे पर की गई। अब हमसे कहा जा रहा है कि इस जमीन पर हमारा हक नहीं है।

               सन् 2006 में बने इस कानून के मायम से कई पीढ़ियों से वनों में निवास कर रहे अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों की वन संपदा पर अधिकार को मान्यता दी गई थी। किन्तु उन अधिकारों को अभिलिखित नहीं किया गया है। इस कानून की भूमिका में इस बात को स्वीकार किया गया है कि ''औपनिवेशिक काल के दौरान तथा स्वतंत्र भारत में शासकीय वनों में अनुसूचित जनजातियों व परंपरागत वनवासियों की उनकीपैतृक भूमि पर अधिकारों को पर्याप्त परिमाण में मान्यता नहीं दी गई थी जिसके परिणामस्वरूप वनों में निवास करने वाले इन वर्गों के प्रति ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। ये वर्ग वनों बचाने और बनाए रखने में महत्वपूण्र्  भूमिका निभाते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि वनों में निवास करने वाले जनजाति और अन्य परंपरांगत वन निवासियों की, जिनके अन्तर्गत वे जनजातियां भी हैं जिन्हें राज्य के विकास से उत्पन्न हस्तक्षेप के कारण अपना निवास दूसरी जगह बनाने के लिए मजबूर किया गया था, लंबे समय से चली आ रही भूमि संबंधी असुरक्षा तथा वनों में पहुंच के अधिकार पर ध्यान दिया जाए।''

               इस कानून के जरिए आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के प्रयास उन सभी राज्यों में प्रारंभ किए गए जहां बड़ी संख्या में आदिवासी रहते हैं। मध्यप्रदेश उन राज्यों में से एक है। कानून के अनुसार, आदिवासियों और अन्य जंगलवासियों को उस भूमि पर अधिकार दिए जाने थे, जिसपर वे काबिज थे। व्यक्तिगत अधिकार के साथ साथ सामुदायिक अधिकार भी दिए जाने थे। इसके लिए संबंधित लोगों को अपने दावे पेश करने थे।

              मध्यप्रदेश में दिनांक 31 जुलाई 2010 तक 4 लाख 351 दावे पेश किए गए। इनमें से ग्राम सभाओं ने 3 लाख 96 हजार दावों को मंजूर किए जाने की सिफारिश की। ग्राम सभाओं की सिफारिशें अनुभाग स्तरीय समिति के समक्ष पेश की गईं जिन्होंने 3 लाख 89 हजार सिफारिशें मंजूर कीं। परंतु जिला स्तरीय समिति ने 1,23,246 दावे ही स्वीकार किए। इस तरह 2,57,603 दावे खारिज कर दिए गए।

             उपरोक्त आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि जिन लोगों को व्यक्तिगत पट्टा दिया गया उन्होंने कितनी एकड़ भूमि के लिए आवेदन किया था। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि सामुदायिक संसाधनों पर अधिकार का एक भी दावा स्वीकृत नहीं किया गया। वनग्रामों में रहने वाले लोगों के अधिकार पत्रक के बारे में क्या हुआ, यह भी स्पष्ट नहीं है।

              आदिवासियों के अधिकारों के लिए संघर्षरत विजय भाई के अनुसार दावा पेश किया जाना है, इसका पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं हुआ। आखिर बहुसंख्यक आदिवासी अपढ़ हैं। उनसे यह अपेक्षा करना कि वे दावा फार्म भर लेंगे, उचित नहीं है। शायद उन्हें तो पता ही नहीं होगा कि दावा फार्म भरे जा रहे हैं। लगता है सारा काम बतौर रस्म अदायगी हुआ।

               कानून का क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो रहा है इस संबंध में अनेक शिकायतें भारत सरकार के पास पहुंची हैं। इन शिकायतों के संदर्भ में केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने राज्यों का ध्यान आकर्षित किया है। राज्यों को भेजी एक विस्तृत टिप्पणी में गृह मंत्रालय ने इस बात पर चिंता प्रगट की है कि वन विभाग द्वारा आदिवासियों पर ज्यादतियां की जा रही हैं। वन विभाग को मुख्य रूप से वनों के प्रबंधन का काम सौंपा गया है। उसे अपनी सीमाओं में रहकर काम करना चाहिए। गृह मंत्रालय की टिप्पणी में कहा गया है कि वन विभाग ने उस भूमि को हड़प लिया है जो मालगुजारी समाप्त होने के बाद सरकार को सौंप दी गई थी। वन कानून के अन्तर्गत, उन लोगों को अपना दावा पेश करने का मौका दिया गया है जो जमीन पर काबिज हैं। उन्हें जमीन पर काबिज होने का अधिकार है कि नहीं, यह बताने का मौका भी उन्हें दिया गया है। परंतु यह चिंता की बात है कि इस तरह के 70 प्रतिशत दावे निरस्त कर दिए गए हैं। यह भी ज्ञात हुआ है कि दावे निरस्त करने का निर्णय संबंधित व्यक्ति को सुने बिना किया गया है। यह भी बताया गया है कि दावे निरस्त करने के लिए स्पष्ट व पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाईगई है।

                 केन्द्रीय गृह सचिव ने इस बात पर चिंता प्रगट की है कि वन विभाग के नक्शों में गैर-वन भूमि को भी दिखाया गया है जो किसी प्रकार से उचित नहीं है। गृह सचिव के नोट में इस बात का उल्लेख भी है कि वनों के उचित प्रबंधन के लिए वन प्रबंधन समितियां बनाई गई हैं परंतु वन विभाग के अधिकारियों की दादागिरी और भ्रष्ट आचरण के कारण ये समितियां ठीक ढंग से अपना उत्तरदायित्व निर्वहन नहीं कर पा रही हैं। गृह सचिव ने इस बात पर जोर दिया है कि वन विभाग और वन प्रबंधन समितियों की भूमिका पर पुनर्विचार होना चाहिए।

                 अनुसूचित जनजाति अधिनियम के संबंध में केन्द्र सरकार के अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्रालय की ओर से भी एक विस्तृत दिशानिर्देश जारी हुआ है। इस संबंध में इस मंत्रालय ने एक बैठक भी आयोजित की थी। केन्द्रीय अनुसूचित जनजाति सचिव जी बी मुखर्जी के हस्ताक्षर से जारी पत्र में बताया गया है कि अभी हाल में इस कानून के क्रियान्वयन पर विचार किया गया। विचार के दौरान यह पाया गया कि यद्यपि कानून के क्रियान्वयन में काफी प्रहुई है परंतु एक राय यह भी प्रगट की गई कि क्रियान्वयन और बेहतर हो सकता है। यह बात भी सामने आई है कि बड़ी संख्या में आदिवासियों के दावे अस्वीकार किए गए हैं। इसके अलावा, कानून के क्रियान्वयन में अनुकी कमी एवं अन्य दिक्कतें भी आड़े आ रही हैं। बैठक में उन मुद्दों को तय किया गया जिनसे बेहतर क्रियान्वयन संभव हो सकेगा इस तरह यह स्पष्ट है कि कानून के क्रियान्वयन में हुई गंभीर भूलों को न सिर्फ आदिवासियों के बीच काम करने वालों ने उजागर किया है वरन् केन्द्र सरकार ने भी इन गंभीर कमियों को स्वीकार किया है यदि इन कमियों को दूर नहीं किया गया तो आदिवासियों का गंभीर नुकसान हो जाएगा। इस तरह की गलतियां, जो शायद जानबूझकर की जा रही हैं, का नतीजा बड़े पैमाने पर आदिवासियों का विस्थापन भी हो सकता है।


एलएसहरदेनिया