संस्करण: 15 सितम्बर- 2014

संदर्भः- आधी से अधिक सजा काट चुके विचाराधीन कैदियों के पक्ष में

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला नागरिक अधिकारों की रक्षा की पहल

? प्रमोद भार्गव

         य आरोप की आधी से अधिक सजा काट चुके विचाराधीन कैदियों के परिप्रेक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला मानवीय संवेदना और नागरिक आधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। इस फैसले की दृष्टि में उन कैदियों को राहत मिलेगी,जिन पर गंभीर व जघन्य आपराध दर्ज नहीं हैं। इस कार्रवाई से जेलों में भीड़ कम होगी। साथ ही जेलों में अपराधियों के बीच खूनी-संघर्ष के जो हालात बन जाते हैं,उनमें भी कमी आएगी। इससे जेल के हालात सुधरेंगे और जेल-कर्मियों पर मानसिक दबाव में कमी आएगी। यह ऐतिहासिक फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि हमारी अदालतों से क्षमता से कई गुना मामले विचाराधीन हैं,जिनका वर्षों तक निराकरण होने की कोई उम्मीद नहीं है। ज्यादातर ऐसे कैदी गरीब परीवारों से होते हैं,इसलिए वे अपने पक्ष की ठीक से पैरवी नहीं करा पाते। लिहाजा अधिकतम विचाराधीन मुजरिम अपने उपर लगे इल्जाम की संभावित अधिकतम सजा से कहीं ज्यादा समय कारागार में गुजारने के बावजूद फैसले की बाट जोहते रहते हैं।

                 न्यायिक सिद्धांत का तकाजा तो यही है कि एक तो सजा मिलने से पहले किसी को अपराधी न माना जाए,दूसरे आरोप का सामना कर रहे व्यक्ति का फैसला एक तय समय-सीमा में हो जाए। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे यहां ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। इसकी एक वजह न्यायालय और न्यायाधीशों की कमी बताई जाती है। इस स्थिति को आंशिक सत्य तो माना जा सकता है,लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। मुकदमों को लंबा खींचने की एक वजह अदालतों की कार्य- संस्कृति भी है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति राजेंद्रमल लोढ़ा ने कहा भी है न्यायाधीश भले ही निर्धारित दिन ही काम करें,लेकिन यदि वे कभी छुट्टी पर जाएं तो पूर्व सूचना अवश्य दें। ताकि उनकी जगह वैकल्पिक व्यवस्था की जा सके। इस तथ्य से यह बात सिद्ध होती है कि सभी अदालतों के न्यायाधीश बिना किसी पूर्व सूचना के आकस्मिक अवकाश पर चले जाते हैं। गोया,मामले की तारीख आगे बढ़ाना पड़ती है।

               यही प्रकृति वकीलों में भी देखने में आती है। हालांकि वकील अपने कनिष्ठ वकील से अकसर इस कमी की वैकल्पिक पूर्ती कर लेते हैं। लेकिन वकील जब प्रकरण का ठीक से अध्ययन नहीं कर पाते अथवा मामले को मजबूती देने के लिए किसी दस्तावेजी साक्ष्य को तलाश रहे होते हैं तो वे बिना किसी ठोस कारण के तारीख आगे खिसकाने की अर्जी लगा देते हैं। विडंबना यह भी है कि बिना कोई ठोस पड़ताल किए न्यायाधीश इसे स्वीकार भी कर लेते हैं। तारीख बढ़ने का आधार बेवजह की हड़तालें और न्यायाधीशों व अधिवक्ताओं के परिजानों की मौंते भी हैं। ऐसे में श्रद्वांजली सभा कर अदालतें कामकाज को स्थगित कर देती हैं। न्यायमूर्ति लोढ़ा ने इस तरह के स्थगन और हड़तालों से बचने की सलाह दी है। लेकिन जिनका स्वार्थ मुकदमों को लंबा चलाने में अंतर्निहित है,वहां ऐसी नसीहतों की परवाह करता कौन है ? लिहाजा लड़ाई बरतते हुए कठोर नियम-कायदे बनाने का अधिकतम अंतराल 15 दिन से ज्यादा का न हो,दूसरे अगर किसी मामले का निराकरण समय-सीमा में नहीं हो पा रहा है तो ऐसे मामलों को विशेष प्रकरण की श्रेणी में लाकर उसका निराकरण त्वरित और लगातार सुनवाई की प्रक्रिया के अंतर्गत हो। ऐसा होता हैं तो मामलों के निपाटने में तेजी आ सकती है। कई मामलों में गवाहों की अधिक संख्या भी मामले को लंबा खींचने का काम करती है। ग्रामीण परिवेश और बलवों से जुड़े मामलों में ऐसा अक्सर देखने में आता है। इस तरह के एक ही मामले में गवाहों की संख्या 50 तक देखी गई है। जबकि घटना के सत्यापन के लिए दो-तीन गवाह र्प्याप्त होते हैं। इतने गवाहों के बयानों में विरोधाभास होना संभव है। इसका लाभ वास्तविक अपराधी को मिलता है। इसी तरह चिकित्सा परीक्षण से संबंधित चिकित्सक को अदालत में साक्ष्य के रूप में उपस्थित होने से छूट दी जाए। क्योंकि चिकित्सक गवाही देने से पहले अपनी रिपोर्ट को पढ़ते हैं और फिर उसी इबारत को मुहंजबानी बोलते हैं। लेकिन ज्यादातर चिकित्सक अपनी व्यस्ताओं के चलते पहली तारीख को अदालत में हाजिर नहीं हो पाते। लिहाजा चिकित्सक को साक्ष्य से मुक्त रखना उचित है। इससे रोगी भी स्वास्थ्य सेवा से वांचित भी नहीं होंगे। एफएसएल रिपोर्ट भी समय से नहीं आने के कारण मामले को लंबा खींचती है। फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाओं की कमी होने के कारण अब तो सामान्य रिपोर्ट आने में भी एक से ड़ेढ़ साल का समय लग जाता है। अब प्रयोगशालाओं में ईमानदारी नहीं बरतने के कारण संदिग्ध रिपोर्टें आ रही हैं। लिहाजा इन रिपोर्टों की क्या वास्तव में जरूरत है,इसकी भी पड़ताल करने की जरूरत है। क्योंकि एफएसएक की तुलना में डीएनए जांच कहीं ज्यादा विश्वसनीय है। जाहिर है,इस दिशा में सुधार की जरूरत है।

               अदालतों में मुकादमें की संख्या बढ़ाने में राज्य सरकारों का रवैया भी जिम्मेवार है। वेतन विंसगतियों को लेकर एक ही प्रकृति के कई मामले उपर की अदालतों में विचाराधीन हैं। इनमें से अनेक तो ऐसे प्रकरण हैं,जिनमें सरकारें आदर्श व पारदर्शी नियोक्ता की शर्तें पूरी नहीं करतीं हैं। नतीजतन जो वास्तविक हकदार हैं,उन्हें अदालत की शरण में जाना पड़ता है। कई कर्मचारी सेवानिवृति के बाद भी बकाए के भुगतान के लिए अदालतों में जाते हैं। जबकि इन मामलों को कार्यपालिका अपने स्तर पर निपटा सकती है। हालांकि कर्मचारियों से जुड़े मामलों का सीधा संबंध विचाराधीन कैदियों की तदाद बढ़ाने से नहीं है,लेकिन अदालतों में प्रकरणों की संख्या और काम का बोझ बढ़ाने का काम तो ये मामले करते ही हैं। इसी तरह पंचायत पदाधिकारियों और राजस्व मामलों का निराकरण राजस्व न्यायालयों में न होने के कारण न्यायालयों में प्रकरणों की संख्या बढ़ रही है। जीवन बीमा,दुर्घटना बीमा और बिजली बिलों का विभाग स्तर पर न निपटना भी अदालतों पर बोझ बढ़ा रहे हैं।   इन्हीं कारणों से जेल में जितने कैदी है,उनमें से 66 प्रतिशत विचाराधीन हैं। यानी उन पर अपराध तय होना शेष है। अकेले सुप्रीम कोर्ट में करीब 66 हजार मामले लंबित हैं। सभी अदालतों में लंबित मामलों की संख्या तीन करोड़ से उपर बताई जा रही है। एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 4 लाख कैदी है,जिनमें से ढाई लाख के करीब विचाराधीन हैं। देश में केंद्रीय,जिला उप,महिला और खुले कारागार मिलाकर 1382 कारागार हैं। जिनमें तीन लाख 30 हजार कैदियों को सुरक्षित रखने की क्षमता है। जबकि कैदियों की संख्या कहीं अधिक है। कारागारों में विचाराधीन कैदियों की बड़ी तादाद होने का एक बड़ा कारण न्यायायिक,राजस्व और उपभोक्ता अदालतों में लेटलतीफी और आपराधिक न्याय प्रक्रिया की असफलता को माना जाता है। लेकिन अदालतें इस हकीकत को न्यायालयों और न्यायाधीशों की कमी को आधार मानकर नकारती रही हैं। वर्तमान में देश में कुल 14 हजार अदालतें हैं। जिनमें 17,945 न्यायाधीशों के पद हैं। समय पर न्याय देने का तकाजा पूरा करने की दृष्टि से अदालतों की संख्या बढ़ाकर 18,847 और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 21,595 करने की मांग उठ रही है। लेकिन केंद्र व राज्य सरकारें इस दिशा में मुस्तैद दिखाई नहीं देतीं। गोया,यहां कुछ समय पहले दिया न्यायाधीश आरएम लोढ़ा का यह बयान महत्वपूर्ण है कि जब चिकित्सालय साल में 365 दिन काम करते हैं तो अदालतें ऐसा क्यों नहीं कर सकती ? बहरहाल राष्ट्रीय दायित्व मानते हुए अदालतें इस बयान को संकल्प के रूप में लेकर अपने काम के कुछ घंटे ही बढ़ा दें तो विचाराधीन मामलों में अप्रत्याक्षित कमी लाई जा सकती है।

 

? प्रमोद भार्गव